‘अमृतधर्मा’ कवि बशीर अहमद ‘मयूख’
श्री मयूख गत चालीस वर्षों से निरंतर सृजन रत हैं। आपके द्वारा 1973 में प्रकाशित ‘स्वर्ण रेख’, जिसमें ऋग्वेद की ऋचाओं का भावानुवाद है, उनका कवि सम्मेलनों में हजारों श्रोताओं के बीच में एक ऋषि की ओजस्वी वाणी में वाचन करना, ... अपने आपमें अद्भुद प्रयास रहा है, ... यह समय भारतीय समाज में सांप्रदायिक बैचेनी बढ़ाने वाला रहा है। ‘बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम तथा अयोध्या प्रकरण, ... से उत्पन्न सांप्रदायिक तनावों से भरे वातावरण में जब-
‘एक पिता के पुत्रों से सब मिलो पर परस्पर,
स्वर्ग का ऐश्वर्य उतारो इस भूतल पर।’’
यह वाणी गूंजती तब, ..., मन, सहृदयता में डूब जाता था। श्री मयूख ने, जैन सूक्तों का, गुरुग्रन्थ साहिब का भावानुवाद कर, ... एक मुस्लिम भारतीय सांस्कृतिक मन को जिस उदात्तता का परिचय सौंपा है, ... वह अद्भुद है। आपके द्वारा ‘‘मयूरवेश्वर शिव मंदिर,’’ की स्थापना, तथा वहां धार्मिक, आध्यात्मिक वातावरण की संरचना के साथ सामाजिक चेतना का केन्द्र बनाने का प्रयास अपने आप में अभूतपूर्व है।
श्री मयूख द्वारा सृजित कृतियां हैंः-
1. ‘स्वर्ण रेख’- (ऋग्वेद की ऋचा मंत्रों का काव्य रूप है- जो 1973 में प्रकाशित हुआ है। दो कविताएं, एन.सी. आर.टी. द्वारा प्रकाशित हिन्दी के 11वीं व बारवीं के पाठ्यक्रम में सम्मिलित है।
2. ‘अर्हत ’(1975) सूक्त काव्य का भाषानुवाद
3. ‘ज्योतिपथ (1984)’ वेद, उपनिषद, गीता, कुरान, गुरुग्रन्थ साहिब, जैन, बौद्ध आगम का भाषानुवाद
4. ‘सूर्य बीज’ (1991)
5. ‘अवधू अनहद नाद सुन’े (1998) ...., बिहारी पुरस्कार प्राप्त।
6. संस्कृति के झरोखे से (2000) सांस्कृतिक निबन्ध संग्रह
छांदोग्य उपनिषद में ‘मधुविद्या’ की व्याख्या है। दधंच ऋषि द्वारा अश्विनी कुमारों को दी गई व्याख्या की मधुर कथा है।
कवि ‘मयूख’ ने ‘स्वर्ण रेख’ में इस उपनिषद कथा की ‘काव्य प्रस्तुति की है। अश्विनी कुमारों ने ... ऋषि से प्रार्थना की-
‘‘हे तपसी,
हम पर मधु-रहस्य उद्घाटित हो।’’
परन्तु इन्द्र का शाप, और उसका क्रोध, ऋषि को चिंतित कर जाता है। अश्विनी कुमार, उपाय बताते हैं। शीष का प्रत्यारोपण पहली बार होता है। वे मधुविद्या का दान पाते हैं, ... और पुनः ऋषि-
‘कुशासन पर बैठे दध्यंच ऋषि
ज्योतिर्मय जिनकी दिव्य दृष्टि
वर्णन करते जो दिव्य मंत्र
वाणी में मुखरित सरस्वती... ?
पृ0 98 ... स्वर्ण रेख’’
कवि मयूख नेे कवि को प्राप्त मधुविद्या का जो उसके शीष के प्रत्यारोपण बाद, अश्विनी कुमारों को दी जा सकती है, ... उस संकेत सूत्र को व्याख्या दी है। संभवतः कवि भी जो सामान्य जन होता है, ... कविता के मधु का स्पर्श पाकर, ... अचानक उसके भीतर मधुविद्या के रस- कण उसकी रसात्मकता को रेखांकित कर जाते हैं, वहां अचानक उसकी शीष का प्रत्यारोपण ही हो जाता है, ... बाद ‘मधुदान’ वह फिर सरल, सहज, सामान्य जन ही रह जाता है।
इसी सरल, सहज जीवन की सात्विक अभिव्यक्ति श्री मयूख हैं। ‘स्वर्ण रेख’ (1973), ऋग्वेदीय कथा ऋचा के काव्य रूप में चर्चित रहा था। मयूख की काव्य दृष्टि सांस्कृतिक चेतना की मधुरम अभिव्यक्ति में हे। संस्कृति कौम (राष्ट्र) की होती है। समुदाय की नहीं।’’ ... भूखंड के निवासियों को युग-पुरुष समाज और राजनेता, सन्त, साहित्यकार आदि हजारों साल तक प्रभावित करते हैं, तब कहीं जाकर इतिहास के गर्भ से उस कौम की संस्कृति का जन्म होता है।2 (प्राक्कथन पृ.9)
यही भारत की सांस्कृतिक विशेषता है। श्री मयूख ने जिसे अपनी पहली कृति ‘स्वर्ण रेख’ की भूमिका में स्पष्ट किया है। ... ‘संस्कृति... गत्यात्मक है, ... यह हजारों वर्षों से हजारों घाटों का स्पर्श करती हुई सातत्य प्रवहमान जलधारा का वेग है। जो मनुष्यता की,उसके जीवन मूल्यों की अपनी विशिष्ट पहचान बनाती है। यही वह ‘अमृत’ है, जिसकी खोज वैदिक परंपरा से आज तक होती आई है। ऋषि ही प्रारंभिक कवि थे। आज भी कवि, परिवर्तित विषम परिस्थितियों में इसी अमृत की खोज काव्य के माध्यम से करते हैं। यही मधु विद्या का रहस्य है मधु जो मनुष्य को उसकी प्राण ऊर्जा सौंप देता है। उसके भीतर सहृदयता उत्पन्न करता है जो उसे दिव्य मनुष्यता से, जो उसका धर्म है, जो उसका स्वभाव है, वह उसे सौंपता है। कवि, मयूख ने इसी खोज को विभिन्न नबियों की वाणी में तलाशाा है, ... उन्हें प्राप्त अनुभूतियों को भाव रूप में अभिव्यक्ति देने की कोशिश भी की है। यह मात्र भावानुवाद ही नहीं है-
यहां भाव, कवि की अंतश्चेतना की अनुगंुज बन गए हैं-
‘‘ईश्वर के अतिरिक्त अन्य को जो भजते हैं
तुम उनको भी बुरा मत करो।
वे अज्ञानी हद से बढ़कर, बेअदबी से
ईश्वर को गाली दे बैठें?
हर समुदाय-सम्प्रदाय को
लगते उसके कर्म उचित औ शोभा शाली
परमेश्वर ने यही व्यवस्था करी निराली
किन्तु एक दिन उन सबको भी
प्रभु के निकट लौट जाना है।
अपने सत्य-असत कर्मों का
ईश्वर से निर्णय पाना है।
‘कुरआन शरीफ/91 (ज्योतिपथ)
सूर्यबीज गीत कविता संग्रह (1978) श्री मयूख की चालीस साल की काव्य यात्रा का जीवन्त दस्तावेज है। मयूख का समाजवादी सोच सामान्य जन की विवशता, ... उसकी मूल्यों के प्रति आस्था, ... उसके भीतर की भाव प्रवणता, ... यहां काव्य वस्तु, जिस काव्य रूप को तलाश करती है, वही मयूख की ‘काव्य चेतना की यही दृष्टि ‘मयूख’ की काव्य चेतना का आधार है। उन्हांेने ‘स्वर्ण रेख (1973) ऋग्वेद के मन्त्रों को ‘काव्य रूप’ में अभिव्यक्ति दी है।
‘पैदा किया धरा को जिसने
जिसने किया गगन का सर्जन,
चन्द्र आदि नक्षत्र बनाये
उस विराट् को मेरा वन्दन।
मिले अभय-संरक्षण उसका
जिसकी चेतनता से होता जड़ चेतन का
कर्म-धर्म निश्चित-सुनियन्त्रित,
जगत्-नियन्ता उस विराट को
मेरी जीवन समिधा अर्पित।
विराट-वन्दना (पृ0 19)
‘अर्हत् (1976) जैन आगम-सूक्तों पर आधारित काव्य कृति है।
‘जिसके नयन खुले हैं उसको
एक दीप की ज्योति बहुत है।
कोटि-दीप बालो तो भी क्या
अंधे को प्रकाश मिल सकता?
जो चरित्र से हीन व्यक्ति है
वह कितना भी करे अध्ययन विविध शास्त्र का-
तो भी ज्ञानी नहीं बनेगा।
पृ¬. 39
इसी क्रम में ज्योतिपथ (1984) में पुनः ‘वेद’, कुरान, गीता, उपनिषद, जैन, बौद्ध आगम सूक्त, गुरूग्रन्थ आदि पर भावानुवाद काव्य रूप में प्रकाशित हुआ था। यह कृति अपने काव्यरूप में ही नहीं कवि की अनिवर्चनीय वस्तु की खोज परक दृष्टि से संधान के रूप में भी महत्वपूर्ण है। .... सभी, धर्म, संप्रदाय, श्रेयस्कर है, ... उस मनुष्य की उसकी दिव्यता में खोज कवि दृष्टि की विशेषता है।
‘मेरे गीतों की बारात, ... यूं जाएगी, ... एक युद्ध कविता है, पर यहां थोपे हुए युद्ध का गीतकार, ... सांस्कृतिक विरासत की उर्वरा भूमि की यशोगाथा के साथ है-
‘‘मेघ को मैं न भेजूंगा संदेश ले
याक्षणी से कहो दाबले पीर को
भेज दूंगा शहीदों की वो टोलियां
जो बदल दे हिमालय की तकदीर को
मेरे गीतों की बारात के साथ में
रूद्र-भैरव चला है बराती बना
आज डमरू बजा ताण्डवी ताल पर
मेरे गीतों में गूंजी नई सर्जना...
सूर्य बीज (पृ. 64)
... कविता में सगीतात्मकता, ... लय, ... नाद सौंदर्य, ... कवि की भाषागत संपदा है, ... यहां सांस्कृतिक प्रतीकों की योजना अनायास है, यही श्रुत काव्य की विशेषता है-
‘आश्चर्य मत करो
ईश्वर को गाली देकर भी
उनकी जय बोलने का अधिकार
सुरक्षित है।’
इससे पहिले पृ0 20
रोज सांझ को, सूर्य बीज बो
काटते रहे भोर की फसल
कोटि कंठ की व्यास छीनकर
बांटते रहे आचमन का जल
इस कदर चढ़ा ज्योतिका नशा,
पोथियों में खो गई स्वर्ग की दिशा।
रोशनी के नाम खत पृ0 25
‘वर्जित अंधियारों से डरे हुए लोग
हर उगते सूरज को नमते हर बार
टूटी दीवारों पर घिरी हुई भीड़
मुंह ढांके ढूंढ रही आकाशी द्वार
‘डरे हुए लोग’ पृ0 30
.
यहां कवि, ... समकालीनता के दंश को, ‘आम जन की पीड़ा को, ... संवेदना के बहुमुखी द्वारों से उकेरता है, ... वह सामान्य जन है, ‘मयूख की पीड़ा, ... धर्म संप्रदाय, ... अल्पसंख्यक, ... समाजवादी, ... सभी आग्रह, ... दुराग्रह, ... हर चारदीवारों को तोड़ती हुई, ... एक मुक्त आकाश की खोज में स्वातंत्र्य चेता कवि मन की पुकार बन जाती है। ... सांस्कृतिक जन ही भारत का सौंदर्य है, ... वह अमृत है, ... जो वरेण्य है, श्री मयूख वे चातक हैं, जो ‘स्वतंत्रता के मुक्त आकाश में, ... आध्यात्मिक सीपी का द्वार खोलकर, ... पावन मोती तलाशते हैं, उनके ही शब्दों में उनके कवि मन का आदर्श हैः-
‘‘कबीरा चदरिया को धोकर सुखाता है,
उस घाट पर मेरा मन जाकर नहाता है।
जहरीली दुनिया का हर नाग नाचेगा
मेरा संपेरा तो बीन बजाता है।
$$$$
साथ जब जुल्मों का कोई द्रोण देता है
मोहग्रस्त अर्जुन का कृष्ण रथ चलाता है।
कृष्ण रथ चलाता है (सूर्यबीज प्र0 48)
‘अवधू अनहद नाद सुने’ (1998) श्री मयूख का बहुचर्चित काव्य संग्रह है। इसे बिरला फाउन्डेशन द्वारा ‘बिहारी पुरस्कार’ भी प्रदान किया गया है।
श्री लक्ष्मी मतल सिंघवी ने आमुख में जो रहा है वह विवेचनीय है-
‘‘मयूख के काव्य की गहराई मनुष्य के हृदय की दिव्य गहराई है, इसके काव्य की धरती, दर्शन का आकाश और उनकी अनुभूतियां तथा अभिव्यक्तियों का क्षितिज विराट मनुष्यता का ऐश्वर्य और अनन्त ईश्वर के अस्तित्व में मनुष्यता का आभास है।’’
शब्द संगीत हैं, शब्द आनंद है
शब्द आराधना है, शरण-गंध है
जिनपे आसीन है कोई कमलासना
उस कमल-पुष्प का शब्द मकरंद है
‘‘अवधू-अनहदनादसुने पृ0 41’’
... तुम्हारा नाम, ... तुम, एक जादू हो, जिसे छूते हो वह लोहा सोना हो जाता है, ... तुम्हारा नाम, ... जब कंपन अनुभवन में आता है, ... संगीत जगता है, कला उभरती है, वह नाम, जब भीतर तरंगित होकर उतरता है, रोम... रोम वंशी है, ... धुन भी तुम हो, ... गायक भी तुम, ... और श्रोता भी तुम, ... तुम और वह और यह, ... जब त्रिपुटी एक्य में डूबती है, ... तब कवि मयूख का सूफी मन, ... उस उजास मयी भोर में, ... उगते हुए सूर्य की लालिमा में, ... उसी को देख कुहक उठता है-
‘‘तुम्हारे नाम का ही नाद मेरे छन्द में बोला
हृदय के रन्ध्र में बोला, मलय की गंध में बोला
सभी जड़ और चेतन के जगत के द्वन्द में बोला
तुम्हारे और मेरे बीच में सम्बन्ध में बोला।’’
‘‘तुम्हारा नाम पृ0 48’’
यहां कविता, ... अपनी संक्षिप्तता में और गेयता, ... में ‘मधुरस’ की अनुगूंज ही रह जाती है। जब भाषा, स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ती है, तब द्वन्द में इतिवृतात्मकता टूट जाती है, ... ध्वनियां ही पतझड़ के पत्तों की तरह चुपचाप कुछ छूटते जाने का संकेत देती जाती है-
अंतर्मुखता की दहलीज पर, ... कविता ‘सूत्रात्मक’ हो जाती है। कवि तभी ‘ऋषि’ बन जाता है। ‘वाक, ... पश्यंती के द्वार पर अचानक दस्तक देने लगती है, अवधारणाएं टूटने लगती हैं, स्मृतियों का दबाब चला जाता है। जहां तक विचार है, वहां तक संप्रदाय है। जहां जब सब टूट जाता है वहीं धार्मिकता जन्मती है। धर्म में प्रवेश होता है। जन्म से संप्रदाय साथ होता है, यात्रा पर उसकी सार्थकता, धर्म में ही प्रवेश की प्राप्ति है। यही ‘मधुरम’ का प्रवेश द्वार है-
‘ फासला रोशनी का तै करने,
जब सफर पर कोई निकलता है
अपने आपे को भूल जाने पर
रोशनी का चराग जलता है।
श्री बशीर अहमद ‘मयूख’, देश के प्रतिष्ठित कवि हैं। सहृदय, ... उदात्त विचारों के धनी मयूख का परिचय उनकी काव्य कृति सूर्यबीज की कविता ‘कृष्ण रथ चलाता है पृ. 48 में मिलता है-
‘कबिरा चदरिया को धोकर सुखाता है,
उस घाट मेरा मन जाकर नहाता है।’
संप्रदाय गत धारणाएं, ... जिस पवित्र मन में स्वतः वाष्पीकृत होकर सहज मानव धर्म में परिवर्तित हो जाती है, ... वह उदात्त विचार भूमि कवि मयूख की अंतश्चेतना है।
स्वर्ण रेख (1973, अर्हत (1975) ज्योतिपथ (1984) में वेद, उपनिषद, गीता, कुरान, गुरुग्रन्थ साहब, जैन, बौद्ध, आगम पर आधारित’ मनुष्य धर्म को संबोधित ‘आप्त वचनों’ के भाषानुवाद है। यहां कविता, अपनी स्वाभाविक ऊर्जा में आत्मा की अनहद वाणी की मधुरतम ऊर्जा के स्पंदन से स्पर्शित होकर आई है। यहां सभी संप्रदाय अपनी तेजस्विनी, ... सतत प्रवाहिनी भागीरथी की पवित्रतम भावनाओं का सद्य स्नान, अंतर्मन को करा जाते हैं। यह कवि मयूख की अपनी स्वाभाविक सरल व सहज अंतःप्रवृत्ति है, जिसने मधुरतम काव्य भाषा को वाहक बनाया है। भारतीय संस्कृति की उदात्त भाव धारा रहीम, रसखान, रसलीन, शेख से प्रसारित होती हुई, कवि मयूख की वाणी से समादृत ही हुई है।
मयूख का निजी जीवन इन्हीं उदात्त विचारों का वाहक ही है। उनके आचरण में ऋषि के कदमों की पगध्वनि सहज ही मिलती है। मुस्लिम कवि का ‘वेद वाणी’ का अपनी वाणी में, गायन, घर के समीप ‘मयूरवेश्वर शिव मंदिर की स्थापना’ तथा इस स्थान को लोकार्पित कर समाज सेवा का केन्द्र बनाने का अनवरत प्रयास, उनकी साम्प्रदायिक सद्भाव का श्रेष्ठतम परिचय है।
‘अवधू अनहद नाद सुने - (1998 पर आपको बिहारी पुरस्कार से सम्मानित भी किया है। श्री दशरथ मल सिंघवी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार - श्री रामेश्वर टांटिया स्मृति पुरस्कार, मेवाड़ फाउण्डेशन उदयपुर से 1983 में हारीत ऋषि पुरस्कार से पुरस्कृत एवं प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में सम्मानित किया गया। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारीशस में भाग लिया तथा मॉरिशस में ही छठी अंतर्राष्ट्रीय रामायण काफ्रेंस में ‘इस्लामी रहस्यवाद और भक्तिधारा के संगम, ... पर पत्र वाचन किया।
‘... कवि ‘मयूख भारतीय संस्कृति की उदात्त धरोहर के पक्षधर हैं, उसीे मार्ग पर वे चल रहे हैं, और अपनी कविता में, साझा संस्कृति की पुष्प गंधी सुगंध अनवरत निसृत कर रहे हैं।
श्री मयूख गत चालीस वर्षों से निरंतर सृजन रत हैं। आपके द्वारा 1973 में प्रकाशित ‘स्वर्ण रेख’, जिसमें ऋग्वेद की ऋचाओं का भावानुवाद है, उनका कवि सम्मेलनों में हजारों श्रोताओं के बीच में एक ऋषि की ओजस्वी वाणी में वाचन करना, ... अपने आपमें अद्भुद प्रयास रहा है, ... यह समय भारतीय समाज में सांप्रदायिक बैचेनी बढ़ाने वाला रहा है। ‘बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम तथा अयोध्या प्रकरण, ... से उत्पन्न सांप्रदायिक तनावों से भरे वातावरण में जब-
‘एक पिता के पुत्रों से सब मिलो पर परस्पर,
स्वर्ग का ऐश्वर्य उतारो इस भूतल पर।’’
यह वाणी गूंजती तब, ..., मन, सहृदयता में डूब जाता था। श्री मयूख ने, जैन सूक्तों का, गुरुग्रन्थ साहिब का भावानुवाद कर, ... एक मुस्लिम भारतीय सांस्कृतिक मन को जिस उदात्तता का परिचय सौंपा है, ... वह अद्भुद है। आपके द्वारा ‘‘मयूरवेश्वर शिव मंदिर,’’ की स्थापना, तथा वहां धार्मिक, आध्यात्मिक वातावरण की संरचना के साथ सामाजिक चेतना का केन्द्र बनाने का प्रयास अपने आप में अभूतपूर्व है।
श्री मयूख द्वारा सृजित कृतियां हैंः-
1. ‘स्वर्ण रेख’- (ऋग्वेद की ऋचा मंत्रों का काव्य रूप है- जो 1973 में प्रकाशित हुआ है। दो कविताएं, एन.सी. आर.टी. द्वारा प्रकाशित हिन्दी के 11वीं व बारवीं के पाठ्यक्रम में सम्मिलित है।
2. ‘अर्हत ’(1975) सूक्त काव्य का भाषानुवाद
3. ‘ज्योतिपथ (1984)’ वेद, उपनिषद, गीता, कुरान, गुरुग्रन्थ साहिब, जैन, बौद्ध आगम का भाषानुवाद
4. ‘सूर्य बीज’ (1991)
5. ‘अवधू अनहद नाद सुन’े (1998) ...., बिहारी पुरस्कार प्राप्त।
6. संस्कृति के झरोखे से (2000) सांस्कृतिक निबन्ध संग्रह
छांदोग्य उपनिषद में ‘मधुविद्या’ की व्याख्या है। दधंच ऋषि द्वारा अश्विनी कुमारों को दी गई व्याख्या की मधुर कथा है।
कवि ‘मयूख’ ने ‘स्वर्ण रेख’ में इस उपनिषद कथा की ‘काव्य प्रस्तुति की है। अश्विनी कुमारों ने ... ऋषि से प्रार्थना की-
‘‘हे तपसी,
हम पर मधु-रहस्य उद्घाटित हो।’’
परन्तु इन्द्र का शाप, और उसका क्रोध, ऋषि को चिंतित कर जाता है। अश्विनी कुमार, उपाय बताते हैं। शीष का प्रत्यारोपण पहली बार होता है। वे मधुविद्या का दान पाते हैं, ... और पुनः ऋषि-
‘कुशासन पर बैठे दध्यंच ऋषि
ज्योतिर्मय जिनकी दिव्य दृष्टि
वर्णन करते जो दिव्य मंत्र
वाणी में मुखरित सरस्वती... ?
पृ0 98 ... स्वर्ण रेख’’
कवि मयूख नेे कवि को प्राप्त मधुविद्या का जो उसके शीष के प्रत्यारोपण बाद, अश्विनी कुमारों को दी जा सकती है, ... उस संकेत सूत्र को व्याख्या दी है। संभवतः कवि भी जो सामान्य जन होता है, ... कविता के मधु का स्पर्श पाकर, ... अचानक उसके भीतर मधुविद्या के रस- कण उसकी रसात्मकता को रेखांकित कर जाते हैं, वहां अचानक उसकी शीष का प्रत्यारोपण ही हो जाता है, ... बाद ‘मधुदान’ वह फिर सरल, सहज, सामान्य जन ही रह जाता है।
इसी सरल, सहज जीवन की सात्विक अभिव्यक्ति श्री मयूख हैं। ‘स्वर्ण रेख’ (1973), ऋग्वेदीय कथा ऋचा के काव्य रूप में चर्चित रहा था। मयूख की काव्य दृष्टि सांस्कृतिक चेतना की मधुरम अभिव्यक्ति में हे। संस्कृति कौम (राष्ट्र) की होती है। समुदाय की नहीं।’’ ... भूखंड के निवासियों को युग-पुरुष समाज और राजनेता, सन्त, साहित्यकार आदि हजारों साल तक प्रभावित करते हैं, तब कहीं जाकर इतिहास के गर्भ से उस कौम की संस्कृति का जन्म होता है।2 (प्राक्कथन पृ.9)
यही भारत की सांस्कृतिक विशेषता है। श्री मयूख ने जिसे अपनी पहली कृति ‘स्वर्ण रेख’ की भूमिका में स्पष्ट किया है। ... ‘संस्कृति... गत्यात्मक है, ... यह हजारों वर्षों से हजारों घाटों का स्पर्श करती हुई सातत्य प्रवहमान जलधारा का वेग है। जो मनुष्यता की,उसके जीवन मूल्यों की अपनी विशिष्ट पहचान बनाती है। यही वह ‘अमृत’ है, जिसकी खोज वैदिक परंपरा से आज तक होती आई है। ऋषि ही प्रारंभिक कवि थे। आज भी कवि, परिवर्तित विषम परिस्थितियों में इसी अमृत की खोज काव्य के माध्यम से करते हैं। यही मधु विद्या का रहस्य है मधु जो मनुष्य को उसकी प्राण ऊर्जा सौंप देता है। उसके भीतर सहृदयता उत्पन्न करता है जो उसे दिव्य मनुष्यता से, जो उसका धर्म है, जो उसका स्वभाव है, वह उसे सौंपता है। कवि, मयूख ने इसी खोज को विभिन्न नबियों की वाणी में तलाशाा है, ... उन्हें प्राप्त अनुभूतियों को भाव रूप में अभिव्यक्ति देने की कोशिश भी की है। यह मात्र भावानुवाद ही नहीं है-
यहां भाव, कवि की अंतश्चेतना की अनुगंुज बन गए हैं-
‘‘ईश्वर के अतिरिक्त अन्य को जो भजते हैं
तुम उनको भी बुरा मत करो।
वे अज्ञानी हद से बढ़कर, बेअदबी से
ईश्वर को गाली दे बैठें?
हर समुदाय-सम्प्रदाय को
लगते उसके कर्म उचित औ शोभा शाली
परमेश्वर ने यही व्यवस्था करी निराली
किन्तु एक दिन उन सबको भी
प्रभु के निकट लौट जाना है।
अपने सत्य-असत कर्मों का
ईश्वर से निर्णय पाना है।
‘कुरआन शरीफ/91 (ज्योतिपथ)
सूर्यबीज गीत कविता संग्रह (1978) श्री मयूख की चालीस साल की काव्य यात्रा का जीवन्त दस्तावेज है। मयूख का समाजवादी सोच सामान्य जन की विवशता, ... उसकी मूल्यों के प्रति आस्था, ... उसके भीतर की भाव प्रवणता, ... यहां काव्य वस्तु, जिस काव्य रूप को तलाश करती है, वही मयूख की ‘काव्य चेतना की यही दृष्टि ‘मयूख’ की काव्य चेतना का आधार है। उन्हांेने ‘स्वर्ण रेख (1973) ऋग्वेद के मन्त्रों को ‘काव्य रूप’ में अभिव्यक्ति दी है।
‘पैदा किया धरा को जिसने
जिसने किया गगन का सर्जन,
चन्द्र आदि नक्षत्र बनाये
उस विराट् को मेरा वन्दन।
मिले अभय-संरक्षण उसका
जिसकी चेतनता से होता जड़ चेतन का
कर्म-धर्म निश्चित-सुनियन्त्रित,
जगत्-नियन्ता उस विराट को
मेरी जीवन समिधा अर्पित।
विराट-वन्दना (पृ0 19)
‘अर्हत् (1976) जैन आगम-सूक्तों पर आधारित काव्य कृति है।
‘जिसके नयन खुले हैं उसको
एक दीप की ज्योति बहुत है।
कोटि-दीप बालो तो भी क्या
अंधे को प्रकाश मिल सकता?
जो चरित्र से हीन व्यक्ति है
वह कितना भी करे अध्ययन विविध शास्त्र का-
तो भी ज्ञानी नहीं बनेगा।
पृ¬. 39
इसी क्रम में ज्योतिपथ (1984) में पुनः ‘वेद’, कुरान, गीता, उपनिषद, जैन, बौद्ध आगम सूक्त, गुरूग्रन्थ आदि पर भावानुवाद काव्य रूप में प्रकाशित हुआ था। यह कृति अपने काव्यरूप में ही नहीं कवि की अनिवर्चनीय वस्तु की खोज परक दृष्टि से संधान के रूप में भी महत्वपूर्ण है। .... सभी, धर्म, संप्रदाय, श्रेयस्कर है, ... उस मनुष्य की उसकी दिव्यता में खोज कवि दृष्टि की विशेषता है।
‘मेरे गीतों की बारात, ... यूं जाएगी, ... एक युद्ध कविता है, पर यहां थोपे हुए युद्ध का गीतकार, ... सांस्कृतिक विरासत की उर्वरा भूमि की यशोगाथा के साथ है-
‘‘मेघ को मैं न भेजूंगा संदेश ले
याक्षणी से कहो दाबले पीर को
भेज दूंगा शहीदों की वो टोलियां
जो बदल दे हिमालय की तकदीर को
मेरे गीतों की बारात के साथ में
रूद्र-भैरव चला है बराती बना
आज डमरू बजा ताण्डवी ताल पर
मेरे गीतों में गूंजी नई सर्जना...
सूर्य बीज (पृ. 64)
... कविता में सगीतात्मकता, ... लय, ... नाद सौंदर्य, ... कवि की भाषागत संपदा है, ... यहां सांस्कृतिक प्रतीकों की योजना अनायास है, यही श्रुत काव्य की विशेषता है-
‘आश्चर्य मत करो
ईश्वर को गाली देकर भी
उनकी जय बोलने का अधिकार
सुरक्षित है।’
इससे पहिले पृ0 20
रोज सांझ को, सूर्य बीज बो
काटते रहे भोर की फसल
कोटि कंठ की व्यास छीनकर
बांटते रहे आचमन का जल
इस कदर चढ़ा ज्योतिका नशा,
पोथियों में खो गई स्वर्ग की दिशा।
रोशनी के नाम खत पृ0 25
‘वर्जित अंधियारों से डरे हुए लोग
हर उगते सूरज को नमते हर बार
टूटी दीवारों पर घिरी हुई भीड़
मुंह ढांके ढूंढ रही आकाशी द्वार
‘डरे हुए लोग’ पृ0 30
.
यहां कवि, ... समकालीनता के दंश को, ‘आम जन की पीड़ा को, ... संवेदना के बहुमुखी द्वारों से उकेरता है, ... वह सामान्य जन है, ‘मयूख की पीड़ा, ... धर्म संप्रदाय, ... अल्पसंख्यक, ... समाजवादी, ... सभी आग्रह, ... दुराग्रह, ... हर चारदीवारों को तोड़ती हुई, ... एक मुक्त आकाश की खोज में स्वातंत्र्य चेता कवि मन की पुकार बन जाती है। ... सांस्कृतिक जन ही भारत का सौंदर्य है, ... वह अमृत है, ... जो वरेण्य है, श्री मयूख वे चातक हैं, जो ‘स्वतंत्रता के मुक्त आकाश में, ... आध्यात्मिक सीपी का द्वार खोलकर, ... पावन मोती तलाशते हैं, उनके ही शब्दों में उनके कवि मन का आदर्श हैः-
‘‘कबीरा चदरिया को धोकर सुखाता है,
उस घाट पर मेरा मन जाकर नहाता है।
जहरीली दुनिया का हर नाग नाचेगा
मेरा संपेरा तो बीन बजाता है।
$$$$
साथ जब जुल्मों का कोई द्रोण देता है
मोहग्रस्त अर्जुन का कृष्ण रथ चलाता है।
कृष्ण रथ चलाता है (सूर्यबीज प्र0 48)
‘अवधू अनहद नाद सुने’ (1998) श्री मयूख का बहुचर्चित काव्य संग्रह है। इसे बिरला फाउन्डेशन द्वारा ‘बिहारी पुरस्कार’ भी प्रदान किया गया है।
श्री लक्ष्मी मतल सिंघवी ने आमुख में जो रहा है वह विवेचनीय है-
‘‘मयूख के काव्य की गहराई मनुष्य के हृदय की दिव्य गहराई है, इसके काव्य की धरती, दर्शन का आकाश और उनकी अनुभूतियां तथा अभिव्यक्तियों का क्षितिज विराट मनुष्यता का ऐश्वर्य और अनन्त ईश्वर के अस्तित्व में मनुष्यता का आभास है।’’
शब्द संगीत हैं, शब्द आनंद है
शब्द आराधना है, शरण-गंध है
जिनपे आसीन है कोई कमलासना
उस कमल-पुष्प का शब्द मकरंद है
‘‘अवधू-अनहदनादसुने पृ0 41’’
... तुम्हारा नाम, ... तुम, एक जादू हो, जिसे छूते हो वह लोहा सोना हो जाता है, ... तुम्हारा नाम, ... जब कंपन अनुभवन में आता है, ... संगीत जगता है, कला उभरती है, वह नाम, जब भीतर तरंगित होकर उतरता है, रोम... रोम वंशी है, ... धुन भी तुम हो, ... गायक भी तुम, ... और श्रोता भी तुम, ... तुम और वह और यह, ... जब त्रिपुटी एक्य में डूबती है, ... तब कवि मयूख का सूफी मन, ... उस उजास मयी भोर में, ... उगते हुए सूर्य की लालिमा में, ... उसी को देख कुहक उठता है-
‘‘तुम्हारे नाम का ही नाद मेरे छन्द में बोला
हृदय के रन्ध्र में बोला, मलय की गंध में बोला
सभी जड़ और चेतन के जगत के द्वन्द में बोला
तुम्हारे और मेरे बीच में सम्बन्ध में बोला।’’
‘‘तुम्हारा नाम पृ0 48’’
यहां कविता, ... अपनी संक्षिप्तता में और गेयता, ... में ‘मधुरस’ की अनुगूंज ही रह जाती है। जब भाषा, स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ती है, तब द्वन्द में इतिवृतात्मकता टूट जाती है, ... ध्वनियां ही पतझड़ के पत्तों की तरह चुपचाप कुछ छूटते जाने का संकेत देती जाती है-
अंतर्मुखता की दहलीज पर, ... कविता ‘सूत्रात्मक’ हो जाती है। कवि तभी ‘ऋषि’ बन जाता है। ‘वाक, ... पश्यंती के द्वार पर अचानक दस्तक देने लगती है, अवधारणाएं टूटने लगती हैं, स्मृतियों का दबाब चला जाता है। जहां तक विचार है, वहां तक संप्रदाय है। जहां जब सब टूट जाता है वहीं धार्मिकता जन्मती है। धर्म में प्रवेश होता है। जन्म से संप्रदाय साथ होता है, यात्रा पर उसकी सार्थकता, धर्म में ही प्रवेश की प्राप्ति है। यही ‘मधुरम’ का प्रवेश द्वार है-
‘ फासला रोशनी का तै करने,
जब सफर पर कोई निकलता है
अपने आपे को भूल जाने पर
रोशनी का चराग जलता है।
श्री बशीर अहमद ‘मयूख’, देश के प्रतिष्ठित कवि हैं। सहृदय, ... उदात्त विचारों के धनी मयूख का परिचय उनकी काव्य कृति सूर्यबीज की कविता ‘कृष्ण रथ चलाता है पृ. 48 में मिलता है-
‘कबिरा चदरिया को धोकर सुखाता है,
उस घाट मेरा मन जाकर नहाता है।’
संप्रदाय गत धारणाएं, ... जिस पवित्र मन में स्वतः वाष्पीकृत होकर सहज मानव धर्म में परिवर्तित हो जाती है, ... वह उदात्त विचार भूमि कवि मयूख की अंतश्चेतना है।
स्वर्ण रेख (1973, अर्हत (1975) ज्योतिपथ (1984) में वेद, उपनिषद, गीता, कुरान, गुरुग्रन्थ साहब, जैन, बौद्ध, आगम पर आधारित’ मनुष्य धर्म को संबोधित ‘आप्त वचनों’ के भाषानुवाद है। यहां कविता, अपनी स्वाभाविक ऊर्जा में आत्मा की अनहद वाणी की मधुरतम ऊर्जा के स्पंदन से स्पर्शित होकर आई है। यहां सभी संप्रदाय अपनी तेजस्विनी, ... सतत प्रवाहिनी भागीरथी की पवित्रतम भावनाओं का सद्य स्नान, अंतर्मन को करा जाते हैं। यह कवि मयूख की अपनी स्वाभाविक सरल व सहज अंतःप्रवृत्ति है, जिसने मधुरतम काव्य भाषा को वाहक बनाया है। भारतीय संस्कृति की उदात्त भाव धारा रहीम, रसखान, रसलीन, शेख से प्रसारित होती हुई, कवि मयूख की वाणी से समादृत ही हुई है।
मयूख का निजी जीवन इन्हीं उदात्त विचारों का वाहक ही है। उनके आचरण में ऋषि के कदमों की पगध्वनि सहज ही मिलती है। मुस्लिम कवि का ‘वेद वाणी’ का अपनी वाणी में, गायन, घर के समीप ‘मयूरवेश्वर शिव मंदिर की स्थापना’ तथा इस स्थान को लोकार्पित कर समाज सेवा का केन्द्र बनाने का अनवरत प्रयास, उनकी साम्प्रदायिक सद्भाव का श्रेष्ठतम परिचय है।
‘अवधू अनहद नाद सुने - (1998 पर आपको बिहारी पुरस्कार से सम्मानित भी किया है। श्री दशरथ मल सिंघवी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार - श्री रामेश्वर टांटिया स्मृति पुरस्कार, मेवाड़ फाउण्डेशन उदयपुर से 1983 में हारीत ऋषि पुरस्कार से पुरस्कृत एवं प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में सम्मानित किया गया। द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन मारीशस में भाग लिया तथा मॉरिशस में ही छठी अंतर्राष्ट्रीय रामायण काफ्रेंस में ‘इस्लामी रहस्यवाद और भक्तिधारा के संगम, ... पर पत्र वाचन किया।
‘... कवि ‘मयूख भारतीय संस्कृति की उदात्त धरोहर के पक्षधर हैं, उसीे मार्ग पर वे चल रहे हैं, और अपनी कविता में, साझा संस्कृति की पुष्प गंधी सुगंध अनवरत निसृत कर रहे हैं।
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