रविवार, 13 अक्टूबर 2013

शिवराम

शिवराम

शिवराम का निबन्ध लेखन बहुुत कुछ अप्रकाशित है, उन की असामयिक मृत्यु ने बहुत कुछ समाज से छीन लिया, बहुत कुछ उन का राजनैतिक सक्रिय जीवन उन से छीन कर ले गया। उन का साहित्यिक अवदान उन के सामाजिक उत्तरदायित्व में बहुत अधिक है। शिवराम के निबन्धों की पाण्डुलिपि जब तैयार कर रहा था, तभी अचानक विचार कौंधा था। शायद  आचार्य ‘शुक्ल’ की विरासत ही शिवराम को मिली है। इतना उदात्त मन, वैचारिक न्याय क्षमता तथा सही को सही कहने का सामर्थ्य शिवराम की ही पूँजी है।
इस आलेख में शिवराम के निबंध और उनके नुक्कड़ नाटकों पर चर्चा की जानी प्रस्तावित है।

शिवराम की गद्य-भाषा, व्यास शैली में .समास बहुल है। वे हर वाक्य को सूक्ति परक बनाते हुए  .एक गहरी लय के साथ, आवेगात्मक भाषा में उद्दाम नदी की तेज धारा की तरह विचारों को उछालते हुए अपनी निबन्ध-यात्रा को प्रारम्भ करते हैं। कविता के बारे में आप का एक महत्वपूर्ण निबन्ध है।

”कवि  की विश्व-दृष्टि, जीवनानुभवों की समृ(ि, उस का काव्य बोध ;जीवन मूल्य और कला मूल्य दोनोंद्ध उस की काव्य भाषा , उस का परम्परा-बोध और उस का काव्य कौशल, उस की कविता की गुणवत्ता को नियमित करते हैं।“

”रचना की अन्तर्वस्तु का जन्म आभ्यंतीकृत जीवनानुभवों के आलोड़न-विलोड़न से अर्थात मन्थन से होता है। चिन्तनशीलता और कल्पनाशीलता, विवेक की अन्तर्दृष्टि इस मन्थन के उद्यम को संचालित करती है। वैयक्तिक.निवै्रयक्तिक होने., जगबीती से आपबीती और आपबीती से जगबीती के रूप में .अनुभूत होने अर्थात सामान्यीकरण होन की प्रक्रिया चलती है। इस प्रक्रिया के बिना रचना की अन्तर्वस्तु अस्तित्वमान नहीं होती। यह प्रक्रिया जितनी समृ( और परिपूर्ण होती है, उतनी ही समृ( और परिपूर्ण अस्तित्वमान होती है।“

शिवराम की गद्य भाषा, उन के निबन्ध, एक मूल्यवान निबन्ध के उत्कृष्ट रूप हैं।

‘बाज़ार का समाजीकरण’ आप का दूसरा महत्वपूर्ण निबन्ध है-

”सच पूछा जाए तो मानव-समाज की सभ्यता और संस्ड्डति के विकास का मूल आधार जरूरत की चीजों के उत्पादन और विनिमय पद्धति की विकास यात्रा ही है।“

”जब निजी हितों और सामाजिक हितों में अन्तर्विरोध उभरने लगते हैं तो व्यवस्था संक्रामक हो जाती है।“

”जिसे स्वतन्त्र बाज़ार कहा जाता है, वह वास्तव में स्वतन्त्र नहीं होता, वह निजी पूँजीपतियों के बीच उन्मुक्त प्रतिद्वन्द्वता के नियन्त्रण पर आधारित होता है।“

‘जन संस्ड्डतियाँ और साम्राज्यवादी संस्कृति’ शिवराम का विचारात्मक आलेख है। यहाँ वे रामविलास शर्मा की महत्वपूर्ण अवधारणा ‘जातीय संस्ड्डति’ के अगले पड़ावों की चर्चा में संलग्न हैं। शिवराम जनपदीय संस्ड्डतियों की अभिरक्षा के साथ जातीय संस्ड्डति के विकास की धारा में, ट्ठासोन्मुखी वृत्तियों के उन्मूलन में देखते हैं। उन का सोच साम्राज्यवादी .विकृतियों के विरु( है।

‘नक्सलवाद के विरु( आमजन,.’ आप की वैचारिक दृष्टि का आलेख है, जो जन. की पृष्ठ-भूमि को स्पष्ट करता है।‘हमारी साहित्यिक लघु-पत्रिकाएँ’, ‘राजस्थानी रंगमंच में हाड़ौती का योगदान’, ’ आप के अन्य प्रकाशित आलेख हैं।

शिवराम के द्वारा ”अभिव्यक्ति पत्रिका के  लिए लिखे गए, संपादकियों,तथाविभिन्न लघु-पत्रिकाओं में जो निबन्ध और आलेख प्रकाशित हुए हैं, उनके संग्रहित करने का प्रयास किया जाना अपेक्षित है।

‘शिवराम से नुक्कड नाटक के प्रारंभ की सूचना मिलती है। ... यह एकांकी और नाटक के बीच के वह कड़ी है, जहां प्रेक्षागृह आम जनता के बीच आ गया है। प्रेक्षागृह के अभाव ने ‘नाद्यवस्तु’ के स्वरूप तथा अभिव्यक्ति के रूप को भी परिवर्तित कर दिया। ‘प्रेक्षागृह’,     भद्रजन’ की साहित्यिक प्रीति पर टिका था। उनकी संख्या सीमित होती चली गई। ‘रंगमंच’ मात्र महानगरों में ही सीमित हो गया, ... तथा रूप अत्यधिक कलावादी भी हो गया। ‘पाठ्य पुस्तक’ में नाटक की स्वीकृति से नाटक मात्र एक ‘काव्य रूप’ बनकर रह गया, जो एक पठनीय कृति के रूप में ही समादृत होने लगा।

‘भारतेन्दु के नाटकों में नुक्कड़ नाटक का बीज तलाशा जा सकता है। यहां रंगमंच लोक के भीतर उभरता है, ... उसके अंतर्मन में उपजे सवालों की यहां खोज है, उत्तर तलाशे जाते हैं।
‘नाटक’ के माध्यम से जनजागृति लाने का कार्य, बहुत लंबे समय से होता रहा है। परन्तु नाटक के माध्यम से ‘आधुनिक विचारधारा पर सीधा हस्तक्षेप, तथा जनसंघर्ष में आम आदमी की भूमिका पर गहराई से बातचीत ‘नुक्कड़ नाटक’ के माध्यम से अधिक विकसित हो पाई है। इसका प्रमुख श्रेय जनवादी आंदोलन को है। जहां मजदूर आंदोलन की विफलताएं, समाजवादी सोच का तिरस्कार, धर्म निरपेक्षता पर सांप्रदायिकता का ग्रहण, तथा क्रमशः पूंजीवादी बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव, जहां चिन्तन को धार दे रहा था, वहीं लोक से सीधे जुड़ने का दबाव, नुक्कड़ नाटक के लिए अपरिहार्य जमीन तैयार कर रहा था। ‘व्यवस्था जहां निर्मम होती जा रही है, वहीं उसका सम्मोहन, ‘सच’ को वृहद झूठ में तब्दील भी करता जा रहा है। ‘सच क्या है, प्रबंधन की विकसित शैलियां सामने आने नहीं देना चाहतीं। आम आदमी के प्रति पूंजीवादी बहुउद्देश्यीय कंपनियों का बढ़ता जाल, व्यक्ति का वस्तु में होता रूपांतरण, जहां साहित्यकार की संवेदना को झकझोर रहा है, वहीं वह दूसरे से जुड़ने की आवश्यकता भी तेजी से अनुभव करने लगा है।’ नाटक के तीनों अंग, नाटककार, पात्र तथा दर्शक, यहां यह त्रिपुटी, एकाकार होकर ‘विषयवस्तु को अपनी तीव्रता में भाव जगत में स्पंदित कर जाती है।

‘शिवराम’  लगभग तीस वर्षों से नुक्कड़ नाटक से जुड़े हुए हैं। उनके प्रसिद्ध नाटक, ‘जनता पागल हो गई है, घुसपेठिए के सैकड़ों प्रदर्शन हो चुके हैं। वे लेखक है, रंगकर्मी हैं, वे नाटक के साथ यात्रा करते हैं। सन् 73 के बाद ‘आपातकाल में उनके नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ के सैकड़ों प्रदर्शन, पूरे देशभर में हुए थे। क्या यह राजनैतिक नाटक है?प्रश्न विचारणीय है।
नाटक की विषयवस्तु राजनैतिक भी हो सकती है, नहीं भी। राजनीति कोई सीधी लकीर नहीं है, जिसकी लंबाई नापी जा सके। यह बहु विविधा यामी प्रक्रिया है, जिसमें सामाजिक सांस लेता है। व्यक्ति के जन्म के साथ वह जुड़ जाती है। गरीब का बच्चा, झुग्गी झोंपड़ी में जन्म लेता है, अमीर का नर्सिंग होम पैदा होता है। वह राजनीति का ही पोषण पाता है। फिर शुद्धकला की चर्चा करना बेमानी है। आज दर्शक के चित्त पर ‘बु(िगत दबाव का प्रभाव है। बुद्धिगत दबाव जहां उसे तर्क सौंपता है, वहीं धन की लिप्सा भी। पदार्थ गत सम्मोहन उसे मूल्यहीनता सौंपता है। संवेदना सोख लेता है। उसे विचार के आधार पर सही विचार तक लाना, तथा उसके भीतर की संवेदनाओं को जगाते हुए उसकी वृत्तियों के परिष्कार का प्रयास करना कठिनतम कर्म है। ‘नुक्कड़ नाटक, की यही जीवन्त भूमिका है।

‘यह लोक से पैदा होता है, लोक में खेला जाता है, और लोक के लिए समर्पित है। यह जीवन्त कर्म है, जो लोक के पक्ष में है। ‘अंतर्वस्तु’ पिघलते लोहे की तरह है, उसका सोच क्या होता, यह तय नहीं हो पाता .... ‘देश-काल, समाज की परिस्थितियां, ... विश्वास को अपना नया सांचा गढ़ने के लिए भी प्रेरित कर सकती है। ‘वस्तु की रूप तक की यात्रा  यहां लोचमय है, गत्यात्मक है, यही इसकी वह जीवन्तता है जो इस नाट्य रूप को विशेषता देती है।
पात्र, यहां प्रतीक है, वे विकृति के विरुद्ध, साहस को, उम्मीद को, एक प्रतिकार को वाणी देते हैं। साधारण वेशभूषा है, प्रतीक का उसी आधार पर चित्रण है, पर अनावश्यक उसका विस्तार नहीं है। ... भाषा में गत्यात्मकता है, प्रभावोत्पादकता है, संकलन त्रय है, जहां प्रभावान्विति के साथ, एक भावदशा, ... एक वैचारिक स्पष्टता, केन्द्र में रह जाती है। यह अंतर्वस्तु का वह अनुशासन है, जो नाटक के सभी तत्वों का समाहार करता हुआ, उसे सहज संवेदनशील बनाता है।

‘अंतर्वस्तु की गहनता, तथा तीव्रता, जहां यहां प्रमुखता लेती है, वहीं उसकी तरलता, उसका किसी ठोस ‘वैचारिक दबाव’ से हटकर, एक पिघलते फौलाद की शक्ल में ढल जाना, उसे आनायास वांछित रूप को प्रदान करता है।

नुक्कड़ नाटक’ की प्रस्तुति में यह खुलापन है, ...  यहां ‘नाटककार, महत्वपूर्ण तो है, नाटक उसकी व्यक्तिगत कृति है, परन्तु अभिनेता, निर्देशक, दर्शक, तीनों की उपस्थिति रंगमंच पर जिस गहनता का निर्माण करती चली जाती है, वहां नाद्य शब्द पाठ्य शब्द को बहुत पीछे छोड़ जाते हैं। नुक्कड़ नाटक मात्र रंगमंच की सार्थक उपस्थिति बन जाता है। कलावादी नाटक लेखकीय सर्जना है, उसका हस्तक्षेप ज्यादा है, पर यहां कम से कम होता चला जाता है। जहां भी खेला जाता है, वहा ”वर्तमान“ उपस्थित होकर, उसे नया ‘काव्य रूप’ देने में सफल हो जाता है।

... ‘नुक्कड़ नाटक’ में स्वतंत्रता अधिक है। यहां सभी स्वतंत्र हैं। रचनाकार के पास ‘विविध विषय है, उसके काव्य के चयन की स्वतंत्रता है, उसकी चेतना पर समकालीनता का दबाव है, एक बैचेनी है। वह जनता का पक्षधर है। वह राजनेता की तरह भाषण नहीं देता है, देता है, तो वह अलग विधा है। यहां ‘रूपक-प्रतीक, ...  दृश्य बिम्ब, दर्शक से जोड़ते हैं। ‘शिवराम के नाटक ‘जनता पागल हो गई है’ ... ‘घुसपेठिए’, सुनो भद्र जन सुनो’, में समकालीन जड़ता पर जो व्यंग्य है। वह केन्द्रीय भूमिका में है। राजनैतिक अधःपतन तथा मनुष्य का धीरे-धीरे जड़-वस्तु में ढल जाना, उपजीव्य है। परन्तु जो कहा गया है, वह अनायास है। भाषा अत्यधिक सरल व तीव्रता में है। संवाद छोटे हैं, चित्रात्मक है, व्यंग्य है। बीज तो दर्शक के भीतर है, नाद्य भाषा अनुकूल खाद पानी देती है, उसके भीतर का अनकहा व्यक्त हो जाता है।

‘नाट्यशब्द’ का चातुर्य तथा उसकी बहुआयामी भूमिका यहां प्रमुख है। नाटक की विशेषता अपनी पूर्णता में दर्शक वर्ग को अपनी सहजानुभूति प्रदान करना होता है, जहां पात्र, दर्शक, निर्देशक, रंगमंच सभी एकाकार हो जाते हैं। ‘विचार’ का भावानुभूति में ढलना तथा उसके चित पर पड़ा प्रभाव बहुत देर तक प्रभावी रहता है। यह मात्र प्रतिकार का वाहन ही नहीं है, चित की वृत्तियों को समेटता हुआ एकोन्मुखता प्रदान करने वाला नाटक भी है। यही इसकी लोकप्रिय होने की पहली शर्त है। इसकी प्रस्तुति की असाधारण तीव्रता, ...  नाटक के प्रारंभ से ही चरम के साथ प्रभावी हो जाती है। इसके शिल्प की यह विशेषता है। यहां पानी को धीरे-धीरे ताप नहीं दिया जाता। प्रारंभ ही तीव्रता के साथ, होता है, गति ही दर्शक के मन को अचानक खींच लेती है। भाषा, अभिनय, मंच सज्जा, प्रकाश योजना, एकोन्मुखता को लक्ष्य केन्द्रित करके नियोजित की जाती है।शिवराम के नुक्कड़ नाटकों की समीक्षा उपरोक्त विवेचना के आलोक में किया जाना उचित है।

‘नुक्कड़ नाटक’, वर्तमान की आवश्यकता थी। यह ‘विस्फोट’, मात्र सपाट बयानी या कथन वक्रता की नई शैली नहीं है वरन, ‘जन’, जन संकुलता और उसकी पीड़ा से सीधे जुड़ने का उपक्रम है। संवादों के माध्यम से कथा की प्रस्तुति, नाटकीयता में नहीं ढल जाती। ‘नाटकीयता, ... पृथक गुण है। जो कृति को एक नाटक बनाती है। यहां, ‘वस्तु’ रूप में जो ढलना चाहती है, उसके भीतर, ... सामने दर्शक उपस्थित रहता है, वह ‘कार्य व्यवहारों के साथ, ... जहां शब्द ‘नाट्य शब्द’ से संगुफित होकर, ... क्रियाशील बन जाता है। अभिनेयता तथा संवाद, ... इस नाटकीयता को रचते हैं। संपूर्ण परिप्रेक्ष्य इस कृकृति को दर्शक के सामने पसारा फैलाकर, उसके अंतर्तम को झकझोर देता है। यहां प्रेक्षागृह की साज सज्जा नहीं है, भाषा अपने संपूर्ण सौदर्य, आवेग, रचनात्मकता के साथ होती है। हर शब्द प्राणवान होता है।
शिवराम के नुक्कड़ नाटक ‘जनता पागल हो गई है’, ‘जमीन’, में इस ‘नाट्य रूप’ की उत्कृष्टता हम देख पाते हैं। इस कृति की भूमिका में शिवराम ने कहा है- जनता पागल हो गई है, के उत्तरार्द्ध पत्रिका में छपने के बाद से सैकड़ों प्रदर्शन हो गए हैं, साथ ही पुस्तक में छपने से पूर्व उन्होंने इस कृति में संशोधन भी किए हैं।
‘जनता पागल हो गई है’, आपातकाल के पूर्व लिखा गया पहला नुक्कड़ नाटक है। संपूर्ण व्यवस्था की अराजकता पर यह सीधा व्यंग्य है। आम जनता, शासन, कुशासन, पूंजीपति, पुलिस के गठजोड़ से पीड़ित है, पर वह चुप है। यह नाटक सीधा उसके भीतर उतरकरउसकी मूल आवाज को गहराई से कुरेदकर, उसे बोलने का सामर्थ्य देता है। परिस्थितियां आज भी उतनी ही बदशक्ल में है जितनी बीस साल पहले थी, आज आदमी और भयभीत हो गया है।
... शिवराम, जनवादी लेखक हैं, उनकी दृष्टि स्पष्ट है। जहां तक कृति का पहला भाग है, स्थितियों का सही व सत्यपरक आलेखन, उससे किसी को भी असहमत होने की गुंजाइश नहीं है। जनता व पागल, दोनों पात्र, अपनी प्रतीकात्मकता में सारे समाज की करुणा, दशा को भाषा देते हैं। ‘‘पूजीपति, पुराने सामंतवाद की अगली कड़ी है। ‘सरकार व पुलिस’ अपने पुरानेे रूप में यथावत है।
मात्र लोकतांत्रिक नया रूप ढाला है।दूसरा भाग, स्थितियों के साक्षात्कार का है, क्या स्थितियों में परिवर्तन, चुनाव से आएगा, ... समाज बदल पाएगा, ... क्या प्रतिकार ही साधन शेष रह गया है। यह नाटक और शिवराम के अन्य नाटक, एक गहरा सवाल खड़ा करते हैं। जनता का संघर्ष क्या रूमानियत है? क्या हिंसा और आत्मघात दो ही विकल्प शेष रह गए हैं? यहां आकर इन नुक्कड़ नाटकों की प्रासंगिकता महत्वपूर्ण हो जाती है।

... क्या मात्र ‘हिंसा ही अब एक मात्र विकल्प शेष रह गया है। जहां तक नागरिक का है, उसे प्रबुद्ध कर प्रतिकार की क्षमता सोंपना श्रेयस्कर है। समकालीनता का इतना सटीक व प्रभावी चित्रण दुर्लभ है। आम नागरिक रंगमंच के दूसरी तरफ भी खुद को ही पाता है। भाषा में प्रखरता, ... शब्द... जैसे उसके भीतर से ही उपजे हों , ... यहां ‘रस वाद नहीं है। परन्तु ‘नाटक’ जिस प्रभावोत्पादकता से सन्निहित हो जाता है, वह बेजोड़ है। नया नाटक शास्त्रीय परिधि का पालन नहीं करता है। वहां नाटक के नायक को फल की प्राप्ति नहीं है। यहां ‘रस’ की खोज सारगर्भित नहीं रही है। ‘वस्तु’ रहेगी, ... वही ‘रूप’ की तलाश करती है। ... कहानी उपन्यास में भी वस्तु होगी। परन्तु मात्र संवादों में वस्तु की अभिव्यक्ति से कहानी नाटक में नहीं ढल सकती। ... यहां भावात्मकता, जिसमें भाव और विचार संगुफित होकर आते हैं वह एकोन्मुख होकर, प्रभावान्विति को प्राप्त होती है।’

संग्रह के सभी नाटक सौद्देश्य है, ... जहां विचार का आरोपण है, वहां नाटकीयता निःशेष हो गई है, मात्र पार्टी का व्यक्तव्य रह गया है। यह पेचवर्क है, जिसके लिए नाटककार ने संग्रह की भूमिका में कहा है, जो बाद में जोड़ा गया है।

सरकार-‘‘लेकिन चुनाव के समय का तो ध्यान रखना चाहिए। हम चुनाव हार गये तो हमारा क्या होगा? और हम नहीं होंगे तो हमारा क्या होगा? आप क्या सोचते हैं ये विरोधी दल तुम्हारी वेतरणी पार करा देंगे और फिर कम्यूनिष्ट भी तो आ सकते हैं।
आपने कहा- निर्यात बढ़ाए बिना हम जिन्दा नहीं रह सकते और निर्यात तब तक नहीं बढ़ सकता जब तक विदेशी कम्पनियों से उच्च तकनीक न मिले।
तुम्हारी खातिर हमने विदेशी कम्पनियों के लिए देश के सभी दरवाजे खोल दिए। देश की स्वतंत्रता और सम्प्रभुता तक को दांव पर लगा दिया। देश को विदेशी कर्जों मंे डुबो दिया। और अब आप चुनाव के समय जनता को तंग कर रहे हो।’’
पृ.26
यह कथोपकथन, ... अचानक गति में शिथिलता लाता है, ... ‘कार्य-व्यवहार’ रूक सा जाता है। यह ‘सरकार’ और पूंजीपति के बीच का संवाद है। लेखक स्वयं यहां उपस्थित होकर अपनी वैचारिक दृष्टि को स्थूलता में रख रहा है। शेष नाटक की भाषा, ... अन्तर्वस्तु से एक रूप हैं छोटे संवाद है, ... जहां अत्यधिक गत्यात्मकता है।
सरकार- और देशों की जनता अपने देश के लिए सिर तक कटा देती है।
जनता- (सिर प्रस्तुत करते हुए) लीजिए सरकार! यही बात है तो यह सिर भी उतार लीजिए हुजूर...
पृ. 15
सरकार-भूखी हो?
जनता-हां!
सरकार- (सहज भाव से) तो, भूखी रहो। मगर खुश-खुश। कल के सुख के लिए आज कुर्बानी करनी होती है, जनता।
पृ. 14
जनता- (दर्शकों से)
मैंने अपना हाथ पसारा
उसने दिया चमकता नारा
देखी नहीं जिगर की चोट
देखा केवल मेरा वोट
पागल- वोट माने कुर्सी, वोट माने राज
वोट माने सत्ता, वोट माने ताज
वोट माने लूट का पट्टा, पांच बरस को औरवोट माने ठगा गया फिर, पांच बरस को और
पृ.20

नाटक का अंत विद्रोह में होता है, जनता पागल हो गयी है, ... जनता का विद्रोह हो जाता है, दुःस्वप्न तथा ‘कुकुडूं कूं, ... आपातकाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जो आघात लगा था, ... उस पीड़ा का अंकन करते हैं। यहां भी, ... आतंककारी अंधकारी सिंह रूपीी सामंतवाद की पराजय है, ... उसकी मृत्यु तथा उसका आतंक हिंसा से ही समाप्त होता है।
‘जमीन’ जनता की आशा व आकांक्षा का जीवंत दस्तावेज है। भू-स्वामी, उसके डकैत, उसकी सहायक पुलिस व साहूकार एक तरफ है, दूसरी ओर वे हैं जिन्हें जमीन आवंटित हुई है। ठाकुर कब्जा नहीं करने देता है। फर्जी मुकदमे चलाता है। अंत, सामूहिक संघर्ष में है, प्रतिकार जो ‘प्रतिशोधात्मक होता हुआ, ... हिंसक क्रांति में ढल जाता है।
नाट्य भाषा में तीव्र प्रवाह है, ... पूरा गांव, ... शब्दानुभव की अनुगूंज में रंगमंच पर उभर आता है। शब्द चित्रों की आवृत्तियां, ... दृश्यों में ढल जाती है, ... नाटकीयता का उत्कर्ष, संगीतात्मक संवादों में है-
‘‘जैसे हो जोतेगा
जो भी वो बोएगा
चाहे जेब में धेले न तीन
हो हो भैरूको, ... हां हां भैरू को
भैरू को मिली जमीन।
पृ. 59
एक- वो हम पर जुल्म करेंगे।
दो- थाने में बंद कर मारेंगे।
तीन- हमारे घर जला देंगे।
चार- हमारी बहू-बेटियों की आबरू उतारेंगे।
गरीबा- हाँ, यही होगा। जब तक हम डरते रहेंगे, एक दूसरे का साथ नहीं देंगे। ऐसा ही होता रहेगा। आज हमारे साथ हो रहा है तुम तमाशा देखो। कल तुम्हारे साथ होगा हम तमाशा देखेंगे।
किशन्या- हां, ऐसे ही चलता रहेगा। हमारी जिन्दगी ऐसे ही नर्क बनी रहेगी।
पृ. 68
... संभवतः दर्शक यहां, ... अपने आपको अकेला नहीं पाता है, उसके भीतर का भय, जड़ता विवेकशून्यता, ... उजाले की एक किरण के आते ही अंधकार जिस प्रकार हटने लगता है, ... धीरे-धीरे नाटक के साथ वह अपने आपको परिवर्तित पाता है। यहां रस सृष्टि नहीं है, ... नाटक अपनी भावात्मकता में, जहां विचार भीतर तेजाब की तरह है, उसे बूंद-बंूद कर उसकी चेतना को झकझोरता जाता है। यही प्रभावान्विति यहां एक चुभन की तरह व्याप्त हो जाती है। जहां अंत में किसान आंदोलन उग्र हो जाता है। हिंसक होकर, भू-स्वामी, पुलिस, सबको भगा देती है, ... भीड़ पीछा करती है, उन्हें पकड़ लाती है।
हटीला- एके भी ताकत से
निपटेंगे आफत से
जुल्मी को धूल चटाए दीन।

कोरस- भैरू को, गवई को, भौमा को, धौमा को
मुझको भी इसको भी, सबको मिली जमीन।
पृ. 72वर्तमान परिस्थितियों से यह नाटक रूबरू कराते हैं। यहां पलायन नहीं है। कलात्मक सुरक्षा नहीं है; कृति एक निरपेक्ष साहित्य रूप नहीं है। उसकी अपनी निजी स्वायत्तता नहीं है। वह प्रतिबद्ध है, वह आम जन की पीड़ा, ... उसकी व्यथा से दर्शक को रू-ब-रू कराने में समर्थ है। जीवन सत्य अपनी संपूर्ण कुरूपताओं के साथ यथार्थ की भूमि पर जीवन्त है। हां, लेखकीय दृष्टिकोण स्पष्ट है, जहां पर ‘पेचवर्क’ की तरह आता  है, वहां कृति का लालित्य कमजोर भी हो जाता है।
घुसपैठिये
‘‘घुसपैठिये’ में शिवराम के नुक्कड नाटकों का दूसरा संग्रह है। ‘‘विगत दशकों में उभरे प्रगतिशील जनवादी संस्कृति के उभार में विकसित नुक्कड-नाटक आंदोलन में शिवराम की अग्रणी भूमिका रही है। नुक्कड़-नाटक का उद्भव ही सामाजिक रूपांतरण की उत्कट चाह और प्रतिरोध के प्रखर माध्यम के तौर पर हुआ है। ये नाटक सिर्फ प्रेक्षागृह का ही अतिक्रमण नहीं करते, बल्कि दुनिया के मेहनत कशों के वैश्विक प्रतिरोध की संस्कृति निर्मित करते हैं।’’
आवरण पृष्ठ - राजाराम मादू
‘वर्तमान’ शिवराम की नाद्य चेतना का प्रबल प्रेरिक कारक है। ... वे आज दुनिया में जो भी कुछ घट रहा है, ... जो वैज्ञानिक भौतिक विकास मानवीय चेतना के दमन का आधार बना है उसे व उसके प्रभाव को गहराई से अनुभव करते हैं। उनके भीतर प्राप्त समझ का आदर है, वे एक वैकल्पिक दुनिया का रोमांटिक ख्वाब नहीं बुनते, ... एक मूटोपिया उनके पास नहीं है, ... जहां कल्पना की महीन चादर बुनी जाती हो, ... वे बस इस हताशा और कटुता के बीच ... मनुष्य की उद्दाम जिजीविषा का आदर करते हुए उसे ‘प्रतिकार से प्रतिरोध तक ले जाते हैं। गंभीर शोर उनके पास ही है, ... पर वे इस कोलाहल के पार भी झांकते हैं, ... प्रारंभ में जो एक राजनैतिक कर्मी की सक्रियता, उनके नाटकों में परिलक्षित हुई थी, ... वह धीरे-धीरे गहन व सजग होती हुई, ... स्थिरता देती हुई दिखाई पड़ती है।
इस संग्रह में, ... ”अभी लड़ाई जारी है“, ”घुसपैठिए“, ”लम्बे हाथ वाला झाडू”, ”नाद्य रक्षक“, ”हे भद्र नागरिक सुनो“, पांच नाटक संग्रहित है।
नाटक, संवाद में कही गयी गत्यात्मक कथा प्रवाह नहीं है। वह गंभीर साहित्यिक कर्म है। दृश्य, और शब्द की युति यहां दर्शक के भीतर संवेदना का जगत जगाती है। दर्शक के भीतर जो जड़ता है, वह हटती ही नहीं है, वह अपने भीतर गहन समाजिकता के बोध के प्रकाश में डूब जाता है। ‘प्रेक्षागृह’ यहां साधारणजन का ‘रहवास’ है, जहां वह है, वहां नाटक स्वयं पहुंच जाता है, ... वह प्रेक्षागृह में दर्शकों को निमंत्रित नहीं करता है।
‘‘नाटक सिर्फ मनोरंजन नहीं होता। नाटक को सिर्फ मनोरंजन में तब्दील करना उससे उसकी चेतना-निर्माण की भूमिका छीन लेना है उसे सिर्फ भड़ेैेती में बदल देना है। नाटक की हत्या का एक और तरीका ईजाद किया गया- वह यह कि उसे व्यापकता से काट दो- सीमित सुधी दर्शकों या प्रतियोगिताओं में प्रतिभागी अभिनेताओं और निर्णायकों तक सीमित कर दो; जिनके सरोकार कथानक से गौण और कलापक्ष से प्रमुख होते हैं ............... जाहिर है हमारे समय की मांग है कि नाटक नव उपनिवेशीकरण के विरूद्ध जनचेतना- निर्माण का साम्राज्यवाद से गढ़जोड़ करने वालों के छद्म को उजागर करने का, श्रम जीवी जन-गणों में नए उत्साह और साहस का संचार करने का काम करें।’’
‘‘नाटक फिर भी जारी है’’ शिवराम पृ. 7
इस संग्रह के नाटकों में, ‘लोकनाट्य की शैलियों का प्रयोग बहुलता में है। ‘अभी लड़ाई जारी है’, ”हाल्हा“ की शैली में है, करोली जिले की लोक गायकी यहां है
गवैयेः (दोहा)
दया दृष्टि करिये प्रभो, काना फूसी छोड़
नाटक करते हैं शुरू, मन के मन का जोड़।।
पृ. 11
... दर्शकों के साथ यहां सीधा संवाद उपस्थित होता है...
(धुन राधेश्याम तर्ज)
जो सफदर सुखदेव की थी, हां वो ही जंग हमारी है।
थमी नहीं ना बन्द हुई, हां अभी लड़ाई जारी है।
हां अभी लड़ाई जारी है, हां अभी लड़ाई जारी है।
... नाटक शुरू होता है, जनरल डायर का प्रवेश होता है, ... गोली चलती है, जलिया वाला बाग का दृश्य उभरता है, फिर सेठ और मुनीम आते हैं, ... देवीसिंह का हिसाब होता है, लठैत आते हैं, ... ग्रामीण शहर आता है, वहां आजादी की लड़ाई चल रही है, ... पत्नी कहती है, गांव छोड़कर चलंे, ... देवीसिंह शहर आता है, वहां आजादी की लड़ाई चल रही है, ... क्रांतिकारियों को सजा मिली है, परन्तु आजादी के साथ ही, ... सेठ और मुनीम तथा ठाकुर ही नेता बन जाते हैं।
गवैये आते है, ... इस यात्रा को समकालीनता के द्वन्द्व से जोड़ देते हैं-
‘सेठ सब आज़ाद हैं, हाकिम सभी आज़ाद हैं
सूदखोरी, लूटखोरी, सब यहां आज़ाद है।
ज्योंकी त्यो आज़ाद गुन्डे, और पुलिस आज़ाद है।
शोषण, दमन, पाखंड, छल, बल ज्यों की त्यों आज़ाद है।
पृ. 20
‘दर्शक’ नाटक में तीसरा महत्वपूर्ण तत्व है। ‘संवाद, अभिनेयता, दूसरे तत्व हैं। साधारणीकरण दर्शक का ही होता है। उसके ही अंतर्मन पर, पड़ा प्रभाव जहां उसे नाटक का पात्र तक बना जाता है। वह खुद अपने आपको नाटक का पात्र समझता ही नहीं, ... अनुभव भी करता है, ... यही इस जन-नाट्य की प्रभावी क्षमता है।
... देवीसिंह और उसकी पत्नी शहर में काम तलाश कर रहे हैं, ... यहां आकर भी उन की जन चेतना जगती है, ... अचानक नाटक में, देवीसिंह की जगह स्वयं नाटककार का हस्तक्षेप हो जाता है।
‘‘देवसिंह- निर्वैकल्पिक कुछ हल नहीं होता। हर चीज का विकल्प होता है। हर समस्या का हल और हर सवाल का जवाब। सवाल यह है कि आप विकल्प की तलाश भी करना चाहते हैं, या नहीं। इस देश में ना साधनों की कमी है ना सम्पदा की। ना प्रतिभा की कमी है ना परिश्रम की। कमी है तो आम जनता से प्रतिबद्ध हुकूमत की और इस हेतु इरादे और हौंसलों की।’
पृ. 32
... उपरोक्त संवाद, ... नाटकीयता के विरूद्ध लेखकीय हस्तक्षेप है। जो नाटकीय शब्द को अचानक गंभीर विचारणा में अतिक्रमित करने का प्रयास करता है।यह देवीसिंह के चरित्र का स्वाभाविक विकास नहीं है।यह महत्वपूर्ण सोच किसी अन्य पात्र के द्वारा कहलाया गया होता तो अधिक स्वाभाविक रहता।
 देवसिंह की क्रांतिकारिता, ... से सत्तापक्ष पीड़ित है, वह उसे पहले प्रलोभन से फिर हिंसा से काबू करना चाहता है।
‘‘पुलिस हमला करती है, देवीसिंह घायल हो जाता है, फिर वह प्रतिकार करता है
‘‘देवीसिंह- मारो! मारो हमें!  हमारा जुर्म यही है कि हम काम चाहते हैं। रोजगार चाहते हैं। इज्जत से जीने का अधिकार चाहते हैं। क्यों हमें इतनी आजादी भी नहीं कि हम अपने साथ हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठा सकंे।’’
पृ. 34
... साधारणजन की यह विवशता, ... व्यवस्था की  क्रूरता के विरूद्ध उसकी प्रतिकार भावना उजागर होती है-
गवैये आते हैं- ‘खतरे में है इस तरह आजादी और देश
रक्षा इनकी कीजिए, यही एक संदेश पृ. 34
‘नुक्कड़ नाटक’ में तेज प्रवाह है, ... बरसाती नद की तरह तीव्र गत्यत्मात्कता है। संवाद क्षिप्र है, ‘शब्द’ अपने आप में नाटकीय स्थितियों के चित्रांकन में समर्थ है। प्रेक्षागृह में दृश्यांकन की सुविधा होती है। पात्र, ... पात्रानुसार चरित्र में ढलकर आते हैं। रंग सज्जा रहती है। पर यहां पात्र, ... साधारण विन्यास के साथ आता है, शब्द ही सार्थकता में, चित्रात्मकता के साथ आते हैं। दृश्य बन्धों की अनवरत शृंखला में यह नाटक अपनी गत्यात्मकता में, सफल है।
‘घुसपैठिए, ... प्रतीकात्मक नाटक है। यहां कश्मीर में आतंकवाद की समस्या को प्रस्तुत करते हुए, ... अमरीकी संस्कृति का जो भारतीय जनमानस पर प्रभाव पड़ा है उसका मार्मिक चित्रण है। ”लम्बे हाथ वाला झाडू“ में जहां केबल संस्कृति से हमारे समाज पर जो प्रभाव पड़ रहा है, इस समस्या को यहां उठाया गया है।‘हे भद्र नागरिक, सुनो! संग्रह का श्रेष्ठ नाटक है।
नाटक में ‘लोकनाट्य की शैली का प्रयोग है। समूह में जहां आदिवासी नृत्य करते हुए संवाद शैली में, ... गायन करते है, ... वहां से यह नाटक शुरू होता है। समस्या समाज में बढ़ रही अराजकता के भीतर खड़े उस सम्भ्रांत व्यक्ति की है, जो नैतिक परंपराओं का पालन करते हुए समाज में अपनी गरिमा के साथ रहना चाहता है।
‘‘प्रारंभ होता है। एक बड़े गुन्डे के आगमन तथा उसके सहयोगियों के मंच पर आने के साथ।
... राजा, यह युवक है, जिसके अपने सपने हैं, उसका परिवार है, ... वह इन गुंडों से पीड़ित होता है, उसकी बहन बलात्कार की शिकार होकर मर जाती है, ... बाप सदमें में मर जाता है। मां पागल हो जाती है, ... राजा भी एक गुंडा बन जाता है-
यहां भद्र नागरिक कहता है-
‘‘हो राजा! हम इसीलिए हारते रहते हैं कि हम अकेले होते हैं। अपने आप में सिमटें। अपनी-अपनी खोल में कैद। लेकिन राजा आंखें खोलकर देखो। हमारे चारों ओर ऐसे ही अकेलों की भीड़ जमा है। ये सब अकेले जिस दिन आपस में मिल जाएंगे, जुल्म पर टिकी व्यवस्था डगमगाने लगेगी।’’
... बॉस, राजा को मारना चाहता है। परन्तु अब गिरोह के सभी साथी राजा के साथ हो गए हैं, ... सब बॉस पर टूट पड़ते हैं, ... राजा भद्र नागरिक को बुलाता है, ... कहां हो तुम!
कोरस होता है-
कब तक चुप रहोगे भाई?
कब तक चुप रह लोगे?
... यहां नाटक, जिस विसंगति का समाधान करता है, वह पारम्परिक एक्य पर है, जब तक समाज में व्यक्ति, ... अकेला है, उसकी ही खोल में कैद है, तभी तक वह आतंकित है, दमन झेलता है, ... परन्तु सामाजिकता, संघर्षशीलता को जन्म देती है, जो वरेण्य है।
‘अंतर्द्वन्द चित्रित करने में, भावनाओं के उतार-चढ़ाव में लेखक की सूक्ष्म दृष्टि स्पष्ट हुयी है।


शिवराम के दो नाटक संग्रह”गटक चूरमा“ तथा ”पुर्ननव“;2009द्ध आकर्षक मुद्रण के साथ आए है। ”गटक चूरमा“, के लिए विशेषण रूप में वाक्यांश ”जन नाटक संग्रह“ उदृघृत किया गया है , जबकि पुनर्नव के साथ जनप्रिय कहानियों का नाट्यरूपान्तर अंकित है। स्पष्ट है किनाट्य प्रस्तुतियों, विशेष है, में सामान्य से कुछ अलगाव रखती है, एक विशेष अभिरूचि तथा  लक्ष्य को  समर्पित हैं।

जन तथा लोक शब्दएक दूसरे के पास आते हुए भी  पृथकता रख लेते है। जन, जनवादी शब्द हर विशेष वैचारिक सम्पन्ना दृष्टि को अंकित करते है। ”लोक“ शब्द में वह समाहित है। लोक विस्तृत है। बहुआयामी है जन में जो लोक है, वह एक सीमित दायरे में ही विवेचित है।

इस कारण शिवराम के नाटक की विशेषता ही उसकी सीमा है। उनका वैचारिक आग्रह लोकोन्मुख विशेष दृष्टि के निर्वहन मं कलात्मक उदात्तता  के स्पर्श को कहीं-कहीं छेाड़ भी जाता है। यही कारण  है कि रचना अपने उत्कर्ष शिखर को पाते-पाते    विचलन और विगलनकी तरफ निकल जाती है।

”गटर चूरमा “ में चार नुक्कड़ नाटक संग्रहित है। ये सभी नाटक एक विशेष शिल्पविधि  का निर्वहन करते है। एकांरी के शिल्प विधान से नुक्कड़ नाटक का शिल्प विधान पृथकता रखता है, यहाँ मंच खुला है, एक क्षण भी पर्दा नहीं गिरता है, अंक व दृश्यों का संयोजन तीव्र गति लिए हुए है। पात्रों में चरित्र का आगमन, उन की सहज स्वाभाविक भाषा तथा आंगिक मुद्राओं कीएकान्विति से े निर्वहित हो जाता है। नैपथ्य में संगीत, ....गीत,कथानक में गति लाने में  सहायक है। एकान्विति तथा एकोन्मुखता से जहां कथन एक चुभन के साथ प्रवाह व्यूह बनाने में सफल हो जाता है, वहीं इस नाटक की सफलता है।

शिवराम के पूर्व के नाटक पूरे भारत में अत्यधिक लोकप्रिय रहे है। उन की पहचान ”जनता पागल हो गई है“ से हुई थी। आपातकाल में यह नाटक बहुचर्चित रहा है। परम्परागत नाट्य विधान से यह नुक्कड़ नाटक अपनी शिल्पविधि में स्पष्ट पार्थक्य           रखता है, नहीं यह एकांकी की रूप विधा में  है। इसे परम्परागत मंच पर भी खेला जा सकता है, तो चौराहे पर भी। शिवराम ने इस नाट्य-रूप पर दक्षता से कार्य किया है।

इस संग्रह का” हम लड़ाकियाँ“े, अपने  कथ्य, तथा प्रस्तुति में  बेहतर नाटक है। यहाँ वैचारिक शोर के स्थान पर गहन चिन्तात्मक आवेग तरलता के साथ प्रवाहित है। यहाँ लैंगिक धरातल पर मानसिक विड्डतियों का उन्मीलन एक बेहतर सहज फलक पर है।        मानसिक रूपान्तरण  ही वास्तविक परिवर्तन है। कथा का पात्र जो भू्रण हत्या लिए तत्पर है,उस के भीतर कन्या के प्रति  प्रेम यहां जिस मनोजगत में उत्पन्ना द्वन्द से  उपजा है, उस की रूपाड्डति दर्शर्क के भीतर विचार उत्पन्ना करने में समर्थ है।

”बोलो-बोलो -हल्ला बोला,“ मदारी और जम्मूरे को लेकर प्रभावी नुक्कड़ नाटक है। परम्परागत मदारी के खेल को वैचिरिक भाषा से सम्पन्ना किया गया है। मदारी के रूप में भारतीय प्रगतिशील चिन्तक, जो पूंजीवाद, सामंतवाद, बाजारवाद, प्रतिक्रियावादरूप से परिचित है, बहुत ही लम्बे संवादो के साथ मुखरित है। नाट्य भाषा का  जनोन्मुखी रूप क्या भदेस  में ही सम्भव है? यह प्रश्न यहाँ  महत्वपूर्ण भी है। उससे अधिक महत्वपूर्ण है भदेस   को न्यायोचित ठहराने का उपक्रम.... जहाँ तर्क को  ड्डतर्क के महीन धागे से नई रूपाड्डति देने का  प्रयास  है। लोक तक पहुँचने का मार्ग लोक को संस्कारित करना भी है और लोक से संस्कारित होना भी है, यह एक अनवरत प्रक्रिया है। शरीर भी अपने को बनाए रखने के लिए जो भी हेय  है, अवांछित है, उसे स्वतः बाहर फैकता रहता है। यही लोक में परिमार्जन की परम्परा है, विधि है।

शिवराम के इस,” जन नाटक“ संग्रह की अपेक्षा उनका जन प्रिय कहानियों का नाट्य रूपान्तरण उत्ड्डष्ट कृतिे है। ’ठाकुर का कुआं,’ ‘सत्याग्रह,’ ऐसा क्यों हुआ,’ मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों का नाट्य रूपान्तरण है। जबकि ‘खोजा नसरूद्दीन बनारस  में ’की आधर कथा  रिजवान जहीर  उस्मान की कहानी है। ” क्यों? उर्फ़ वक्त की पुकार“नीरज सिंह  की कहानी है।

साम्प्रदायिकता की पहचान और परख तथा उसका जड़ीभूत व्यवस्था पर  आतंक  के  संदर्भ में इस संग्रह की खोजा नसरूद्दीन बनारस  में उत्ड्डष्ट ड्डति हैै। मूल कथा तो पढ़ी नहीं है, परन्तु यह नाटम्य रूपान्तरण  भी एक मौलिक संरचना ही है। ”नाट्य शब्द“ का यहाँ प्रयोग सुन्दर है। व्यंग्य तथा कल्पना दोनों का एकात्मक प्रयोग इस रचना की विशेषता है।

‘ठाकुर  का कुवां’ अपने समय की प्रभावशाली कहानी है। इस का रूपान्तरण  भी बेहतर है। शिवराम अपनी मौलिक ड्डति ‘गटक चूरमा’ की अपेक्षा जनप्रिय कहानियों के नाट्य रूपान्तरण्ण में अधिक सफल रहे है। यहाँ रूपान्तरण में नाटककार ने मौलिक परिवर्तन भी  कथा में किए है। इसीलिए ‘पुनर्नव’ शीर्षक सटीक है।  नाटक की क्षमता उसकी संवाद प्रस्तुतियां है। शिवराम की भाषा जहां सहज व प्रभावी है, वही वैचारिक रचना का अत्यधिक आग्रह उनकी  नाट्य भाषा  को अभिधात्मकता देता हुआ भाषा के लचीलेपन को खो देता है। पात्रानुूलल भाषा का वैचारिक प्रवाह जिस संगति की अपेक्षा रखता है, उसका निर्वहन कही-कहीं छूट भी जाता है। यह सही है , जन नाटक का उद्देश्य मनोरंजन के साथ मार्गदर्शन भी है। परन्तु मागदर्शन के साथ वैचारिक पाठ का अतिरेक कलात्मकता को कही-कही क्षति भी  पहुँचा देता है। शिवराम रचनाधर्मी प्रयोगवादी, प्रगतिवादी नाटककार है। उनकी दोनों ड्डतियां नाटक के क्षेत्र में अपनी स्थापनाओं के साथ उल्लेखनीय हैं।





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