सोमवार, 18 नवंबर 2013

हमारे पुरोधा कवि और उपन्यासकार माधवसिंह दीपक

हमारे पुरोधा
कवि और उपन्यासकार माधवसिंह दीपक
मित्रों ने इस लेखमाला का स्वागत किया है, वे इसे पढ़ रहे हैं, अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, मैं उनका हृदय से आभारी हूूॅं। मेरा इस लेखमाला लिखने के पीछे आशय यही था, साहित्य के इस महायज्ञ मंे हमारी पुरानी पीढ़ी के वे लोग जो मौन साधना रत रहे, आज वे हमारे बीच में नहीं हैं,जिनके जाने केबाद हम अपने निजी स्वार्थोेे में  उन्हें भूल ही गए। उनके शताब्दी वर्ष भी निकल गए , हम याद भी नहीं कर पाए। उनके समकालीन अकादमी के पुरोधा भी रहे। वे उनकी स्मृति में मोनोग्राफ भी नहीं निकाल पाए, उनके लेखन को मित्रों तक पहुंचाना परंपराके निर्वहन में मेरे लिए यह साहित्यिक धर्म ही है। आज तो शोक सभा भी एक खानापूरी होगई है, जो मोबाइल की बातचीत से हो जाती है। सुबह के अखबार में सूचना छप जाती है।

खैर आज मैं जिस लेखक की चर्चा कर रहा हॅं, वे जीवन मैं लेखक ही रहे। झालावाड़ जिले में जन्मे श्री माधवसिंह दीपक , उच्च प्रशासनिक सेवा में दिल्ली में रहे। वे झाालावाड़ अपनी जागीर सम्हालने आते थे। उनका परिवार झालावाड़ में ही रहा। तब मैं राजकीय महाविद्याालय में हिन्दी प्राध्यापक था।  एक दिन सुबह मेरे घर पर वे आएथे। चूड़ीदार पायजामा अैर अचकन और सुंदर टोपी यही उनकी पहचान थी। उनकी हवेली पर भी गया था। जहॉ बहुत बड़ा निजी पुस्तकालय था। वे अंग्रेजी, हिन्दी तथा कुछ अन्य विदेशी भाषाओं के विद्वान थे। ‘सात सौ गीत उनके गीतांे का वृहद संग्रह था, ’ तलवार की छाया, बोलती लहरें, कर्नाटकी ,रेत की आग आपके उपन्यास थे। झाालावाड़ के मित्रों ने उनके साहित्य  पर बाद में परिचर्चा भी आयोजित की थी।

माधव सिंह ‘दीपक’ के तीन काव्य संग्रह ‘सात सौ गीत’ 1959 ई., ‘लावण्यमयी’ 1959 ई. तथा ‘बलभद्र प्रकाश’ 1960 ई. प्रकाशित हुए थे। उन के पितामह श्री बलभद्र सिंह भी कवि थे, ‘बलभद्र प्रकाश’ खण्ड काव्य उन की ही स्मृति में लिखा गया था। ‘लावण्यमयी’ तीन सौ गीतों का संग्रह है ।

माधव सिंह ‘दीपक’ की कृति‘सात सौ गीत’, सात भागों में विभाजित काव्य संग्रह है, ‘ज्योति’, ‘पिपासा’, ‘लो हम भी हंसे’, ‘कसौटी’, ‘प्रेयसी की याद में’, ‘निर्झर’ एवं ‘मांझी’। प्रत्येक भाग में सौ-सौ गीत हैं। हर भाग के पूर्व में कवि ने संक्ष्प्ति में इन की प्रस्तुति के सन्दर्भ में अपना वक्तव्य भी दिया है।

‘माँझी’, विरह काव्य है। इसे खण्ड-काव्य भी कहा जा सकता है। छायावादी काव्य चेतना का प्रभाव ‘अमर सिंह’ व ‘माधव सिंह दीपक’ में स्पष्ट परिलक्षित होता है। कवि सुधीन्द्र की काव्य चेतना पर भी प्रभाव मिलता है। किन्तु माधव सिंह ‘दीपक’ ने छायावादी मूल्यों को अपनी तरह से ही आत्मसात किया था। अंग्रेज़ी भाषा पर उन का अधिकार था।
‘मांझी’ को कवि ने स्वयं भी खण्ड काव्य माना है। यह एक छोटा-सा विरह काव्य है। कवि ने अपने काव्य को अपने जीवन की यात्रा के रूप में सम्प्रेषित किया है, यह जीवन का आख़िरी पड़ाव है। वह भौतिक विश्व से परे, ‘उस पार’ जाने की कल्पना करता है, वहाँ उसे सुख मिलने की आशा है। केवल माँझी उस के साथ है, जो उस की नाव को खे रहा है:-
”मांझी! कुछ गाते भी जाओ।रोते हो फिर भी मुस्काकर, धीमे-धीमे स्वर में गाकर,
रह-रह कर मुझको आज, याद दिलाते भी जाओ।“ पृ330
नौका डूबने लगती है। उस पार पहुँचने की निष्फल चेष्टा में डूबता उतरता हुआ वह कहता है:-
”वह किनारा दूर ही है।
हाय मांझी! क्षुद्र मानव तो यहाँ मजबूर ही है।“ पृ. 367.

कवि के हृदय पर यही सब से बड़ा घाव है कि वह अपनी यात्रा में सफल नहीं हो सका:-
”वास्तव में मेरा जीवन भी इस संसार रूपी सागर में एक तिनके की भांति लहरों की इच्छा पर नाच रहा है।“ पृ. 326.

”सांसें लेते हैं, अब भी हम, बातें करते हैं अब भी हम
मरने से पहले आखिर इतने, सब क्यों हाय डरे बैठे हैं।“ पृ. 356.
और अन्त में:-
”कौन पहुंचा है, वहां मुझको प्रमाणों से बताए
आज अपरम्पार सागर, पर निशानों से बताए
हाय मॉंझी! क्षुद्र मानव, तो यहाँ मजबूर ही है।“

सौ गीतों में यह काव्य, बिना पूर्णता लिए अचानक समाप्त हो जाता है। जीवन की, अचानक आखिरी सांस की तरह। ये सात सौ गीत, नवयुवक की चहल क़दमी, उस के यौवन, उस के जीवन संघर्ष तथा ‘हास परिहास’ से गुज़रते हैं, जिस का समापन, जीवन की अन्तिम सान्ध्य वेला के साथ होता है:-
कवि दीपक, कवि ही थे। वे और उन की कविता एक रस हो गए थे। उन्हों ने काव्यानुभूति को जीवन में जिया। समीक्षकों ने, अचानक परिवर्तित काव्य रूपों तथा उन के प्रतिमानों के आधार पर, पूर्व की परम्परा को ही हाशिए से भी निष्कासित-सा कर दिया। सांस्कृतिक काव्य धारा के दो रूप होते हैं, पश्चिमी परिभाषा में संस्कृति बाह्य जीवन की अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करती है। हम वहाँ इस आधार पर समाजशास्त्रीय व्याख्या करते हैं। यह परिभाषा बहुत कुछ ‘सभ्यता’ के साथ मिलती हुई, बुद्धिजन्य ज्ञान के स्वरूपों से मिल जाती है। परन्तु भारतीय परम्परा में संस्क्ृति, अनुभव जन्य ज्ञान पर आधारित होती है। संस्कृति की ज़मीन पर ही धर्म का वृक्ष लगता है। धर्म जो परम्परा में मनुष्यत्वको सौंपता है। प्रायः सम्प्रदाय को धर्म मान कर जो व्याख्या की जाती है, उस से सारा अभिप्राय दूषित हो जाता है।
यहाँ सांस्कृतिक चेतना, समस्त अवधारणाओं से मुक्त होेते हुए अन्तर्मुखी मन की अभिव्यक्ति है। मृत्यु भयभीत नहीं कर रही है, वह भी एक पड़ाव है, भागीरथी में स्नान है, यहाँ ‘मृत्यु गन्ध’ चिकित्सालय से आती हुई दूषित समीर नहीं है, वरन पतझड़ के बाद वसन्तागमन की सूचना है। ‘माँझी’ ही साथ है, वह विवेक है, वह उर्जा है, जो जीवन को आख़िरी साँस तक चला रही है। जीवन के प्रति सकारात्मक सोच तथा उदात्त मानव के चरित्रकंन का यह सारगर्भित प्रयास है।

”बह जाने की आशंका है, लहरों में इत- उत घबराकर
सह जाने की स्पर्धा है, क्या तुममें इनसे टकराकर,
घनघोर गरजते मेघों के, आगे थोडे़ से झुक जाओ“  माँझी, पृ. 347.
कवि दीपक की अपनी काव्य भाषा है, वे सहज प्रवाही भाषा के पक्षधर हैं। संग्रह में चयन की जो कमी रही है, उस ने कृति के सम्यक मूल्यांकन से समीक्षकों को दूर ही रखा है। सुधी समीक्षकों का ध्यान माधव सिंह दीपक की ओर भी जाना अपेक्षित है।


उपन्यास कार मधावसिंह ‘दीपक’ ऐतिहासिक उपन्यास कार थे। झालावाड़ अंचल की गागरेन दुर्ग की घटनाएं ,जौहर एवं   युद्ध ने जहां कथावस्तु का निर्धारण किया हैं वहीं अपने अंचल की भाषा को एक नया विस्तार भी दिया है।‘अचल दास की खींची’ की वचनिका से कथा सूत्र प्रभावित तो है, परन्तु कल्पना के मनोहारी प्रभाव ने इतिहास को सीमित नहीं होने दिया है।

 माधव सिंह दीपक के चार उपन्यास प्रकाशित हुए हैं । ‘ बाोलती लहरें‘, तलवार की छाया, रेत की आग, कर्नाटकी प्रकाशित हुये है ।

‘‘बोलती लहरें,’ गागरौन दुर्ग पर आधारित काल्पनिक कथा है । वर्णनात्मक शिल्प है । जातिगत विद्वेष केा केन्द्र में रखकर इस समस्या के समाधानन ढूंढने का प्रयास है ।

 भाषा सहज व प्रभावी है, परन्तु किस्सागोई की शैली में कथा सामान्य पाठकको आकर्षित करने में सफल है । पात्र अनेक है, प्रमूुख पात्र ‘कमलिनी और ‘ गुलाब सिंह हैं, जिनकी प्रेमकथा को कथाकार ने विकसित  किया है ।

‘ ‘तलवार की छाया ‘, यह राजा राणा जालिम सिंह के जीवन पर आधरित, ऐतिहासिक उपन्यास है । इसमें ‘दीपक जी‘ ने कल्पना प्रसूत कथा के स्थान पर, ऐतिहासिक तथ्यों को कथा में पिरोने का प्रयास किया है। नायक ‘ प्रधान यह उपन्यास अपने वर्णनात्मक शिल्प व सहज प्रभावी भाषा के लिए लोकप्रिय रहा है । ‘ भटवाड़े ‘ के युद्ध से लेकर, पृथक झालावाड़ राज्य की स्थापना, 80 वर्ष तक फैला हुआ ‘ समय ‘ यहां उपस्थित है ।

‘रेत की आग‘,
यह भी ऐतिहासिक उपन्यास कम, तथा कल्पना पर आधारित ऐतिहासिक ‘ रस ‘ का उपन्यास है । यहॉं कथाकार ने जोधपुर और जालौर के इतिहास की घटनाओं को ‘ कथा-रूप ‘ में विकासित करने का प्रयास किया है ।

‘कर्नाटकी‘, उपन्यास भी इसी क्रम में है । यह बूंदी के राजा बुद्ध सिंह के जीवन पर आधारित है । दीपकजी ने कथा का फलक तो विस्तृत लिया है, परन्तु सीमित दायरे में समाप्त करने की विवशता में उपन्यास उतने प्रभावी नहीं रहे ।

जीवन और जगत का स्वाभाविक और मार्मिक चित्रण.... कथाकार अपनी और से ही करने में रहा ... पात्र, ‘चरित्र में नहीं ढल पाए, परिवेश, इतिहास की प्रस्तुति नहीं कर पाया, वहॉं कल्पना पर आधारित कथा,... विकसित की जाती रही । शिल्प की कसावट, सुसंगतता का अभाव इन उपन्यासों की बहुत बड़ी कमी रही है । फिर भी दीपक जी ने इस अंचल में ‘ उपन्यास कला ‘ का ‘विकास ‘ लज्जाराम मेहता के बाद किया, यह उनकी बहुत बड़ी देन है ।

कवि और उपन्यासकर दीपक जी साहित्य के मौन साधक थे। वे साहित्य की गुटबंदी से बहुत दूर थे। स्वतंत्रतापूर्व झालावाड़ साहित्य का तीर्थ था। ब्रज भाषा अकादमी के निर्माण के साथ हमने महाकवि हरनाथ को ही विस्मृत कर दिया है। उनकी काव्य परंपरा में ही श्री दीपक विकसित हुए थे।  महाकवि हरनाथ को भी हम  पूरी तरह भूल चुके हैं।

कुछ दिन पहले मित्र कहीं कह रहे थे , हमारे जाने के बाद हमारे साहित्य को और हमे ंकौन याद रखेगा , इसका उत्तर यही हैं, हम आत्ममुग्ध नहों , परंपरा के दाय को सम्हालते हुए अपनी साहित्यिक यात्रा पर चलते रहें , मार्ग अवरुद्ध न हो बस यही काम करते रहें।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सटीक,,,, आपको साधुवाद। श्री दीपक जी का उपन्यास बोलती लहरें मैंने कुछ वर्षों पूर्व झालावाड़ स्थित राजा हरिश्चंद पुस्तकालय से पढा था। वह दीपक जी की उत्कृष्ट रचना है।
    -हरीश खलोरा, 9672986489

    जवाब देंहटाएं