बुधवार, 4 दिसंबर 2013

हमारे पुरोधा मास्साब मदन लाल पँवार


  हमारे पुरोधा मास्साब  मदन लाल पँवार

तब मैं भाटापाड़ा कोटा  के प्राईमरी स्कूल में भरती हुआ था। मेरी बड़ी बहिन जो मुझे घर में पढ़ाती थीं, पहली बार शाला में लेगईं थीं। तीसरी कक्षा में मास्साब मदनलाल जी ने अंत्याक्षरी प्रतियोगिता आयोजित की थी। मेरी बहिन को कविताओं का बहुत शौक था , सुभद्राकुमारी चौहान की कविताएॅं उन्हें कंठस्थ थीं। मुझे भी तब राधेश्याम रामायण की चौपाइयॉं याद करवाई गईं थीं। उस प्रतियोगिता में मास्साब ने मेरा भ्ी चयन किया था। तब और आज के स्कूलों में बहुत बदलाव आगया है। आज बहुत कुछ उपलब्ध है, पर जो चाहिए था वह खोगया है। मास्साब ने हमारी तैयारी करवाई थी। हर छंद ”थ“ वर्ण पर समाप्त हो सिखाया गया था। तब की  वे पुरानी कविताएॅं वार्धक्य की इस सीमारेखा पर आज भी याद आती हैं,  पर स्वयं की रचित कविताएॅं, याद ही नहीं रहतीं।

मास्सब हमको पाटनपोल के किसी स्कूल में लेगए थे। तब पैदल ही जाना होता था। वहॉं हमारा स्कूल प्रथम आया था। पॉंचवीं के बाद मैं अलवर चला गया था। अपने बड़े भाई त्रिभुवननाथ जी के पास ही बादमें अध्ययन किया। आज  स्मृतियों सारे शिक्षक चले गए पर मास्साब आज भी याद आते हैं। शायद साहित्य के प्रति अनुराग मैंने वहीं पाया हो। वे शाला में हर शनिवार को साहित्यिक कार्यक्रम रखाकरते थे। महपुरुषों की जयन्ती मनाते थे।

बाद में जब कोटा लौटा , यहॉं से हिन्दी मैं एम.ए भी किया पर मास्साब याद नहीं आए। शायद तब मैं झालावाड़ में पद स्थापित था तब मंडाना के आसपास के किसी सरकारी कर्मचारी ने बताया था कि मदनलाल जी पंवार मंडाना के पास किसी खेत पर रहते हैं। काफी अवसाद में है। कभी- कभी कोटा जाते हैं, पर उनकी पहचान खो गई है। नशे में रहते हैं। मैं उन्हें खोजता हुआ गया, बातें की स्कूल की याद दिलाई वे पहचान गए। कवि पंवार वापिस लौट आए। उन्होंने कविताएॅं सुनाई , अपनी किताब दी। वे सन 1947 से पहले से लिख रहे थे। कोटा के सम्मानित कवि थे।
 परन्तु अचानक राजनीतिक पंडितों  के साहित्य में सक्रिय होने से तब से सही साहित्य कर्मियों की उपेक्षा प्रारम्भ होने लग गई थी।  मुझे बाद में कुछ मित्रों ने बताया था कि वे नशे में गोष्ठियों में आ जाते थे, उन्हे बाहर निकालना पड़ता था।
कहीं पढ़ा था, प्रतिभा का जब समाज सम्मान नहीं करता है, तब निराशा और अवसाद ही साहित्यकार के मित्र बन जाते है। दूसरे की हत्या से अधिक घृणित दूसरे के आत्मसम्मान को कुचलदेना अधिक दुखद है। न जाने क्यों सृजनशील व्यक्त्वि ही अधिक तकलीफ पाते हैं। उनके साहित्य के संबंध में मैंने कहीं नही पढ़ा, वे कब दुनिया से चले गए ,मुझे भी नहीं पता ,पर इतना मुझे याद है,सन 45 से पचपन के बीच वे कोटा के प्रसिद्ध रचनाकार रहे। आपकी कृति ”क्रांति किरण “ मेरे पास है। उनकी अन्य कोई कृति प्रकाशित हुई हो, यह सूचना मेरे पास नहीं है।
कवि मदन लाल पँवार की कृति ‘क्रान्ति किरण’ सन् 1953 ई. में प्रकाशित हुई थी। कृति में स्पष्टतः दो विभाजन हैं। स्वतन्त्रता से पूर्व तथा उस के पश्चात।
‘क्रान्ति’ की भूमिका में शम्भू दयाल जी सक्सेना ने लिखा है कि वे अपने समय के लोकप्रिय कवि हैं। । कवि पँवार की कविता में तत्कालीन सामाजिक दुर्दशा तथा पराधीनता से उत्पन्न ग्लानि बीज बन कर, अभिव्यक्ति पाना चाहती है। उस काल के कवियों के सामने परिवेशगत सच्चाई, स्पष्ट थी। छायावादी कवियों की तरह पलायन और कला के प्रति रुझान यहाँ परिलक्षित नहीं रहा है।

”आज बन्धन मुक्त माता हो,
 यही अभिलाषा मेरी
आज अपने ही करांे से
लूँ मिटा अस्तित्व अपना
शीश के बदलेे कहीं यदि
पा सकूँ मैं स्वत्व अपना

एक क्या शत जन्म ले कर
शीश हँस-हँस कर चढ़ाऊंॅं
निज करांे से चण्डिका का
रिक्त खप्पर भर बढ़ाऊॅं।“41
भावोद्रेेक कवि की पूँजी है। शब्द चयन तथा गति, सौन्दर्य प्रभावी है।
”हे, उड़ते विहग ज़रा उन से
कह देना, दूर विषाद हुआ
माता के बन्धन टूट गए
भारत फिर से आज़ाद हुआ।“

कवि सन् 1947 ई. की पन्द्रह अगस्त का स्वागत करते हुए गीत गा रहा है, वह उन नाम-अनाम शहीदों की स्मृति में, उन तक स्वतन्त्रता का सन्देश पहुँचा रहा है।
‘शिक्षक’, ‘युवक’, ‘किसान’ एवं ‘नरेश’ इस संग्रह की अन्य कविताऐं हैं। इस अ´चल की हिन्दी कविता को कवि पँवार का योगदान रहा है। आप की काव्य-भाषा सहज, प्रभावी है। आप ने अपनी कविताओं में परिवेशगत सच्चाईयों को यथारूप अभिव्यक्ति देने से बचते हुए, भावनाओं का अतिक्रमण करते हुए, नैतिक आग्रह को जन सामान्य के लिए सहज गम्य बनाने का प्रयास किया था। इस रूप में वे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण हैं।
कुछ मित्रों के पास और जानकारी होगी, बॉंटें , यह एक यज्ञ है, जहॉं हम हमारी उस पीढ़ी के प्रति जो साहित्य सृजन में लगी रही, पर अब वे विस्मृति के अंधकार में खोगई हैं, उस परंपरा से नई पीढ़ी को परिचित कराएॅं,।

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