मंगलवार, 20 जनवरी 2015

भूले बिसरे चित्र रमेश चन्द गुप्त

भूले बिसरे चित्र

रमेश चन्द गुप्त

मैं जब सेवानिवृत्ति के बाद जब कोटा आया था, तब किसी कवि गोष्ठी में पहलीबार गुप्ताजी से मिलना हुआ था। अत्यधिक विनम्र तथा संवेदनशील कवि थें उन्होंने ही बताया था कि वे सेवानिवृत्ति के बाद ही काव्यजगत में आए थे। उनका कंठ मधुर था। वे तन्मयता से गीत पढ़ते थे। अस्वस्थ रहते थे। हर बार यही कहते थे, ईश्वर की कृपा हुई तो फिर मिलना होगा।
उनकी सरलता और गीतात्मक अभिव्यक्ति का मुझ पर प्रभाव था, जब वे कविता पाठ करते थे, तब मैं उनके शब्दों के साथ उनके भावजगत में खो जाता था। मैं उनके जाने के बाद उनको भूल ही गया था कि कोटा में प्रेस क्लब में जब नंद बाबू को श्रद्धांजलि दी जारही थी , तब इन्द्र बिहारी जी ने अवगत कराया था कि आज जल्दी जाना है, जंक्शन पर गुप्ता जी की पुण्य तिथि मनाई जा रही है, अचानक गुप्ताजी की स्मृतियॉं समीप आगई्रं।
कोटा के साहित्यप्रेमी तो उनसे परिचित थे , पर बाहर भी मित्र उनकी कविताओं से परिचित हो सकें , यही आशा  है। आपके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हुए थे। आपके निवास पर अक्सर कवि गोष्ठियॉं होती थीं, जहॉं जंक्शन पर मित्रों से मिलना हो जाता था।
‘गीत जाह्नवी’ (2002 ई.) रमेश चन्द गुप्त की कविताओं का संग्रह है। रमेश चन्द गुप्त सांस्ड्डतिक काव्य धारा के कवि हैं। वे सुमधुर गीतकार हैं, तन्मयता से गीत गाते हैं। उन की भाषा सरल, सहज व प्रभावोत्पादक है। छन्द वैशिष्ट्य उन का अपना है। राग, छन्दों में समादृत हो कर स्वतः विस्तृत होती है। भाषा आम जन की है, पर शब्दार्थ की रमणीयता उन की विशिष्टता है।
यहाँ जन, मनुष्यता  की  पीर  का  वाहक  है। वह  ‘स्वयं’  सेवार्थी  है। यहाँ  करुणा  मात्र  सम्वेदना  की  वाहक नहीं है,  वह  ‘कर्मरत जीवन’  को  समर्पण  के  लिए प्रेरित करती है:-
”चुन सको तो चुनो, बन्धु ऐसी डगर
जो निहारा करे नित्य गन्तव्य को,
जहां कर्म का लक्ष्य निर्मल नहीं
निरर्थक हुआ हाय, जीवन मरण।
अत्यन्त  संक्षिप्तता  में, काव्य भाषा सूत्रात्मक हो जाती है। ‘शब्द’ स्वतः सहज गेयता मंे, अपने लक्ष्य को सम्वेदित करने में समर्थ हैं। पर यह सपाट बयानी नहीं है।
”स्नेह और बन्धुत्व भूमिगत
जीवन के विश्वास खो गए
मर्यादाएं शिष्ट आचरण
अब तो बस इतिहास हो गए।
‘भूमिगत’  शब्द, व्यंजना में, आज की भौतिकवादी सामाजिक संरचना के समस्त विद्रूप को सरलता से पर्त-दर-पर्त खोलता जाता है।
”शोषक औ शोषित का शाश्वत
वैरभाव चलता आया,
नेह नहीं हो सकता भोली
मछली का मछुआरों से।“
वर्ग वैषम्य की आधार शिला और उस के द्वन्द्व को, जहाँ जनवाद प्रतिवाद, प्रतिकार, प्रतिशोध की भाषा सौंपता है, वहाँ रमेश चन्द गुप्त, विवेक की भूमि पर, सामर्थ्य का सदुपयोग कर के, कर्मरत जीवन को वरेण्यता सौंपते हैं। रमेश चन्द गुप्त, ? मैथिली शरण गुप्त की विस्मृत काव्य धारा, शब्दावली व रूप विधान का आभास, याद दिला जाते हैं। जो गेयता के कारण ‘जन काव्य’ बन गई थी।
‘मुट्ठी भर मधुमास (2006 ई.), गीतकार रमेश चन्द गुप्त का दूसरा काव्य संग्रह है।
रमेश चन्द गुप्त, सांस्कृतिक काव्य धारा के कवि हैं। उन के ‘काव्य रूप’ तथा ‘काव्य वस्तु’ अपनी ज़मीन की उपज हैं। वे जहाँ ‘मनोजगत’ में अपने शब्दों का आधार तलाश करते हैं, वही बाह्य जगत की विसंगतियों से आहत हो कर, उस पीड़ा को सार्वकालिक व सार्वभौमिक बनाने का प्रयास भी करते हैं:-
”पन्थ है अवसाद बोझिल
और घायल है चरण।
कामना के कल्प तरु का
पर नहीं बन्ध्याकरण।“
‘कामना का कल्प तरु’, पृ. 37.
यहाँ व्यक्ति-मन की पीर, अचानक जब निर्वसना हो जाती है तब ‘व्यक्ति मन’, ‘समष्टि मन’ में परिवर्तित हो जाता है:-
”सभ्य जगत में मर्यादा का
बजता रहा सदा इकतारा
लोकतंत्र के गलियारों से
पर संयम-संकेत खो गए।“1 ‘बुनते-बुनते’, पृ. 94.
रमेश चन्द गुप्त की ‘काव्य भाषा’ प्रसाद मयी है, इस में लालित्य है। छन्द में एक स्वाभाविक गति है। यहाँ शब्द क्षिप्र गति से प्रवाहित नदी की शान्त लहरों की तरह तट को छूते हैं। सहज स्वभाविकता, तथा मन्थर गति, उन की काव्य रचना की अपनी विशिष्ट पहचान है। अनुकरण तथा अनुकरण से दूर कवि गुप्त की कविता में जहाँ अनुभूतियों का विरल संगुफन है, वहीं अभिव्यक्ति के स्तर पर मधुरतम सूत्रात्मक भाषा की खोज, उन की कविता का अपना सौन्दर्य है।

आज कवि गोश्यिों में कृत्रिम अट्टहास तथा ”अपना पढ़ा और चुपचाप चलते बने“ की परंपरा विकसित होगर्इ्र है, वहॉं  रमेशचंद्र गुपत की स्मृतियॉं एक सुगध मय हवा का स्पर्श करा जाती हेैं ।

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