
सोमवार, 15 अप्रैल 2019
शुक्रवार, 10 जून 2016
मानव धर्म की भूमिका
मानव धर्म की भूमिका
धर्म हमारे समाज में सदा से ही बहुमूल्य रहा है। आचार्यों ने इसकी अनेकों प्रकार से परिभाषा की हैं आज हमारा समाज इसी प्रश्न को लेकर सबसे अधिक चिंतित है। शताब्दी हुयी जब बंग भूमि से यह संदेश सारी दुनिया में प्रसारित हुआ था कि सभी धर्मो का सार तत्व एक ही है। वह है परमात्मा की प्राप्ति और वह भी इसी जीवन में ही संभव हैं।
परमहंस रामकृष्णदेव ने धर्म की समन्वयवादी धारा दुनिया को देते हुए मानव धर्म को समस्त संसार में प्रतिपादित किया था।
आज पशुओं के समाज की तो हम पहचान करते हैं, परन्तु जब मनुष्य के बारे में चर्चा होती है तो लगता है, मनुष्य का धर्म, उसका स्वभाव ही कहीं खो गया है। मनुष्य या तो हिन्दू हैं, या मुसलमान है, या ईसाई है, या जैन है, या बौद्ध है, भूगोल के आधार पर कहीं वह अमेरिकी है, कहीं वह रूसी है। कहीं वह अमीर है, कहीं वह गरीब है, कहीं वह कांग्रेसी हैं, तो कहीं कम्युनिस्ट हैं।
स्वामी विवेकानंदजी आधुनिक हिन्दू धर्म के महान प्रवक्ता थे हिन्दू धर्म पर अपने आलेख में आपने कहा है-
”हिन्दू लोग अपना धर्म प्राचीन वेदों पर आधारित करते हैं, जिनका नाम ‘जानना’ अर्थ देने वाली विद् धातु से बना है। वे एक ऐसी ग्रंथमाला हैं, जिनमें हमारे विचार से, सभी धर्मों का सार-तत्त्व सन्निहित है, पर हम ऐसा नहीं मानते कि सत्य केवल उनमें ही है। ग्रन्थ हमें आत्मा के अमरत्व की शिक्षा देते हैं। हर देश में और हर मानव-हृदय में एक दृढ़ सन्तुलन खोज निकालने की प्राकृतिक चाह है- कुछ ऐसा खोजने की चाह, जो कभी बदलता न हो। हम ऐसी वस्तु प्रकृति में नहीं पा सकते, क्योंकि यह समस्त विश्व अनंद परिवर्तनों का एक समूह मात्र ही तो है। किन्तु इससे यह परिणाम निकालना कि अपरिवर्तनशील कुछ है ही नहीं, दाक्षिणात्य बौद्धों और चार्वाकवादियों की ही भूल में पड़ना है। इनमें चार्वाकवादी विश्वास करते हैं कि जड़ पदाथ्र ही सब कुछ है और मनस्तत्त्व कुछ भी नहीं, तथा धर्म केवल मात्र धोखा है और नैतिकता तथा साधुता बेकार के अंधविश्वास मात्र हैं। वेदांत दर्शन हमें सिखाता है कि मनुष्य अपनी पाँच इन्द्रियों से बँधा नहीं है। वे केवल वर्तमान को जानते हैं, भविष्य या भूत को नहीं, किन्तु चूँकि वर्तमान में भूत और भविष्य भी निहित होते हैं तथा तीनों ही केवल समय के विभाजन मात्र हैं, वर्तमान भी अज्ञात होता, यदि कुछ ऐसी वस्तु न होती, जो इन्द्रियों से परे है, जो समय से स्वतंत्र हैं, तथा जो भूत और भविष्य को मिलाकर वर्तमान में एकीभूत कर देती है।$$$$$ वेद कहते हैं,समस्तसंसार स्वतंत्रता और परतंत्रता का , मुक्ति और बंधन का मिश्रण हैं, किन्तु इन सबके माध्यम से स्वतं?,अमर,शुद्ध, पूर्ण और पवित्र आत्मा देदीप्यमान है। भाग1 पृ259
वेदों के श्रुुति आधार को सपष्ट करते हुए आपने कहा था-
”वेदों का अर्थ है, भिन्न भिन्न कालों में भिन्न भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष। जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त मनुष्यों के पता लगने के पूर्व से ही अपना काम करता चला आया था और आज यदि मनुष्य-जाति उसे भूल भी जाय, तो भी वह नियम अपना काम करता ही रहेगा, ठीक वही बात आध्यात्मिक जगत् का शासन करने वाले नियमों के सम्बन्ध में भी है। एक आत्मा का दूसरे आत्मा के साथ और जीवात्मा का आत्माओं के परम पिता के साथ जो नैतिक तथा आध्यात्मिक सम्बन्ध हैं, वे उनके आविष्कार के पूर्व भी थे, और हम यदि उन्हें भूल भी जायँ, तो भी बने रहेंगे।“ हिन्दू धर्म पर निबन्ध भाग1 पृ8
हम विभिन्नताओं में, सार तत्व की खोज करना चाह रहे हें धर्म ही जीवन का सार तत्व हे। ईश्वरानुभूति ही लक्ष्य हे। सथी नदियॉं , जल प्रपात उसी महारसागर की दिशा में जा रहे है। कर्म कांड का ही मतभेद हे। यह भेद किताबों का, धर्म गुरुओं का है,विधि का हें परमतत्व एक ही है। उसके नाम , उसकी संज्ञा अनेक हो सकती हैं।
स्वामी विवेेकानंद जी के शब्दों में ,” जिस सर्वोच्च लक्ष्य की कल्पना सभी धर्म कर सकते हैं, वह है एक आध्यात्मिक सत्ता की। अतः कोई भी धर्म उससे परे की शिक्षा नहीं दे सकता, हर धर्म में एक सारभूत सत्य होता है, और उस रत्न को धारण करने वाली एक गौण मंजूषा होती है।“ भाग1 पृ283
आज धर्म और उसका स्वरूप ही कहीं खो गया है। मनुष्य अपनी पहचान अपने आपसे ही खो बैठा हैं। धातु की पहचान की उसका स्वभाव है। वही उसका धर्म है। पशु की पहचान उसका स्वभाव है। वह उसका धर्म है। परन्तु मनुष्य का धर्म, मनुष्य अपने मनुष्यत्व को ही खो बैठा है। परमहंस का आहृान इसी धरती पर मनुष्यत्व की स्थापना का था। उन्होंने नाना पंथों की आध्यात्मिक धारा के अनुभव की ज्ञानगंगा से होकर ही यह सत्य पाया था।
कालान्तर में उनका भव्य राज मार्ग भी संकीर्ण होता चला गया। वहां भी एक पंथ हो गया। अन्य पंथ आये व खंडन मण्डन में चले गये आध्यात्म की भूमि भारत है तथा पदार्थ जन्य ज्ञान की भूमि अमेरिका है यूरोप है। दोनों ही ज्ञान के बिना मनुष्य अधूरा है। मात्रा जड़ पदार्थ ही नहीं हैं, वह चेतना का समवाय भी है। जिनकी चेतना की पहचान ही आत्मसाक्षात्कार है। यही उसका स्वभाव है वह खो गया है जिसे उसे पाना है।
धर्म महासभा में अपने हिन्दू धर्म पर निबंध में स्वामीविेकानंदजी ने कहा था,-”
वहाँ भारत में एक के बाद एक न जाने कितने समप्रदायों का उदय हुआ और उन्होंने वैदिक धर्म को जड़ से हिला सा दिया; किन्तु भयंकर भूकम्प के समय समुद्र-तट के जल के समान वह कुछ समय पश्चात् हजार गुना बलशाली होकर सर्वग्रासी आप्लावन के रूप में पुनः लौटने के लिए पीछे हट गया; और जब यह सारा कोलाहल शान्त हो गया, तब इन समस्त धर्म-सम्प्रदायों को उनकी धर्म-माता (हिंदू धर्म) की विराट् काया ने चूस लिया, आत्मसात कर लिया और अपने में पचा डाला।
वह संसार की अवहेलना नहीं कर सकता है। यह ठीक है, यह माया है, परन्तु इसकी भी व्यवहारिक सत्ता है। कर्म से मनुष्य बच नहीं सकता है। कर्म ही कर्म से सन्यास दिला सकता है मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूर्णता को पाना है,शारीरिक, आर्थिक, मानसिक, बौद्धिक जो भी शक्तियां प्राकृतिक विधान से पायी गयी हैं, उनका पूर्ण विकास कर उस सामर्थ्य का सदुपयोग करना ही मनुष्य की भौतिक यात्रा का उद्देश्य है। श्रुति ने स्पष्ट निर्देश दिया है ”त्येन त्यकेन भुंजीथा” त्याग करते हुए भोग करो यह सम्पत्ति किसी की भी नहीं है। यह तो ईश्वरीय विभूति है। इसका सम्पादन होना ही जन्म मृत्यु का कारण है।
यह मात्र भोग भूमि ही नहीं हैं, यह तो लीला भूमि भी है। लीला भूमि में सारा कर्म खेल है। नट नटी का खेल है। जो कुशलता से खेला जाता है। अपना खेल भी खेलते रहो, आगे यह ध्यान रहे कि किसी का खेल हमारे कारण से बिगड़ने नहीं पाये, यही परोपकार कहलाता है। तब मनुष्य पाता है, सुख इन्द्रिय जन्य है। शांति अनुभव जन्य है, सुख का भोक्ता शरीर है। शांति मन के करण से संपादित होती है। और अहर्निश शांति में रहने से जब मन, मन से पार चला जाता है वहां मात्रा रह जाता है, आनन्द।
यही तो पूर्ण मनुष्य का स्वभावव है। जिसकी प्रवृत्ति मात्रा अहिंसा है। जिसका सौन्दर्य मात्रा प्रेम है। जो वर्णना से रहित है। जो मात्रा मनुष्यत्व की सुगंध हैं।
हिन्दू धर्म पर निबन्ध में आपने भारतीय चिन्तन की महानतम देन को स्पष्ट करते हुए कहा था-
उन्होंने कहा है कि मनुष्य को इस संसार में पद्यपत्र की तरह रहना चाहिए। पद्यपत्र जैसे पानी में रहकर भी उससे नहीं भीगता, उसी प्रकार मनुष्य को भी संसार में रहना चाहिए- उसका हृदय ईश्वर में लगा रहे और उसके हाथ कर्म करने में लगे रहें। भाग1 पृ13
इसी संसार में रहते हुए मनुष्य अपनी आध्यात्मिक यात्रा के सर्वोच्च लक्ष्य परमात्मा शक्ति का अनुभव प्राप्त कर जीवन को समाज, परिवार व व्यक्ति के विकास के लिए किस प्रकार समर्पित कर सकता है, यही पाना मनुष्य का लक्ष्य है। हम जब प्रकृति में दो पत्तियों एक जैसा नहीं पाते, तब सबके लिण् एक ही धर्म किा प्रकार चाह सकते हैं।
इस विभ्न्निता को संकेतित करते हुए भारत में ईसाई धर्म नामक आलेख में विवेकानेदजी ने कहा था-
”मनुष्य भिन्न होते हैं। यदि वे ऐसे न होते, तो विश्व-मनोवृत्ति का पतन हो जाता। यदि विभिन्न धर्म न होते, तो कोई धर्म जीवित न रहता। ईसाई को अपने धर्म की आवश्यकता है, हिन्दू को अपने धर्म की। सभी धर्म एक दूसरे से वर्षों से संघर्ष कर चुके हैं। जो धर्म किसी ग्रंथ के आधार पर संस्थापित हुए हैं, वे अभी भी टिके हुए हैं। ईसाई यहूदियों का धर्म-परिवर्तन क्यों नहीं कर सके? क्योंकि वे पारसियों को ईसाई नहीं बना सके? क्यो वे मुसलमानों को धर्मान्तरित नहीं कर सके? चीन और जापान पर कोई प्रभाव क्यों नहीं डाला जा सका?
प्रथम मिशनरी, धर्म, बौद्ध धर्म में धर्म परिवर्तितों की संख्या, किसी अन्य धर्म में परिवर्तित जनों की संख्या से दूनी है और उन्होंने तलवार का प्रयोग नहीं किया। मुसलमानों ने सबसे अधिक हिंसा का प्रयोग किया। तीनों महान् मिशनरी धर्मों में उनकी संध्या सबसे कम है। मुसलामनों का समय बीत चुका है। हर दिन तुम ईसाई राष्ट्रों का रक्तपात से भूमि पर अधिकार करने की बात पढ़ते हो।
धर्म-प्रचारक इसके विरूद्ध क्या उपदेश देते हैं। सर्वाधिक रक्तपिपासु राष्ट्र, उस कथित धर्म पर, जो ईसा का धर्म नहीं है, क्यों गर्व करें? यहूदी और अरब ईसाई धर्म के पिता थे और ईसाइयों द्वारा उन्हें कैसा पीड़ित किया गया! भारत में ईसाइयों को कसौटी पर कसा गया है और वे खोटे सिद्ध हुए हैं। मेरा आशय निर्दय होने का नहीं है, पर मैं ईसाईयों को दिखाना चाहता हूं कि दूसरे उन्हे कैसे देखते हैं। जो धर्म-प्रचारक नरक के अग्निमय गर्त का भय दिखाकर उपदेश देते हैं, उन्हें आतंक से देखा जाता है। मुसलमानों की लहरों पर लहरें तलवार झुमाते हुए भारत में गिरी और आज वे कहाँ हैं? भाग1पृ 283
हम एक नए धर्म की चर्चा कर धर्म परिवर्तन और सांप्रदायिक आग्रह का निषेध करते हे। विवेकानंद जी मानव धर्म की खोज में थे, तहॉं मनुष्य इसी जीवन में स्वतंत्रता पा सके। हर महापुरुष ने उसकी मुक्ति की चाह
रखी है, इस्लामिक साधना में रूह का पवित्र होते हुए अंत में फ़ना हो जाना सार तत्व हे। सूफ़ी परम्परा भक्ति की परमावस्था है।
आज विश्व समुदाय उस पथ की खोज में हैं जो मनुष्यता को उजागर कर सके। जो समाज को सुख शांति दे सके। जहां पूंजीवाद आज सम्पूर्ण समाज पर, विश्व पर अपनी मनोहारी, आत्मघाती प्रवंचकी मुद्रा से भादों की काली घटा की तरह छाता चला जा रहा है। वहीं साम्यवाद ”मागृधः कस्य स्वित् धनम् के सूत्र के साथ लिए यह संपत्ति किसी की भी नही है। कहता हुआ, आचरण में उत्कट भोग और हिंसा का गठजोड़ देखकर हताश है।पर उसका वट वृक्ष उखड़ गया है। पूंजीवाद इसमें अपनी विजय देख रहा है। परन्तु पूंजीवाद मनुष्यत्व के शोषण का अनन्यतम प्रयास है। यह मात्रा मनुष्य को एक उपभोक्ता सामग्री में ही बदल रहा है। यहां मानवीयता नहीं है। मात्रा जड़ता है।
इस धरती का संदेश जहां जितना पुराना रहा है, वहीं उतना ही अधुनातन भी रहा है, यह सम्पति किसी की भी नहीं है, यह सच है, परन्तु ईशा का वास, जड़ चेतन सभी में हैं। यह ऋषि का अनुभव गम्य जयघोष था अधूरे चिंतन पर कोई इमारत खड़ी नही हो सकती। भारत का भविष्य संपूर्ण विश्व का भविष्य है।
भारत को आज अपनी पहचान तलाश करनी है। उसका मार्ग न पूंजीवादी व्यवस्था में हैं, नहीं साम्यवादी जमीन पर है। भारत के भविष्य दृष्टा, मानवीयता की तलाश में वादों की भूलभूलैया में कैद होते चले गये हैं।
हम हिन्दू हैं, धार्मिक है, शरीर का और जीवन का उद्देश्य जानते है। इसी जीवन में ईश्वरानुभूति के मार्ग पर अग्रसर हैं। हम मानते हैं, धर्म हमारा प्राण है।
हमारे धर्म की सामान्य सार बातों पर चर्चा करना उचित मानते हैं।
धर्म के जगत में यहां मात्र शब्द ही महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण आचरण है। भारतीय चिंतन सुख के विरोध में नहीं है। सुख की खोज ही मनुष्य की यात्रा का प्रथम पड़ाव रहा है। यही पूंजीवादी विचारधारा की आकर्षक भूमि है। औपनिषदिक धारा सुख के विरोध में नहीं है। तपस्या का अर्थ शरीर को यातना देना नहीं है। भौतिक वाद की अवहेलना कर, आज मनुष्य जी नहीं सकता है। आज तथा कथित संप्रदाय जो भारतीयता का जयघोष कर पुष्पित व पल्लवित हो रहे हैं। वे यूरोप व अमरीका जाकर वहां से मात्र संपत्ति ही बटोर कर ला रहे हैं। न इधर के रहे न उधर के रहे।
विदूषकों की जमात खड़ी हो गई है। शब्द बासी भोजन की तरह हो गये हैं। और यही कारण है कि संपूर्ण विश्व में भारत की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। स्पष्ट चिंतन, अभय की जमीन पर खड़ा होता है। जब आत्मलीन हंस, मान सरोवर से जुड़ता है, जिसका एक पंख अभय का है, तथा दूसरा विवेक का है, तभी चिंतन के कण ज्योतित होते हैं।जिसको प्रचार की आकांक्षा है, पंथ की आकांक्षा हो, धर्म को राजनीति में जोड़कर प्रभुत्व प्राप्ति का लक्ष्य हो, वह भारतीय आर्ष चिंतन से कोसों दूर हैं। हमें भौतिकवाद को उसका सही स्थान देना होगा। और वह माया ही नहीं, लीला है, यह आधार भूमि है। नाटक है। एक बहुत बड़ा खेल है। स्वप्न तो इसलिए मिथ्या है कि उसमें निरन्तरता नही है। परन्तु जो जाग्रत में भासता है क्या वह भी निरन्तरता में रह पाता है ? यह भी तो उसी तरह निरन्तर गत्यात्मकता में हैं।
परन्तु उसका अर्थ यह नहीं है कि कार्य ही नहीं किया जावें। लीला में कर्म मात्र खेल है। यह तो प्रभु की लीला है। चिरंतन नृत्य है। बूंद के साथ मटमैलापन भी है। धीरे धीरे मटमैलापन कम हो जाये। और वह उज्जवल शुभ हो जावे ताकि ज्योति उसके पारदर्शी तल को ज्योतितं कर जावे, यही साधना रहस्य है।
यही कारण है जो नई राह बनाते हैं, वे परंपरा का अवदान तो होते हैं, परन्तु वे परम्परा के बीच से स्वतः ही हटते जाते हैं। वे मात्र अनुकरण कर्ता नहीं होते, वे मात्रा मौलिक होते हैं। सृजनात्मकता वहीं जन्मती है, जहां पुराना अवदान अपना आशीष देकर स्वतः ही पतझड़ के पत्तों की तरह खामोश विदा ले पाता है। और परम्परा सदा गत्यात्मक होती है, है, परन्तु रूढ़ियाँ जड़ होती है। ये नदी के प्रवाह पको रोकती है। सृजनात्मकता का जन्म इन परम्पराओं के अंतिम छोर पर होता है, जहां परम्परा अपना अवदान सौंपकर स्वतः सन्यासोन्मुख हो जाती है। परम्परा का यहां निर्वाह नहीं होता वरन् गत्यात्मकता प्रयोगी की नई राह सौंपती है। जहां तक पथ है वहां पर परम्परा है। परम्परा में पद चिन्ह होते हैं। परन्तु जो परम्परा को धन्यवाद देकर गतिशील होते हैं। वहां चरण सुरक्षित नहीं रहते हैं। यही पथ विहिन पथ है। जो पथ पर ही हैं, वहां मौलिकता की संभावना तो है, परन्तु सृजनात्मकता अभी गर्म में ही है।
हमारी दृष्टि में , यह सच है, आधुनिकता कभी ओढ़ी नहीं जाती है। आधुनिकता वही जन्मती है, जहां चित्त इतना संवेदनशील हो जाता है कि उसकी समस्त अवधारणाएं चली जाती है। यह चित्त की वह विशेष अवस्था है जहां पतझड़ की तरह सब वासनाएं झड़ जाती है। रह जाता है मात्रा एक खालीपन एक खुला आकाश उसी में आनन्द उपजता है। यही मौलिकता पैदा होती है। यही सृजनशीलता है।यही धार्मिकता है।
स्वतंत्रता जहॉं हर प्रकार का दासत्व चला जाता है।
स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था, हिन्दू धर्म में सभी के लिए सारतत्व है, हम सझने का प्रयास करें-
”ईसाई धर्म जैसे सभी धर्मों का दोष यह है कि उनमें सभी के लिए एक ही नियमावली है। किन्तु हिन्दू धर्म सभी प्रकार की धार्मिक अभीप्सा अैर प्रगति की सभी कोटियों के लिए उपयुक्त है। उसमें सभी आदर्श अपने पूर्ण रूप में है। उदाहरण के लिए शांत या परमानन्द का आदर्श वशिष्ठ में मिलता है, प्रेम का कृष्ण में, कर्तव्य का राम और सीता में बुद्धि का शुक्रदेव में। इन और अन्य आदर्श पुरुष के चरित्रों का अध्ययन करो। ऐसे एक को ग्रहण करो, जो तुमको सर्वाधिक अनुकूल लगा हो। स्फुट विचार भाग1 पृ303
आज पश्चिम जिस आधुनिकता की चर्चा करता है, वह उसी प्रकार से है, नीले रंग को छोड़कर हरे रंग के कपड़े पहन लेना। कपड़े कपड़े ही है। कपड़ों के बदलने से रूपान्तरण नहीं आता इसीलिए महावीर ने ”दिगम्बर” की चर्चा की थी। परन्तु जो नंगे हो गये, वे भी परम्परा का अवदान तिरस्कृत कर रूढ़ियों के जाल में चले गए। यहां दिगम्बरता आधुनिकता में परिवर्तित नहीं हो पायी। आधुनिकता सभी अवधारणाओं के व्यापक दबाव से मुक्त मन में उपजती है। जो आधुनिक है, वही मुक्त है। जो मुक्त है वही आधुनिक है। और वास्तव में वही धार्मिक है।
परमहंस ”होमा” पक्षी का उदाहरण दिया करते थे। जो आकाश में ही जन्म लेता और अचानक ही आकाश में इस भय से कि कहीं नीचे आकर मर नहीं जाए वह उड़ने लग जाता। ”होमा” पक्षी का उदाहरण इस मौलिक परिवर्तन की सूचना है। जहां जो घटता है, वह अचानक घटता है। सतत प्रक्रिया उसके अंडज तक होने की है। परन्तु जो मौलिक परिवर्तन उसमें आता है, जहां उसके पंख निकल आते हैं, वह उड़ने लग जाता है। यही मुक्ति पर्व है।
सामान्य हिन्दू भी सांप्रदायिक नहीं होता, वह मस्जिद के सामने से जब गुजरता है, हाथ जोड़ देता है। वह ताकजण् के नीचे से गुजरना चाहता है, उसका विश्वास है, इससे उसका भला होता हे। मानव धर्म वहीं है , जो हर मनुष्य के अभ्युदय और निश्रेयस की कामना रखता है।
धार्मिक वह है जो प्रयोगशील है। जो सत पथ का अन्वेषी है। परन्तु यही नहीं होता है, हम मात्र अनुकरण के पुतले होकर रह जाते हैं। यही विवशता है। जो सत्य पथ का अन्वेषी है, वह कहीं रूकता नहीं है। मात्रा चरेवैति यही पथ रहता है। वहां पर भी रूक गए तो मोह होगा, आत्म मुग्धता सबसे अधिक भयानक है। निज का निज पर जो सम्मोहन होता है, वह आत्मघाती होता है। इस दासता विकारी के साथ ले आता है।
इसलिए भागों मत, सामना करो। संसार में ऐसा कोई अरण्य नहीं हैं, जहां समस्याएं नहीं होगी, दुख नहीं होगा अशान्ति नहीं होगी। यह तो प्राकृतिक घटनाएं हैं। जहां भी तुम हो वहीं रहना सीखो, खूंटियां भी है, धागे भी हैं, पर अब बंधने वाला सजग हो उठा है। तब राग द्वेष के लिए जगह नहीं मिलती है।
21 फरवरी 1894 को डिट्रायट में सवामीजी ने हिन्दू और ईसाई विषय पर भाषण दिया था। मुख्य बात है, हम तब पराधीन थे। 120वर्ष पूर्व के भारत की कल्पना करनी कठिन है, ईसाइयों का शासन था। लगभग सात सौ साल तक इस्लाम शासन कर चुका था। तब हिन्दू धर्म के सार तत्व की बात करना साहसी काम था। हिन्दू धर्म का सार तत्व यहॉं से ग्रहण किया जा सकता है।
स्वामीजी ने कहा था- ”तुम अपने धर्म को आक्रामक धर्म कहते हो। तुम आक्रामक हो, पर तुमने कितने को पाया है? संसार में हर छठवाँ व्यक्ति चीनी प्रजा है अर्थात् बौद्ध है; और तब जापान, तिब्बत, रूस और साइबेरिया और बरमा और श्याम है; और यह चाहे अच्छा न लगे, किन्तु यह ईसाई नैतिकता, यह कैथोलिक सम्प्रदाय सब उन्हीं से निःसृत है। अच्छा, तो यह कैसे किया गया? बिना रक्त की एक बूँद भी बहाये हुए। अपने दम्भ और आत्मश्लाघा के बावजूद, बिना तलवार के ईसाइयत कहाँ सफल हुई है? संपूर्ण विश्व में मुझे एक स्थान दिखाओ। केवल एक, मैं कहता हूँ, ईसाइ धर्म के संपूर्ण इतिहास में एक मुझे दिखाओ; केवल एक, मैं दो नहीं चाहता। मैं जानता हूँ, तुम्हारे पूर्वजों का किस प्रकार धर्म-परिवर्तन किया गया। उनके सामने दो मार्ग थे, धर्म-परिवर्तन करें या मारे जायँ, बस, यही। तुम अपने समस्त दंभ के बावजूद इस्लाम धर्म से क्या अच्छा कर सकते हो। ‘‘बस हमीं है! और क्यों? ‘‘क्योंकि हम दूसरों को मार सकते हैं।’’ अरबों ने यह कहा और उन्होंने दंभ किया। पर आज अरब कहाँ है? वे गृहहीन हैं। रोमन ऐसा कहा करते थे और आज वे कहाँ है? शांति लाने वाले ही धन्य हैं, पृथ्वी उन्हीं की होगी! ऐसी वस्तुएँ, भूमिसात् हो जाती हैं, वे रेत पर बनीं होती है। वह बहुत समय तक नहीं टिक सकतीं। भाग1 पृ278
हिन्दू धर्म जिसमें अनेक संप्रदाय हैं, हिन्सा के आधारप , प्रलोज्ञन के आधार पर धर्म परिवर्तन नहीं चाहतंे।जैन धर्म , सिक्ख र्ध्म, बौद्ध धर्म अपने विचारो ंका प्रसार -प्रचार करते है। यहॉं धर्म परिवर्तन का आग्रह नहीं हे। आप को जो उचित लगे करते रहें। यहॉं तक पति अग्रवाल हिन्दू है, उसकी पत्नी जैन हे। किसी प्रकार का किसी पर कोई दबाब नहीं है।
मुक्ष्य बात है, धर्म का जीवन जीने की कला बन जाना। यहॉं धर्म ही जीवन का प्राण हे। साधना के बिना जीवन अधूरा हे। जैन मंदिर जाता है। हिन्दू मंदिर जाता है। मुसलमान नमाज पढ़ता हे। सिक्ख गुरुद्वारे जाता हे। धर्म का सार तत्व ईश्वरानुभूति पाना हे। सब के लिए सब बराबर हैं। यही मानव धर्म का आधार है।
कर्मकांड पहली पाठशाला है, इसे उपरांत सब के पास अपनं-अपनं पुराण हे। यह यात्रा बहिर्मुखी है। इसके बाद वह अपने भीतर सत्य की तलाश करता हे। यही आध्यात्मिकता है। यहॉं बाह्य का अनुशासन ढीला पड़ जाता हे। यहीं धर्म का सरतत्व उपस्थित होता है।
एकाग्रता के उपसय औा ध्यान सीखना मनुष्य चाहता हे। मन की शांति , शक्ति की चाहत , अनेको संप्रदायों के आचार्यों को जन्म दे जाती है।
सारतत्व साधना का मिलता है- ”पवित्र बनो। अंधविश्वास छोड़ो और प्रकृति के आश्चर्यजनक समन्वय का दर्शन करो। अंधविश्वास धर्म के अधिकांश को मिटाता है। सभी धर्म अच्छे हैं, क्योंकि सारभूत बातें समान है। प्रत्यक मनुष्य को अपने पूर्ण व्यक्तित्व का उपयोग करना चाहिए, परन्तु इन व्यक्तित्वों से एक पूर्णत्व की सृष्टि होती है। यह अद्भुत अवस्था पहले से वर्तमान है। इस आश्चर्यजनक ढाँचे की संरचना में प्रत्येक धर्म का कुछ न कुछ योगदान है। भाग 1 पृ284
और तब वर्तमान में रहने का क्षण उपस्थित हो जाता है। वर्तमान तो काल खंड से मुक्त क्षण है। जब तक अतीत है, भविष्य है, और वह मनोवैज्ञानिक जगत में उपस्थित है, वहां वर्तमान नहीं होता है, वहां राग व द्वेष अपनी संपूर्णता में उपस्थित रहते हैं। वर्तमान में रहने की पहली उपसंपदा यही प्राप्त होती है, बाधएं उसी तरह से उपस्थित रहती है, पर परिवर्तन अपने भीतर आने लगता है। बाह्य अपनी तीव्रता से प्रभावित नहीं कर पाता है। तब चित्त एक विशेष प्रकार की कोमलता को पाता है, जिसकी उपसंपदा है, परोपकारी वृत्ति। यहां राग नहीं होता है, खूंटियों पर अटकने वाला धागा क्षीण हो जाता है, वहां चित्त में स्वतः ही उदारता प्रवेश कर जाती है। यही परोपकारी वृत्ति है। यहां आकर पर का सहारा छूट जाता है। जहां तक वर्तमान में रहने का अभ्यास रहेगा पराश्रय नहीं होगा। दूसरे का सहारा दूसरे की आवश्यकता के हटते ही छूट जाता है।
यह स्थिति शब्दों से वर्णन नहीं की जा सकती है। क्योंकि हमारा सारा जीवन दूसरों पर आश्रित है। दूसरों का सहारा दूसरे की आवश्यकता के हटते ही छूट जाता है। यह स्थिति सही नहीं पाती। कहीं कोई सहारा नहीं मिलतर। सब तरफ जैसे रास्ते ही मानो खो गए हों। कुछ नजर नहीं आता, असफलता बाहर हर मोर्चे पर मिलती है। सब जगह लगता है, रास्ते बन्द हो गए हों। जैसे चूहा पिंजड़े में बन्द हो गया हो। बिल्कुल वैसा ही घट जाता है। साथ के संगी भी हट जाते हैं। पुरानी बाधांएँ रहती हैं। भगवान राम भी बनवास में सीता हरण के बाद ऐसे ही निराश्रित होकर रह गए थे। राजा रानी द्रोपदी को भगवान कृष्ण के लिए पात्रा में चावल का एक दाना मिला था। यही वह स्थिति है, जो साधक के जीवन में घटती है जब प्राकृतिक विधान से परमात्मा की कृपा होती है, तभी हमारे सारे सहारे छूट जाते हैं। ब्रहृानिष्ठ गुरू देने को संसार की सारी सुविधाएं दे सकते हैं। योग क्षे वहाम्यम, परन्तु वे जिन्हें सचमुच देना चाहते हैं, उन्हें बहुमूल्य स्वाश्रय सौंपते हैं।
पराश्रय नहीं। पराधीनता नहीं। तभी लगता है साथी संगी सभी छूट गए हैं आप मात्रा अकेले रह गए हैं। इस खतरे को समझना सरल नहीं है। जब किसी का एक सहारा छूटता है तो जीवन में अंधेरा आ जाता है। जब सारे सहारे छूट जावें , सारे आश्रय चले जाते हैं, तब अचानक जो घट जाता है उसकी कल्पना नहीं होती है। यहीं सन्यास का अनुभव होता है। सारी अवधारणाओं, सारी मान्यताओं से अचानक छूट जाना पर धीरे धीरे यह भी मात्र रूढ़ि होकर रह गई। सन्यास का सौंदर्य चला जाता है। वहां मुक्तता नहीं रही, बंधन रह गया है। जड़ता आ गई । सन्यास इसी स्वाश्रय का दूसरा नाम है। यही आत्मकृपा का अवदान होता है।
यहां कपड़े बदले का आग्रह नहीं है। नही संसार का परित्याग है। वरन् अपने अंतस में उस अभूतपूर्व परिवर्तन का अहसास होना है, जहां मात्र रूपांतरण अभी अभी हुआ है।
स्वामीजी ने कहा था,- ”कितनी ही बार मुझसे कहा गया हैकि अतहत की ओर नजर डालने से मन की अवनति होतह है।इससे कोई फल नहीं होता, अतः हमें भविष्य की ओर दृष्टि रखनी चाहिए। यह सच है।
यह अवधारणा साधारण नहीं होती है। जब किसी साधक के जीवन में ऐसा घटता है, तब उसके भीतर आग लग जाती है। आग, शवदाह मुर्दे जल उठते हैं। रूढ़ियों को शव की तरह लादे विक्रमादित्य घूमता ही रहता है। जो आश्रय है, वे मात्रा शव ही है। अतीत के पिटारे हैं, खुलते हैं। और जलने लग जाते हैं। अब जो बचता है, वह तो राख ही है। वही राख शिवजी ने लगा रखी है। यही भभूत का रहस्य है।
शिव और शव का भेद यही है। जो आश्रयों के सहारे टिका है, वह शव है। उसकी शक्ति का केन्द्र बाहर है। जो अपनी शक्ति के सहारे है, वही शिव है। यहीं से वैराग्य आरम्भ होता है। वैराग्य घर से भाग कर जंगल में जाना नहीं हैं। वहां भी राग रहता है। अंतस के बदलाव के बिना कोई परिवर्तन नहीं आता है। यह सामान्य सा प्रकृति का नियम है। फिरकनी को बाहर से कितना बल लगाओ, जब तक बल रहेगा, फिरकनी घूती रहेगी बल हटा, फिरकनी रूक जावेगी। वैराग्य है, सारे आश्रयों के छूट जाने से उत्पन्न चित्त की सरलता। अगर चित्त प्रभावित है तो राग है। चित्त अप्रभावित है, अविचलित है, तो शांत है। यदि शांत है। तो वैराग्य है।
संसार तो आश्रय की बुनियाद पर ही भविष्य की इमारत तैयार करता है। आश्रय के हिलते ही सुरक्षा की इमारते गिरने लग जाती है। रह जाता है, मात्रा एक खालीपन यही भय आता है। जब तक कहीं ना कहीं आश्रय है, हम भय की ओर से पीठ कर लेते हैं। परन्तु आश्रय के हटते ही चारों तरफ से भय ही भय घेर लेता है। यह भय मृत्यु से बड़ा होता है। मृत्यु के बाद तो सब समाप्त हो जाता है। परन्तु यहां तो जीवित रहते हुए भी सब कुछ को करते हुए देखना है। सारी आसक्तियों को सारी अवधारणाओं को सारी कटुताओं को उस द्धेष को जिसे हम सहेजकर अपने अंतस में रखते चले आए हैं। उनका मर जाना, मिट जाना, क्या बर्दाश्त हो पाता है। होलिका दहन है। अब सब जलेगा। और लौ उठेगी। सन्यासी गैरिक वस्त्र पहनतें हैं। आग की तरह। यह रंग सब राख हो जाने पर उत्पन्न प्रकाश का है। जो उज्जवल है। मात्रा गैरिक है, तब जो शेष रह जाता है, वह मात्रा विश्वास है। होलिका जल जाती है।
घृणा जल जाती है। पशुता जल जाती है। प्रहलाद बच जाता है। मात्र विश्वास बच जाता है। यही तो सन्यासी का गीत है। उसका सौंदर्य है। पर आज जो सन्यासी है, वह तो सबसे ज्यादा असुरक्षित तथा भयभीत है। पूर्वग्रहो से जकड़ा हुआ है।
क्योंकि वह भीतर से अभी राख नहीं हुआ है। उसके अंतस में अभी होलिका नहीं जली है। उसका प्रहलाद अभी परतंत्र है। उसके पास आत्मविश्वास नहीं है।
और यह विश्वास प्राप्त होता है, स्वाश्रय की जमीन पर। जब वह पूरी तरह निराश्रय हो जाता है। तभी उसके भीतर अन्तर्मुखता का प्रवाह जन्मता है। तब उस प्रवाह में उसके भीतर जो अंतर्मन है, जो स्व है, यह प्रकट हो जाता हैं
वही तो अपना आश्रय होता है। वही स्व है। उसका अनुगमन स्वधर्म हैं जिससे न तो देशकाल की दूरी होतर है, और न ही फिर जिसकी प्राप्ति के बाद उससे कभी अलगाव हो पाता है। जहां, अपना आश्रय है, उसका नाम कुछ भी दिया जा सकता है।
यह यात्रा अहम् से आत्म तक की है। जो अहम् है, वह स्थूल होता है, स्थूल को परिभाषित कर सकते हैं, परन्तु जो आत्म है, वहां अहम् है ही नहीं। और जहां कुछ भी नहीं है, उसकी परिभाषा नहीं होती है। उसके लिए जगत ही आत्मवत हो जाता है। श्रुति ने बार बार कहा है सर्व भूतेषु सर्वभूतेषु हिते रतः यही अंतिम अवस्था है। जहां जगत के समस्त प्राणी आत्मवत है। पृथकता का नाम मात्र का अंकन तक नहीं है। यही संस्कृति जन्मती है। जिसकी धरती पर धर्म का वृक्ष खड़ा होता है। इस संस्कृति की बुनियाद व्यवहार है। आचरण है।
यहां बाहुबल नहीं हैं, यहां धन बल नहीं है, यहां मात्र ज्ञान है। ज्ञान, श्रुति स्मृति पर आधारित कोई बड़ी बातें नहीं है। ज्ञान तो हमारा व्यवहार है। हमारा आचरण होता है। तब जो कुछ जाना गया है, वही व्यवहार हो जाता है। यही ज्ञान का आरम्भ है। ज्ञान किसी पाठशाला में नहीं मिलता। न ही सिखाया जाता है। यह तो आचरण की बात है। हमारा व्यवहार ही ज्ञान की परख को बताता है। किताबी बातों को ज्ञान नहीं कहते हैं।
सभी का सार तत्व यही है कि मनुष्य को वर्तमान में रहने की कला आनी चाहिए। और यह प्राप्त होती है मात्रा आत्म कृपा से। तब शरीर और मन और प्राण की धारा एकोन्मुख हो जाती है। इसके लिए किसी ब्राहृाप्रयास की आवश्यकता नहीं है। यहां जो कुछ भी होता है, अंतस में होना है: यही सच्ची धार्मिकता होती है। हमें इसी जीवन में ही विश्व का संचालन करने वाली इस महान शक्ति का अनुभव प्राप्त करना है। और यही तभी होता है जब हम सारे आश्रयों से मुक्त हो जावें, तभी बाहृयमन निष्क्रिय होता जाता है। यह होना एक निरंतरता है, परन्तु जो अचानक घटता है, वह यह है कि अन्तर्मन जो जाग्रत तो था, परन्तु उसका अहसास नहीं था, उसका अहसास जग जाता है यही जागृति है।
परन्तु यही नहीं होता है, हम कितनी भी शास्त्र चर्चा करें, कितना ही बाहृा प्रयास करें, ये सब बाहृा मन को सक्रिय ही करते हैं। चित्त में तो वैसे ही प्रर्याप्त संग्रह था, हम और संग्रह करते जाते हैं, साधना के नाम पर असाधन ही करते हैं। यही माया है। हाँ, जो वर्तमान में हैं, वही इस चक्र से बाहर जा सकता है। चित्त में संग्रह होता है, निरंतर खूटियां पकड़ने से ये खूंटिया होती है, राग -द्वेष की।। राग- द्वेष के संग्रह से यहां भी भीड़ जमा होती रहती है, सुख व दुख का कारण तलाश करने की आदत से। इससे निरंतर भटकाव बना रहता है। पराश्रय कायम रहता है। ये दोनों एक दूसरे के सहयोग है। पूरक हैं। एक कम होता है, दूसरा अपने आप कम होता जाता है।
स्वामीविवेकानंद जी ने दीवान साहब श्री हरिदासजी को 29 जनवरी 1894 के पत्र में लिखा था-
”
”हम केवल सब धर्मों के प्रति सहिष्णुता ही नहीं रखते ,वरन् एन्हें स्वीकार भी करते हैं, एवं प्रभु की सहायता से सारे संसार में इसका प्रचार करने का प्रयत्न भी मैं कर रहा हूॅं।
प्रत्येक मनुष्य और ंएवं प्रत्येक राष्ट्र को महान बनाने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं।-
1 सदाचार की शक्ति में विश्वास
2 ईर्ष्या और सन्देह का परित्याग
3 जो सत् बनने या सत् करने के लिए यत्नवान हों, उनकी सहायता करना।
क्या कारण है हिन्दू राष्ट्र अपनी अद्भुद बुद्धि एवं अन्यान्य गुणों के रहते हुए भी टुकड़े- टुकड़े हो गया।? मेरा उत्तर होगा- ईर्ष्या। कभी भी कोई जाति इस मन्द भाग्य हिन्दू जाति की तरह इतनी नीचता के साथ एक दूसरे से ईर्ष्या करने वाली, एक दूसरे के सुयश से ऐसी डाह करने वाली नहीं हुई, और यदि आप कभी पश्चिमी देशों में आएॅ, तो पश्चिमी राष्ट्रों में इसके अभाव का अनुभव सबसे पहले करेंगे।“ भाग2 पृ325
इस दबाव से तभी मुक्त हुआ जा सकता है, जब इस चक्र को सहज विकास क्रम के अन्तर्गत स्वीकार किया जाता है। विष्णु के चक्र का यही रहस्य है। यही बोधिसत्व का चक्र है। इस चक्र से मात्रासमझ के द्वारा ही स्वतन्त्रता पाई जा सकती है। अन्यता यहां तो मात्रा बंधन ही है। जहां तक अहम है वहां तक जड़ता है। बंधन है। जहां अहम का अभाव होगा, वहां मात्र मुक्तता होगी। और उसकी न तो कोई विशेष पहचान होगी, न कोई विशेषता होगी। यहां जो बच जाती है, वही मात्रा तितिक्षा है। तितिक्षा सहनशीलता नही है यहां तो जो घटता जा रहा है, उससे अप्रभावित होने की क्षमता है। अभी मनोजगत तुरन्त विचलित हो जाता है। मात्र एक आवेग, एक संकेत, एक सहारा ही बहाव के लिए पर्याप्त होता है। परन्तु तितिक्षा धीरे धीरे इस बहाव की गति पर रोक लगाती जाती है। तब प्राप्त होती है, आश्रयहीनता। एक ऐसी अवस्था जहां मात्रा ऊसर जमीन रह जाती है। खूंटियों का अभाव हो जाता है।
रेगिस्तान का भी अपना सौंदर्य है। डूबते हुए सूरज का जो अक्स रेत के टोलों पर पड़ता है, वही शेष रह जाता है, इतना स्पष्ट है कि पद चिन्ह भी साफ साफ दिख जाते हैं। बहाव के प्रति इतनी संवेदनशीलता सतकर्ता से प्राप्त होती है सतर्कता की बच जाती है। जो सजगता में ढलना चाहती है यहीं जो शेष बचता है वही दिगम्बरत्व है। दिगम्बर कपड़ों का खोल देना नहीं हैं। यह तो परम सौंदर्य की उपलब्धि है। यहां तो अंतस का घट रीत गया है। एक अजीब सा खालीपन। वहां रिक्तता भी नहीं हैं। भरा भरा सा है। कुछ छलक जाने को है। खूंटियां नहीं है। बाहृा का दबाव नहीं हैं बन्धन नहीं हैं। खाली भी हुआ है पर भर भी गया है। क्या सचमुच यहां प्रेम नहीं होता ? प्रेम न स्थान घेरता है, न उसकी कोई आकृति है, न कोई छाप होती है। वह तो स्वयं पूर्ण होता है और दिया भी पूरा जाता है जिसे मिलता है वह पूर्ण है जिसके पास रह गया है, वह भी पूर्ण है। यही जो भी व्यक्ति आ रहा है मात्रा एक निमिष में अपने आपको भरा हुआ पा रहा है घट तो उसका ही है, यहां तो मात्रा एक प्रवाह है अंनत प्रवाह, निमिष में ही पात्रा भर जाता है, पात्र फूटा है, और स्वयं ही गले तक भरा हुआ है तो बात दूसरी है, अन्यथा यहां तो देना मात्रा एक छटांक भर है, और पाना मन भर होता है यहीं स्वाश्रय की उपलब्धि होती है। यही आत्मकृपा है। तभी आत्मविश्वास पैदा होता है। तभी विवेक जगता है।
स्वाश्रय ही आत्म कृपा पैदा करता है। आत्म कृपा, साधक को अभय प्रदान करती है। अभय और विवेक यहीं की उप संपदाऐं हैं।
यह कथन मात्रा शाब्दिक नहीं हैं, आज आध्यात्मिक जगत में सबसे अधिक नगण्य मनुष्य हो गया है। उससे उसकी निजता छीन ली गई है। धर्म, शब्द आज इतना विकृत हो चला है कि वह बाहुबल का ही पर्याय हो चला है। सनातन धर्म अपनी गत्यात्म्क यात्रा को खोता हुआ, मनुष्यत्व की स्थापना को छोड़ता हुआ मात्रा विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति के निर्माण में ही मानो संलग्न हो गया है।
धर्म के केन्द्र में मनुष्य है । उसका मनुष्यत्व है। उपासना गृह नहीं हैं। जड़ इमारतें नहीं हैं। आज इमारतें महत्वपूर्ण हो गई है। प्रस्तर खंड महत्वपूर्ण है। परन्तु परम चैतन्य मनुष्य उपेक्षित हो गया है। यहां जो यात्रा है, वह मनुष्यत्व की है। आत्मकृपा शब्द बहुमूल्य हैं
जहां तक मंदिर है, उपासना हैं, कर्मकाण्ड है, अर्चना है, वहां दूसरा है, वहां तक पराश्रय है। शक्ति का आश्रय बाहर है। जहां तक आश्रय बाहर है, वहां तक बर्हिमुखता रहेगी। बहाव रहेगा। मन खूंटियों में जकड़ा रहेगा। वह अपने आपसे जुड़ नहीं पाएगा। वह अतीत और भविष्य के संक्रमण में रहेगा। परन्तु जब वह अपने आप से जुड़ने लगता हैं और जितना वह वर्तमान में रहने लगता है, उतना ही उसका मन जो चक्रकार गति से बाहर बहता है वह एकोन्मुखता पाकर अन्तर्मुखी होने लगता है। प्राण मात्रा श्वास ही नहीं हैं। श्वास तो मात्रा सहायक है। मन में गति है। परन्तु प्राण में सृजन करने की क्षमता है। शशु जब गर्भ में होता है तब ले, लेकर उसकी अंतिम यात्रा तक पोषण करने वाली शक्ति ही प्राण है।
विपश्यना साधना आज जिस रूप में प्रचलित है, वह वृक्ष के पत्तों का बाहृा रूपान्तरण है। बिना पतझड़ की प्रतीक्षा लिए नई कोपलें नहीं आती है। एक बार तो निर्वसन होना ही होगा। स्वाश्रय की गन्ध जब देह वृक्ष से निसृत होती है, तब जो कोपले इस वृक्ष से फुटती है, वहां विपश्यना स्वतः उपलब्ध हो जाती है।
विशिष्ट भी है, विपरीत भी है। यह पराश्रय से स्वाश्रय की यात्रा है। बिना स्वाश्रय पाए, आत्मकृपा नहीं आती है इसी भाव भूमि पर ही विपश्यना का संगीत उभरता है। सावित्राी सत्यवान और यम, भारतीय चिन्तन का अद्भुत उदाहरण है। सावित्राी रहस्य प्राण साधना ही है। यह प्राण अब स्वतः ही जो उर्ध्वाकार रहा था। मन की आत्मा कृपा को भाव भूमि पर, जितना वह वर्तमान को उपलब्ध होता जाता है उससे संयुक्त होने लग जाता है। यही योग है। यह युक्ति ही मुक्त मनुष्य की उपसंपदा है। क्योंकि जब स्वतः ही उस मनुष्य के भीतर उसे विवेक की उपलब्धि प्राप्त होती है। यही ब्रहृा निष्ठ गुरू की प्राप्ति का रहस्य है। गुरूत्व स्वतः ही समर्पित होता है। यहां यात्रा अहम् से आत्म की है। आत्म तत्व ही उसका उद्धार कर सकता है। उसे होना है तो अपने आपके प्रति समर्पित होना है।
यहीं तो हृदय की मुक्तावस्था होती है। साधारणी करण में ही आनंद भाव पैदा होता है। हृदय की मुक्तावस्था में ही आनंद उपजता है। और यह मुक्तावस्था ही स्वाश्रय की भूमिका है। यही तो आत्मकृपा है। बिना यहां आए क्या रसेश्वरी से साक्षात्कार संभव है। हृदय की मुक्तावस्था ही श्री राधिका रहस्य है। यहीं आत्मकृपा है। उसकी उपसंपदा प्रेम है। प्रेम का मानवीकरण ही तो श्री कृष्ण है। यही प्रेम है। यहां मात्रा आकर्षण है। अपार्थिक सतत चेतन्य का नृत्य है। जो चिरंतन हो रहा है। इस नृत्य में, इस रास में शरीक होना हो तो हर गोपिका का धर्म है, उसकी जीवेच्छा है। हर बूंद जो सहसा उछली है, और मटमैली हो गई, वह अपना मटमैलापन दूर करके उज्जवल हो पाए, तभी तो सागर में विलीन हो पाती है। पर बूंद कहीं सागर से अलग है। वह तो उसकी अपनी ही है, उसके साथ भी है और अलग भी है। ससाथ तो पहले भी थी, पर पहचान नहीं थी। आज पहचान जो मिल गई है। पहचान होते ही गुण धर्म गया। स्वभाव बन गया। वह अब गोपिका हो गई। और चिरंतन रास में शरीक हो गई। यह महारास चिरंतन है। और इसकी प्राप्ति है, मात्रा प्रेम जिसकी न तो कोई परिभाषा है, न कोई पहचान है।
साधना के नाम पर अतिरिक्त कुछ नहीं करना है, मात्रा वर्तमान में रहना है। जिस भी कार्य में हो, वहां पूरी समग्रता में रहो। मन को वहीं रखो किंचित मात्रा भी विपरीत मत जाने दो।
जब कार्य सम्मुख नहीं हो तब अवलोकन की सहायता से विचारों की श्रंखला को कम करो। यहीं साधन सामग्री सतर्कता है। जो अन्त में सजगता में ढल जाती है। जो जीवन प्राप्त हुआ है वह बहुमूल्य है। उसे पूरी समग्रता में जीना है। सम्पूर्णता में जीना है। यही सुख का रहस्य है। सुख की अवहेलना में समाज जी नहीं सकता है। स्थायी सुख ही शान्ति का भाव है। वर्तमान में रहने से लाभ यह होता है कि व्यक्ति को वह संतुलन प्राप्त हो जाता है कि वह सुख भी पाता है और शांति भी पाता है। और शांति का भोक्ता जो मन है, वह अगर अहर्निश इसी स्थिति में रहने लग जाता है तब वह क्रमशः निष्क्रिय होता हुआ अन्तर्मन में विलीन होने लग जाता है।
यही रास है। वृन्दावन, अंतःकरण है। जहां यह लीला नित्य हो रही है। ”गो” इन्द्रियां हैं। जहां देह वेणुगीत से संयुक्त है। देह जब वांसुरी बन जाती है। जब पराश्रय चला जाता है तब चीर हरण हो जाता है। तब आता है, निराश्रय, फिर स्वाश्रय आता है। और उसी भाव भूमि मंे आत्मकृपा आती है। आत्मकृपा ही रसेश्वरी है। जब दूसरा जो था, वह अप्रासंगिक हो गया, अर्थहीन हो गया, गोपिका जो थ्ज्ञी, वह नृत्योम्मुख हो गई। पूर्णिमा की यह रात है, चारों और सुगंध है, वेणुगीत अंतःकरण मानों उलोच रहा है, एक ऐसा खालीपन जो पहले कभी जाना नहीं था-जो था, वह बाहर आ रहा है, आंखें, आंसुओं से भरी है-पर अब व्यथा नहीं है। दुख भी सहन नहीं हो पा रहा है। भीतर का जब कवंल खिलता है, तब मन गुजार करता हुआ भ्रमर बन जाता है। मानो सारा रस आज ही पी जाएगा। डूबते हुए सूरज को देखा है। कभी कभी आसमान इतना सुनहरी हो जाता है कि मानों रंग बिखर गये हों। यही तो धमाल है। रंग बिखर गए हैं। अंतस भीगा भीगा सा है। उस अंतःकरण में ही आत्मकृपा उपजती है और तब जो शेष रह जाता है, वह आनंद ही है। आनंद की अभिव्यक्ति ही प्रेम है। यहां प्रेम ही साधना है, प्रेम ही साध्य है।
और प्रेम ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। यही भारतीय चिंतना की बड़ी देन है। पश्चिमी आंख पदार्थ, जन्य ज्ञान को देखती है। उसका आग्रह भौतिकता में हैं। संपत्ति के अधिक से अधिक संग्रह में हैं। विकासशील देश, विकासशील समाज वही है, जहां अधिक से अधिक धन हैं। संपत्ति ही विकास का मानक है। परन्तु इसके विपरीत भारत की आंख, भारत की दृष्टि इसके विपरीत है।
जो त्याग में ही, भारतीयता देखते हैं, वह भी अधूरापन है। यहां तो ”त्येन त्यक्तेन भुंजी था” लक्ष्य रहा यहां मार्ग सामर्थ्य के सदुपयोग का रहा। यह सदुपयोग ही है जो दुरूपयोग को रोक देता है। तब जो जगत है, न तो उसके प्रति लोभ व भोग रहता है, नही उससे पलायन रहता है, वरन् उसके प्रति कर्तव्य बोध जग जाता है। यह कर्तव्य भूमि है, यहां, कुछ भी छोड़ना नहीं है, जिसे छूटना होगा वह स्वयं छूटता जाता है, होना तो यही है, मात्रा वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक अभ्यास होना है। जो जीवन प्राप्त हुआ है वह बहुमूल्य है। उसे पूरी समग्रता से जीना है। संपूर्णता में लेना है। यही सहज मार्ग है।
धर्म मनुष्य को उसकी पहचान सौंपता है। उसका नया जन्म होता है। यही द्विज की भूमिका है। अब नया जन्म अन्तर्मुखता की दहलीज पर होता है। जहां पर कृपा छूट जाती है। पराश्रय चला जाता है। वर्तमान रहने का प्रारम्भ यही होता है। अब मन का भूत और भविष्य से संचरण कम होता जाता है अवधारणाएं रहती तो है पर अब उनसे प्रभावित होने की क्षमता कम होती चली जाती है।
आज धार्मिक जगत अवधारणाओं के दासत्व में सोया हुआ है। धार्मिक जन व सामान्य जन में कोई अन्तर नहीं रहा है वे नन्हें शिशुओं की तरह अपने गुड्डे व गुड़ियों को ही श्रेष्ठ मानकर मात्रा बहस ही नहीं करते, वरन् मनुष्य जाति का ही संहार कर रहे हैं। धर्म का यह स्वरूप नहीं है।
पथ आज इतना कठिन नहीं है, जितना सौ वर्ष पूर्व था,स्वामी विेवेकानंदजी ने जो भारत का भविष्य देखा था उस सपने,को हमें पूरा करना है- आपने कहा था-
”मुझसे कहा गया है,अतीत की ओर नजर डालने से सिुर्फ मन की अवनति होती हे और इससे कोई फल नहीं होता, अतः हमें भविष्य की ओर दृष्टि रखनी चाएि। यह सच है। परन्तु अतीत से ही भविष्य का निर्माण होता हें अतः जहॉं तक हो सके, अतीत की ओर देखो पीछे जो चिरन्तन निझंर बह रहा हे।, आकंठ उसका जल पीयो और उसके बाद सामने देखो और भारत को उज्जवलतर , महत्तर और पहले से भी और ऊॅंचा उठाओ।”
$$$$$$$- हमारे पास एकमात्र सम्मिलन भूमि है, हमारी पवित्र परम्परा, हमारा धर्म। एकमात्र सामान्य आधार वही है, और उसी पर हमें संगठन करना होगां। यूरोप में राजन्ैतिक विचार ही राष्ट्रीय एकता का कारण है ,।किन्तु एशिया में राष्ट्रीय एक्य का आधार धर्म ही है। अतः भारत के भविष्य संगठन की पहली शर्त के तौर पर उसी धार्मिक एकता की ही आवश्यकता हेै। देश भर में एक ही धर्म सबको स्वीकारना होगा। एक ही धर्म से मेरा क्या मतलब है? यह उस तरह का एक ही धर्म नहीं ,जिसका , ईसाइयों, मुसलमानो, बौद्धो में प्रचार हेै। हम जानते हैं कि हमारे विभिन्न संप्रदायों के सिद्धांत तथा दावे चाहे कितने ही विभन्न क्यों न , हमारे धर्म के कुछ सिऋयंत ऐसे हें, जो सभी संप्रदायों द्वारा मान्य हैं।$$$$$$और अपने धर्म के ये जीवनप्रद सामान्य तत्व हम सबके सामने लायें,और देश के सभी स्त्री -पुरुष, बाल वृद्ध उन्हें जाने समझें, तथा जीवन में उतारें,- यही हमारे लिए आवश्यक है। सर्वप्रथम यही हमारा कार्य है।ं,“भाग5 पृ181
स्वामीजी के इस चिन्तन का निष्कर्ष आज भी हमारे लिए मार्ग दर्शक है-
”भारत में जाति ,भाषा, समाज संबंधी सारी बाधॉं धम््र की इस एकीकरण की शक्ति के ससामने उड़ जाती हें।। हम जानते हैं कि भारतीय मन के लिए धार्मिक आदर्श से बड़ा और कुछ भी नहीं है । धर्म ही भारतीय जीवनका मूल मंत्र है। पृ 181 भाग 5
साम्प्रदायिकता ही आज धार्मिकता हो गई है। और वह दिन पर दिन बदसूरत होती जा रही है।
हम जिस रास्ते पर चलते हैं, वही लक्ष्य हमें प्राप्त होता है। यह एक प्राकृतिक नियम है। अगर सैंकड़ों सालों की गुलामी के बाद स्वाधीन भारत के मनुष्य की सुख शांति उपलब्ध नहीं है। उसका सामाजिक जीवन और बदतर हो गया है तो उसे इसका कारण अपने भी ही तलाश करना होगा।
वे निरर्थक मूल्य, वे विचारधाराएं जिनका अनुकरण आज मात्रा दोहराव होकर रह गया है। जो हमारे जीवन में कोई रूपान्तरण नहीं ला सकती है, जो उसे उसकी निजता से जोड़ने में असफल रही है, उन्हें छोड़ना ही श्रेयस्कर है।
धर्म हमारे समाज में सदा से ही बहुमूल्य रहा है। आचार्यों ने इसकी अनेकों प्रकार से परिभाषा की हैं आज हमारा समाज इसी प्रश्न को लेकर सबसे अधिक चिंतित है। शताब्दी हुयी जब बंग भूमि से यह संदेश सारी दुनिया में प्रसारित हुआ था कि सभी धर्मो का सार तत्व एक ही है। वह है परमात्मा की प्राप्ति और वह भी इसी जीवन में ही संभव हैं।
परमहंस रामकृष्णदेव ने धर्म की समन्वयवादी धारा दुनिया को देते हुए मानव धर्म को समस्त संसार में प्रतिपादित किया था।
आज पशुओं के समाज की तो हम पहचान करते हैं, परन्तु जब मनुष्य के बारे में चर्चा होती है तो लगता है, मनुष्य का धर्म, उसका स्वभाव ही कहीं खो गया है। मनुष्य या तो हिन्दू हैं, या मुसलमान है, या ईसाई है, या जैन है, या बौद्ध है, भूगोल के आधार पर कहीं वह अमेरिकी है, कहीं वह रूसी है। कहीं वह अमीर है, कहीं वह गरीब है, कहीं वह कांग्रेसी हैं, तो कहीं कम्युनिस्ट हैं।
स्वामी विवेकानंदजी आधुनिक हिन्दू धर्म के महान प्रवक्ता थे हिन्दू धर्म पर अपने आलेख में आपने कहा है-
”हिन्दू लोग अपना धर्म प्राचीन वेदों पर आधारित करते हैं, जिनका नाम ‘जानना’ अर्थ देने वाली विद् धातु से बना है। वे एक ऐसी ग्रंथमाला हैं, जिनमें हमारे विचार से, सभी धर्मों का सार-तत्त्व सन्निहित है, पर हम ऐसा नहीं मानते कि सत्य केवल उनमें ही है। ग्रन्थ हमें आत्मा के अमरत्व की शिक्षा देते हैं। हर देश में और हर मानव-हृदय में एक दृढ़ सन्तुलन खोज निकालने की प्राकृतिक चाह है- कुछ ऐसा खोजने की चाह, जो कभी बदलता न हो। हम ऐसी वस्तु प्रकृति में नहीं पा सकते, क्योंकि यह समस्त विश्व अनंद परिवर्तनों का एक समूह मात्र ही तो है। किन्तु इससे यह परिणाम निकालना कि अपरिवर्तनशील कुछ है ही नहीं, दाक्षिणात्य बौद्धों और चार्वाकवादियों की ही भूल में पड़ना है। इनमें चार्वाकवादी विश्वास करते हैं कि जड़ पदाथ्र ही सब कुछ है और मनस्तत्त्व कुछ भी नहीं, तथा धर्म केवल मात्र धोखा है और नैतिकता तथा साधुता बेकार के अंधविश्वास मात्र हैं। वेदांत दर्शन हमें सिखाता है कि मनुष्य अपनी पाँच इन्द्रियों से बँधा नहीं है। वे केवल वर्तमान को जानते हैं, भविष्य या भूत को नहीं, किन्तु चूँकि वर्तमान में भूत और भविष्य भी निहित होते हैं तथा तीनों ही केवल समय के विभाजन मात्र हैं, वर्तमान भी अज्ञात होता, यदि कुछ ऐसी वस्तु न होती, जो इन्द्रियों से परे है, जो समय से स्वतंत्र हैं, तथा जो भूत और भविष्य को मिलाकर वर्तमान में एकीभूत कर देती है।$$$$$ वेद कहते हैं,समस्तसंसार स्वतंत्रता और परतंत्रता का , मुक्ति और बंधन का मिश्रण हैं, किन्तु इन सबके माध्यम से स्वतं?,अमर,शुद्ध, पूर्ण और पवित्र आत्मा देदीप्यमान है। भाग1 पृ259
वेदों के श्रुुति आधार को सपष्ट करते हुए आपने कहा था-
”वेदों का अर्थ है, भिन्न भिन्न कालों में भिन्न भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष। जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त मनुष्यों के पता लगने के पूर्व से ही अपना काम करता चला आया था और आज यदि मनुष्य-जाति उसे भूल भी जाय, तो भी वह नियम अपना काम करता ही रहेगा, ठीक वही बात आध्यात्मिक जगत् का शासन करने वाले नियमों के सम्बन्ध में भी है। एक आत्मा का दूसरे आत्मा के साथ और जीवात्मा का आत्माओं के परम पिता के साथ जो नैतिक तथा आध्यात्मिक सम्बन्ध हैं, वे उनके आविष्कार के पूर्व भी थे, और हम यदि उन्हें भूल भी जायँ, तो भी बने रहेंगे।“ हिन्दू धर्म पर निबन्ध भाग1 पृ8
हम विभिन्नताओं में, सार तत्व की खोज करना चाह रहे हें धर्म ही जीवन का सार तत्व हे। ईश्वरानुभूति ही लक्ष्य हे। सथी नदियॉं , जल प्रपात उसी महारसागर की दिशा में जा रहे है। कर्म कांड का ही मतभेद हे। यह भेद किताबों का, धर्म गुरुओं का है,विधि का हें परमतत्व एक ही है। उसके नाम , उसकी संज्ञा अनेक हो सकती हैं।
स्वामी विवेेकानंद जी के शब्दों में ,” जिस सर्वोच्च लक्ष्य की कल्पना सभी धर्म कर सकते हैं, वह है एक आध्यात्मिक सत्ता की। अतः कोई भी धर्म उससे परे की शिक्षा नहीं दे सकता, हर धर्म में एक सारभूत सत्य होता है, और उस रत्न को धारण करने वाली एक गौण मंजूषा होती है।“ भाग1 पृ283
आज धर्म और उसका स्वरूप ही कहीं खो गया है। मनुष्य अपनी पहचान अपने आपसे ही खो बैठा हैं। धातु की पहचान की उसका स्वभाव है। वही उसका धर्म है। पशु की पहचान उसका स्वभाव है। वह उसका धर्म है। परन्तु मनुष्य का धर्म, मनुष्य अपने मनुष्यत्व को ही खो बैठा है। परमहंस का आहृान इसी धरती पर मनुष्यत्व की स्थापना का था। उन्होंने नाना पंथों की आध्यात्मिक धारा के अनुभव की ज्ञानगंगा से होकर ही यह सत्य पाया था।
कालान्तर में उनका भव्य राज मार्ग भी संकीर्ण होता चला गया। वहां भी एक पंथ हो गया। अन्य पंथ आये व खंडन मण्डन में चले गये आध्यात्म की भूमि भारत है तथा पदार्थ जन्य ज्ञान की भूमि अमेरिका है यूरोप है। दोनों ही ज्ञान के बिना मनुष्य अधूरा है। मात्रा जड़ पदार्थ ही नहीं हैं, वह चेतना का समवाय भी है। जिनकी चेतना की पहचान ही आत्मसाक्षात्कार है। यही उसका स्वभाव है वह खो गया है जिसे उसे पाना है।
धर्म महासभा में अपने हिन्दू धर्म पर निबंध में स्वामीविेकानंदजी ने कहा था,-”
वहाँ भारत में एक के बाद एक न जाने कितने समप्रदायों का उदय हुआ और उन्होंने वैदिक धर्म को जड़ से हिला सा दिया; किन्तु भयंकर भूकम्प के समय समुद्र-तट के जल के समान वह कुछ समय पश्चात् हजार गुना बलशाली होकर सर्वग्रासी आप्लावन के रूप में पुनः लौटने के लिए पीछे हट गया; और जब यह सारा कोलाहल शान्त हो गया, तब इन समस्त धर्म-सम्प्रदायों को उनकी धर्म-माता (हिंदू धर्म) की विराट् काया ने चूस लिया, आत्मसात कर लिया और अपने में पचा डाला।
वह संसार की अवहेलना नहीं कर सकता है। यह ठीक है, यह माया है, परन्तु इसकी भी व्यवहारिक सत्ता है। कर्म से मनुष्य बच नहीं सकता है। कर्म ही कर्म से सन्यास दिला सकता है मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूर्णता को पाना है,शारीरिक, आर्थिक, मानसिक, बौद्धिक जो भी शक्तियां प्राकृतिक विधान से पायी गयी हैं, उनका पूर्ण विकास कर उस सामर्थ्य का सदुपयोग करना ही मनुष्य की भौतिक यात्रा का उद्देश्य है। श्रुति ने स्पष्ट निर्देश दिया है ”त्येन त्यकेन भुंजीथा” त्याग करते हुए भोग करो यह सम्पत्ति किसी की भी नहीं है। यह तो ईश्वरीय विभूति है। इसका सम्पादन होना ही जन्म मृत्यु का कारण है।
यह मात्र भोग भूमि ही नहीं हैं, यह तो लीला भूमि भी है। लीला भूमि में सारा कर्म खेल है। नट नटी का खेल है। जो कुशलता से खेला जाता है। अपना खेल भी खेलते रहो, आगे यह ध्यान रहे कि किसी का खेल हमारे कारण से बिगड़ने नहीं पाये, यही परोपकार कहलाता है। तब मनुष्य पाता है, सुख इन्द्रिय जन्य है। शांति अनुभव जन्य है, सुख का भोक्ता शरीर है। शांति मन के करण से संपादित होती है। और अहर्निश शांति में रहने से जब मन, मन से पार चला जाता है वहां मात्रा रह जाता है, आनन्द।
यही तो पूर्ण मनुष्य का स्वभावव है। जिसकी प्रवृत्ति मात्रा अहिंसा है। जिसका सौन्दर्य मात्रा प्रेम है। जो वर्णना से रहित है। जो मात्रा मनुष्यत्व की सुगंध हैं।
हिन्दू धर्म पर निबन्ध में आपने भारतीय चिन्तन की महानतम देन को स्पष्ट करते हुए कहा था-
उन्होंने कहा है कि मनुष्य को इस संसार में पद्यपत्र की तरह रहना चाहिए। पद्यपत्र जैसे पानी में रहकर भी उससे नहीं भीगता, उसी प्रकार मनुष्य को भी संसार में रहना चाहिए- उसका हृदय ईश्वर में लगा रहे और उसके हाथ कर्म करने में लगे रहें। भाग1 पृ13
इसी संसार में रहते हुए मनुष्य अपनी आध्यात्मिक यात्रा के सर्वोच्च लक्ष्य परमात्मा शक्ति का अनुभव प्राप्त कर जीवन को समाज, परिवार व व्यक्ति के विकास के लिए किस प्रकार समर्पित कर सकता है, यही पाना मनुष्य का लक्ष्य है। हम जब प्रकृति में दो पत्तियों एक जैसा नहीं पाते, तब सबके लिण् एक ही धर्म किा प्रकार चाह सकते हैं।
इस विभ्न्निता को संकेतित करते हुए भारत में ईसाई धर्म नामक आलेख में विवेकानेदजी ने कहा था-
”मनुष्य भिन्न होते हैं। यदि वे ऐसे न होते, तो विश्व-मनोवृत्ति का पतन हो जाता। यदि विभिन्न धर्म न होते, तो कोई धर्म जीवित न रहता। ईसाई को अपने धर्म की आवश्यकता है, हिन्दू को अपने धर्म की। सभी धर्म एक दूसरे से वर्षों से संघर्ष कर चुके हैं। जो धर्म किसी ग्रंथ के आधार पर संस्थापित हुए हैं, वे अभी भी टिके हुए हैं। ईसाई यहूदियों का धर्म-परिवर्तन क्यों नहीं कर सके? क्योंकि वे पारसियों को ईसाई नहीं बना सके? क्यो वे मुसलमानों को धर्मान्तरित नहीं कर सके? चीन और जापान पर कोई प्रभाव क्यों नहीं डाला जा सका?
प्रथम मिशनरी, धर्म, बौद्ध धर्म में धर्म परिवर्तितों की संख्या, किसी अन्य धर्म में परिवर्तित जनों की संख्या से दूनी है और उन्होंने तलवार का प्रयोग नहीं किया। मुसलमानों ने सबसे अधिक हिंसा का प्रयोग किया। तीनों महान् मिशनरी धर्मों में उनकी संध्या सबसे कम है। मुसलामनों का समय बीत चुका है। हर दिन तुम ईसाई राष्ट्रों का रक्तपात से भूमि पर अधिकार करने की बात पढ़ते हो।
धर्म-प्रचारक इसके विरूद्ध क्या उपदेश देते हैं। सर्वाधिक रक्तपिपासु राष्ट्र, उस कथित धर्म पर, जो ईसा का धर्म नहीं है, क्यों गर्व करें? यहूदी और अरब ईसाई धर्म के पिता थे और ईसाइयों द्वारा उन्हें कैसा पीड़ित किया गया! भारत में ईसाइयों को कसौटी पर कसा गया है और वे खोटे सिद्ध हुए हैं। मेरा आशय निर्दय होने का नहीं है, पर मैं ईसाईयों को दिखाना चाहता हूं कि दूसरे उन्हे कैसे देखते हैं। जो धर्म-प्रचारक नरक के अग्निमय गर्त का भय दिखाकर उपदेश देते हैं, उन्हें आतंक से देखा जाता है। मुसलमानों की लहरों पर लहरें तलवार झुमाते हुए भारत में गिरी और आज वे कहाँ हैं? भाग1पृ 283
हम एक नए धर्म की चर्चा कर धर्म परिवर्तन और सांप्रदायिक आग्रह का निषेध करते हे। विवेकानंद जी मानव धर्म की खोज में थे, तहॉं मनुष्य इसी जीवन में स्वतंत्रता पा सके। हर महापुरुष ने उसकी मुक्ति की चाह
रखी है, इस्लामिक साधना में रूह का पवित्र होते हुए अंत में फ़ना हो जाना सार तत्व हे। सूफ़ी परम्परा भक्ति की परमावस्था है।
आज विश्व समुदाय उस पथ की खोज में हैं जो मनुष्यता को उजागर कर सके। जो समाज को सुख शांति दे सके। जहां पूंजीवाद आज सम्पूर्ण समाज पर, विश्व पर अपनी मनोहारी, आत्मघाती प्रवंचकी मुद्रा से भादों की काली घटा की तरह छाता चला जा रहा है। वहीं साम्यवाद ”मागृधः कस्य स्वित् धनम् के सूत्र के साथ लिए यह संपत्ति किसी की भी नही है। कहता हुआ, आचरण में उत्कट भोग और हिंसा का गठजोड़ देखकर हताश है।पर उसका वट वृक्ष उखड़ गया है। पूंजीवाद इसमें अपनी विजय देख रहा है। परन्तु पूंजीवाद मनुष्यत्व के शोषण का अनन्यतम प्रयास है। यह मात्रा मनुष्य को एक उपभोक्ता सामग्री में ही बदल रहा है। यहां मानवीयता नहीं है। मात्रा जड़ता है।
इस धरती का संदेश जहां जितना पुराना रहा है, वहीं उतना ही अधुनातन भी रहा है, यह सम्पति किसी की भी नहीं है, यह सच है, परन्तु ईशा का वास, जड़ चेतन सभी में हैं। यह ऋषि का अनुभव गम्य जयघोष था अधूरे चिंतन पर कोई इमारत खड़ी नही हो सकती। भारत का भविष्य संपूर्ण विश्व का भविष्य है।
भारत को आज अपनी पहचान तलाश करनी है। उसका मार्ग न पूंजीवादी व्यवस्था में हैं, नहीं साम्यवादी जमीन पर है। भारत के भविष्य दृष्टा, मानवीयता की तलाश में वादों की भूलभूलैया में कैद होते चले गये हैं।
हम हिन्दू हैं, धार्मिक है, शरीर का और जीवन का उद्देश्य जानते है। इसी जीवन में ईश्वरानुभूति के मार्ग पर अग्रसर हैं। हम मानते हैं, धर्म हमारा प्राण है।
हमारे धर्म की सामान्य सार बातों पर चर्चा करना उचित मानते हैं।
धर्म के जगत में यहां मात्र शब्द ही महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण आचरण है। भारतीय चिंतन सुख के विरोध में नहीं है। सुख की खोज ही मनुष्य की यात्रा का प्रथम पड़ाव रहा है। यही पूंजीवादी विचारधारा की आकर्षक भूमि है। औपनिषदिक धारा सुख के विरोध में नहीं है। तपस्या का अर्थ शरीर को यातना देना नहीं है। भौतिक वाद की अवहेलना कर, आज मनुष्य जी नहीं सकता है। आज तथा कथित संप्रदाय जो भारतीयता का जयघोष कर पुष्पित व पल्लवित हो रहे हैं। वे यूरोप व अमरीका जाकर वहां से मात्र संपत्ति ही बटोर कर ला रहे हैं। न इधर के रहे न उधर के रहे।
विदूषकों की जमात खड़ी हो गई है। शब्द बासी भोजन की तरह हो गये हैं। और यही कारण है कि संपूर्ण विश्व में भारत की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। स्पष्ट चिंतन, अभय की जमीन पर खड़ा होता है। जब आत्मलीन हंस, मान सरोवर से जुड़ता है, जिसका एक पंख अभय का है, तथा दूसरा विवेक का है, तभी चिंतन के कण ज्योतित होते हैं।जिसको प्रचार की आकांक्षा है, पंथ की आकांक्षा हो, धर्म को राजनीति में जोड़कर प्रभुत्व प्राप्ति का लक्ष्य हो, वह भारतीय आर्ष चिंतन से कोसों दूर हैं। हमें भौतिकवाद को उसका सही स्थान देना होगा। और वह माया ही नहीं, लीला है, यह आधार भूमि है। नाटक है। एक बहुत बड़ा खेल है। स्वप्न तो इसलिए मिथ्या है कि उसमें निरन्तरता नही है। परन्तु जो जाग्रत में भासता है क्या वह भी निरन्तरता में रह पाता है ? यह भी तो उसी तरह निरन्तर गत्यात्मकता में हैं।
परन्तु उसका अर्थ यह नहीं है कि कार्य ही नहीं किया जावें। लीला में कर्म मात्र खेल है। यह तो प्रभु की लीला है। चिरंतन नृत्य है। बूंद के साथ मटमैलापन भी है। धीरे धीरे मटमैलापन कम हो जाये। और वह उज्जवल शुभ हो जावे ताकि ज्योति उसके पारदर्शी तल को ज्योतितं कर जावे, यही साधना रहस्य है।
यही कारण है जो नई राह बनाते हैं, वे परंपरा का अवदान तो होते हैं, परन्तु वे परम्परा के बीच से स्वतः ही हटते जाते हैं। वे मात्र अनुकरण कर्ता नहीं होते, वे मात्रा मौलिक होते हैं। सृजनात्मकता वहीं जन्मती है, जहां पुराना अवदान अपना आशीष देकर स्वतः ही पतझड़ के पत्तों की तरह खामोश विदा ले पाता है। और परम्परा सदा गत्यात्मक होती है, है, परन्तु रूढ़ियाँ जड़ होती है। ये नदी के प्रवाह पको रोकती है। सृजनात्मकता का जन्म इन परम्पराओं के अंतिम छोर पर होता है, जहां परम्परा अपना अवदान सौंपकर स्वतः सन्यासोन्मुख हो जाती है। परम्परा का यहां निर्वाह नहीं होता वरन् गत्यात्मकता प्रयोगी की नई राह सौंपती है। जहां तक पथ है वहां पर परम्परा है। परम्परा में पद चिन्ह होते हैं। परन्तु जो परम्परा को धन्यवाद देकर गतिशील होते हैं। वहां चरण सुरक्षित नहीं रहते हैं। यही पथ विहिन पथ है। जो पथ पर ही हैं, वहां मौलिकता की संभावना तो है, परन्तु सृजनात्मकता अभी गर्म में ही है।
हमारी दृष्टि में , यह सच है, आधुनिकता कभी ओढ़ी नहीं जाती है। आधुनिकता वही जन्मती है, जहां चित्त इतना संवेदनशील हो जाता है कि उसकी समस्त अवधारणाएं चली जाती है। यह चित्त की वह विशेष अवस्था है जहां पतझड़ की तरह सब वासनाएं झड़ जाती है। रह जाता है मात्रा एक खालीपन एक खुला आकाश उसी में आनन्द उपजता है। यही मौलिकता पैदा होती है। यही सृजनशीलता है।यही धार्मिकता है।
स्वतंत्रता जहॉं हर प्रकार का दासत्व चला जाता है।
स्वामी विवेकानंदजी ने कहा था, हिन्दू धर्म में सभी के लिए सारतत्व है, हम सझने का प्रयास करें-
”ईसाई धर्म जैसे सभी धर्मों का दोष यह है कि उनमें सभी के लिए एक ही नियमावली है। किन्तु हिन्दू धर्म सभी प्रकार की धार्मिक अभीप्सा अैर प्रगति की सभी कोटियों के लिए उपयुक्त है। उसमें सभी आदर्श अपने पूर्ण रूप में है। उदाहरण के लिए शांत या परमानन्द का आदर्श वशिष्ठ में मिलता है, प्रेम का कृष्ण में, कर्तव्य का राम और सीता में बुद्धि का शुक्रदेव में। इन और अन्य आदर्श पुरुष के चरित्रों का अध्ययन करो। ऐसे एक को ग्रहण करो, जो तुमको सर्वाधिक अनुकूल लगा हो। स्फुट विचार भाग1 पृ303
आज पश्चिम जिस आधुनिकता की चर्चा करता है, वह उसी प्रकार से है, नीले रंग को छोड़कर हरे रंग के कपड़े पहन लेना। कपड़े कपड़े ही है। कपड़ों के बदलने से रूपान्तरण नहीं आता इसीलिए महावीर ने ”दिगम्बर” की चर्चा की थी। परन्तु जो नंगे हो गये, वे भी परम्परा का अवदान तिरस्कृत कर रूढ़ियों के जाल में चले गए। यहां दिगम्बरता आधुनिकता में परिवर्तित नहीं हो पायी। आधुनिकता सभी अवधारणाओं के व्यापक दबाव से मुक्त मन में उपजती है। जो आधुनिक है, वही मुक्त है। जो मुक्त है वही आधुनिक है। और वास्तव में वही धार्मिक है।
परमहंस ”होमा” पक्षी का उदाहरण दिया करते थे। जो आकाश में ही जन्म लेता और अचानक ही आकाश में इस भय से कि कहीं नीचे आकर मर नहीं जाए वह उड़ने लग जाता। ”होमा” पक्षी का उदाहरण इस मौलिक परिवर्तन की सूचना है। जहां जो घटता है, वह अचानक घटता है। सतत प्रक्रिया उसके अंडज तक होने की है। परन्तु जो मौलिक परिवर्तन उसमें आता है, जहां उसके पंख निकल आते हैं, वह उड़ने लग जाता है। यही मुक्ति पर्व है।
सामान्य हिन्दू भी सांप्रदायिक नहीं होता, वह मस्जिद के सामने से जब गुजरता है, हाथ जोड़ देता है। वह ताकजण् के नीचे से गुजरना चाहता है, उसका विश्वास है, इससे उसका भला होता हे। मानव धर्म वहीं है , जो हर मनुष्य के अभ्युदय और निश्रेयस की कामना रखता है।
धार्मिक वह है जो प्रयोगशील है। जो सत पथ का अन्वेषी है। परन्तु यही नहीं होता है, हम मात्र अनुकरण के पुतले होकर रह जाते हैं। यही विवशता है। जो सत्य पथ का अन्वेषी है, वह कहीं रूकता नहीं है। मात्रा चरेवैति यही पथ रहता है। वहां पर भी रूक गए तो मोह होगा, आत्म मुग्धता सबसे अधिक भयानक है। निज का निज पर जो सम्मोहन होता है, वह आत्मघाती होता है। इस दासता विकारी के साथ ले आता है।
इसलिए भागों मत, सामना करो। संसार में ऐसा कोई अरण्य नहीं हैं, जहां समस्याएं नहीं होगी, दुख नहीं होगा अशान्ति नहीं होगी। यह तो प्राकृतिक घटनाएं हैं। जहां भी तुम हो वहीं रहना सीखो, खूंटियां भी है, धागे भी हैं, पर अब बंधने वाला सजग हो उठा है। तब राग द्वेष के लिए जगह नहीं मिलती है।
21 फरवरी 1894 को डिट्रायट में सवामीजी ने हिन्दू और ईसाई विषय पर भाषण दिया था। मुख्य बात है, हम तब पराधीन थे। 120वर्ष पूर्व के भारत की कल्पना करनी कठिन है, ईसाइयों का शासन था। लगभग सात सौ साल तक इस्लाम शासन कर चुका था। तब हिन्दू धर्म के सार तत्व की बात करना साहसी काम था। हिन्दू धर्म का सार तत्व यहॉं से ग्रहण किया जा सकता है।
स्वामीजी ने कहा था- ”तुम अपने धर्म को आक्रामक धर्म कहते हो। तुम आक्रामक हो, पर तुमने कितने को पाया है? संसार में हर छठवाँ व्यक्ति चीनी प्रजा है अर्थात् बौद्ध है; और तब जापान, तिब्बत, रूस और साइबेरिया और बरमा और श्याम है; और यह चाहे अच्छा न लगे, किन्तु यह ईसाई नैतिकता, यह कैथोलिक सम्प्रदाय सब उन्हीं से निःसृत है। अच्छा, तो यह कैसे किया गया? बिना रक्त की एक बूँद भी बहाये हुए। अपने दम्भ और आत्मश्लाघा के बावजूद, बिना तलवार के ईसाइयत कहाँ सफल हुई है? संपूर्ण विश्व में मुझे एक स्थान दिखाओ। केवल एक, मैं कहता हूँ, ईसाइ धर्म के संपूर्ण इतिहास में एक मुझे दिखाओ; केवल एक, मैं दो नहीं चाहता। मैं जानता हूँ, तुम्हारे पूर्वजों का किस प्रकार धर्म-परिवर्तन किया गया। उनके सामने दो मार्ग थे, धर्म-परिवर्तन करें या मारे जायँ, बस, यही। तुम अपने समस्त दंभ के बावजूद इस्लाम धर्म से क्या अच्छा कर सकते हो। ‘‘बस हमीं है! और क्यों? ‘‘क्योंकि हम दूसरों को मार सकते हैं।’’ अरबों ने यह कहा और उन्होंने दंभ किया। पर आज अरब कहाँ है? वे गृहहीन हैं। रोमन ऐसा कहा करते थे और आज वे कहाँ है? शांति लाने वाले ही धन्य हैं, पृथ्वी उन्हीं की होगी! ऐसी वस्तुएँ, भूमिसात् हो जाती हैं, वे रेत पर बनीं होती है। वह बहुत समय तक नहीं टिक सकतीं। भाग1 पृ278
हिन्दू धर्म जिसमें अनेक संप्रदाय हैं, हिन्सा के आधारप , प्रलोज्ञन के आधार पर धर्म परिवर्तन नहीं चाहतंे।जैन धर्म , सिक्ख र्ध्म, बौद्ध धर्म अपने विचारो ंका प्रसार -प्रचार करते है। यहॉं धर्म परिवर्तन का आग्रह नहीं हे। आप को जो उचित लगे करते रहें। यहॉं तक पति अग्रवाल हिन्दू है, उसकी पत्नी जैन हे। किसी प्रकार का किसी पर कोई दबाब नहीं है।
मुक्ष्य बात है, धर्म का जीवन जीने की कला बन जाना। यहॉं धर्म ही जीवन का प्राण हे। साधना के बिना जीवन अधूरा हे। जैन मंदिर जाता है। हिन्दू मंदिर जाता है। मुसलमान नमाज पढ़ता हे। सिक्ख गुरुद्वारे जाता हे। धर्म का सार तत्व ईश्वरानुभूति पाना हे। सब के लिए सब बराबर हैं। यही मानव धर्म का आधार है।
कर्मकांड पहली पाठशाला है, इसे उपरांत सब के पास अपनं-अपनं पुराण हे। यह यात्रा बहिर्मुखी है। इसके बाद वह अपने भीतर सत्य की तलाश करता हे। यही आध्यात्मिकता है। यहॉं बाह्य का अनुशासन ढीला पड़ जाता हे। यहीं धर्म का सरतत्व उपस्थित होता है।
एकाग्रता के उपसय औा ध्यान सीखना मनुष्य चाहता हे। मन की शांति , शक्ति की चाहत , अनेको संप्रदायों के आचार्यों को जन्म दे जाती है।
सारतत्व साधना का मिलता है- ”पवित्र बनो। अंधविश्वास छोड़ो और प्रकृति के आश्चर्यजनक समन्वय का दर्शन करो। अंधविश्वास धर्म के अधिकांश को मिटाता है। सभी धर्म अच्छे हैं, क्योंकि सारभूत बातें समान है। प्रत्यक मनुष्य को अपने पूर्ण व्यक्तित्व का उपयोग करना चाहिए, परन्तु इन व्यक्तित्वों से एक पूर्णत्व की सृष्टि होती है। यह अद्भुत अवस्था पहले से वर्तमान है। इस आश्चर्यजनक ढाँचे की संरचना में प्रत्येक धर्म का कुछ न कुछ योगदान है। भाग 1 पृ284
और तब वर्तमान में रहने का क्षण उपस्थित हो जाता है। वर्तमान तो काल खंड से मुक्त क्षण है। जब तक अतीत है, भविष्य है, और वह मनोवैज्ञानिक जगत में उपस्थित है, वहां वर्तमान नहीं होता है, वहां राग व द्वेष अपनी संपूर्णता में उपस्थित रहते हैं। वर्तमान में रहने की पहली उपसंपदा यही प्राप्त होती है, बाधएं उसी तरह से उपस्थित रहती है, पर परिवर्तन अपने भीतर आने लगता है। बाह्य अपनी तीव्रता से प्रभावित नहीं कर पाता है। तब चित्त एक विशेष प्रकार की कोमलता को पाता है, जिसकी उपसंपदा है, परोपकारी वृत्ति। यहां राग नहीं होता है, खूंटियों पर अटकने वाला धागा क्षीण हो जाता है, वहां चित्त में स्वतः ही उदारता प्रवेश कर जाती है। यही परोपकारी वृत्ति है। यहां आकर पर का सहारा छूट जाता है। जहां तक वर्तमान में रहने का अभ्यास रहेगा पराश्रय नहीं होगा। दूसरे का सहारा दूसरे की आवश्यकता के हटते ही छूट जाता है।
यह स्थिति शब्दों से वर्णन नहीं की जा सकती है। क्योंकि हमारा सारा जीवन दूसरों पर आश्रित है। दूसरों का सहारा दूसरे की आवश्यकता के हटते ही छूट जाता है। यह स्थिति सही नहीं पाती। कहीं कोई सहारा नहीं मिलतर। सब तरफ जैसे रास्ते ही मानो खो गए हों। कुछ नजर नहीं आता, असफलता बाहर हर मोर्चे पर मिलती है। सब जगह लगता है, रास्ते बन्द हो गए हों। जैसे चूहा पिंजड़े में बन्द हो गया हो। बिल्कुल वैसा ही घट जाता है। साथ के संगी भी हट जाते हैं। पुरानी बाधांएँ रहती हैं। भगवान राम भी बनवास में सीता हरण के बाद ऐसे ही निराश्रित होकर रह गए थे। राजा रानी द्रोपदी को भगवान कृष्ण के लिए पात्रा में चावल का एक दाना मिला था। यही वह स्थिति है, जो साधक के जीवन में घटती है जब प्राकृतिक विधान से परमात्मा की कृपा होती है, तभी हमारे सारे सहारे छूट जाते हैं। ब्रहृानिष्ठ गुरू देने को संसार की सारी सुविधाएं दे सकते हैं। योग क्षे वहाम्यम, परन्तु वे जिन्हें सचमुच देना चाहते हैं, उन्हें बहुमूल्य स्वाश्रय सौंपते हैं।
पराश्रय नहीं। पराधीनता नहीं। तभी लगता है साथी संगी सभी छूट गए हैं आप मात्रा अकेले रह गए हैं। इस खतरे को समझना सरल नहीं है। जब किसी का एक सहारा छूटता है तो जीवन में अंधेरा आ जाता है। जब सारे सहारे छूट जावें , सारे आश्रय चले जाते हैं, तब अचानक जो घट जाता है उसकी कल्पना नहीं होती है। यहीं सन्यास का अनुभव होता है। सारी अवधारणाओं, सारी मान्यताओं से अचानक छूट जाना पर धीरे धीरे यह भी मात्र रूढ़ि होकर रह गई। सन्यास का सौंदर्य चला जाता है। वहां मुक्तता नहीं रही, बंधन रह गया है। जड़ता आ गई । सन्यास इसी स्वाश्रय का दूसरा नाम है। यही आत्मकृपा का अवदान होता है।
यहां कपड़े बदले का आग्रह नहीं है। नही संसार का परित्याग है। वरन् अपने अंतस में उस अभूतपूर्व परिवर्तन का अहसास होना है, जहां मात्र रूपांतरण अभी अभी हुआ है।
स्वामीजी ने कहा था,- ”कितनी ही बार मुझसे कहा गया हैकि अतहत की ओर नजर डालने से मन की अवनति होतह है।इससे कोई फल नहीं होता, अतः हमें भविष्य की ओर दृष्टि रखनी चाहिए। यह सच है।
यह अवधारणा साधारण नहीं होती है। जब किसी साधक के जीवन में ऐसा घटता है, तब उसके भीतर आग लग जाती है। आग, शवदाह मुर्दे जल उठते हैं। रूढ़ियों को शव की तरह लादे विक्रमादित्य घूमता ही रहता है। जो आश्रय है, वे मात्रा शव ही है। अतीत के पिटारे हैं, खुलते हैं। और जलने लग जाते हैं। अब जो बचता है, वह तो राख ही है। वही राख शिवजी ने लगा रखी है। यही भभूत का रहस्य है।
शिव और शव का भेद यही है। जो आश्रयों के सहारे टिका है, वह शव है। उसकी शक्ति का केन्द्र बाहर है। जो अपनी शक्ति के सहारे है, वही शिव है। यहीं से वैराग्य आरम्भ होता है। वैराग्य घर से भाग कर जंगल में जाना नहीं हैं। वहां भी राग रहता है। अंतस के बदलाव के बिना कोई परिवर्तन नहीं आता है। यह सामान्य सा प्रकृति का नियम है। फिरकनी को बाहर से कितना बल लगाओ, जब तक बल रहेगा, फिरकनी घूती रहेगी बल हटा, फिरकनी रूक जावेगी। वैराग्य है, सारे आश्रयों के छूट जाने से उत्पन्न चित्त की सरलता। अगर चित्त प्रभावित है तो राग है। चित्त अप्रभावित है, अविचलित है, तो शांत है। यदि शांत है। तो वैराग्य है।
संसार तो आश्रय की बुनियाद पर ही भविष्य की इमारत तैयार करता है। आश्रय के हिलते ही सुरक्षा की इमारते गिरने लग जाती है। रह जाता है, मात्रा एक खालीपन यही भय आता है। जब तक कहीं ना कहीं आश्रय है, हम भय की ओर से पीठ कर लेते हैं। परन्तु आश्रय के हटते ही चारों तरफ से भय ही भय घेर लेता है। यह भय मृत्यु से बड़ा होता है। मृत्यु के बाद तो सब समाप्त हो जाता है। परन्तु यहां तो जीवित रहते हुए भी सब कुछ को करते हुए देखना है। सारी आसक्तियों को सारी अवधारणाओं को सारी कटुताओं को उस द्धेष को जिसे हम सहेजकर अपने अंतस में रखते चले आए हैं। उनका मर जाना, मिट जाना, क्या बर्दाश्त हो पाता है। होलिका दहन है। अब सब जलेगा। और लौ उठेगी। सन्यासी गैरिक वस्त्र पहनतें हैं। आग की तरह। यह रंग सब राख हो जाने पर उत्पन्न प्रकाश का है। जो उज्जवल है। मात्रा गैरिक है, तब जो शेष रह जाता है, वह मात्रा विश्वास है। होलिका जल जाती है।
घृणा जल जाती है। पशुता जल जाती है। प्रहलाद बच जाता है। मात्र विश्वास बच जाता है। यही तो सन्यासी का गीत है। उसका सौंदर्य है। पर आज जो सन्यासी है, वह तो सबसे ज्यादा असुरक्षित तथा भयभीत है। पूर्वग्रहो से जकड़ा हुआ है।
क्योंकि वह भीतर से अभी राख नहीं हुआ है। उसके अंतस में अभी होलिका नहीं जली है। उसका प्रहलाद अभी परतंत्र है। उसके पास आत्मविश्वास नहीं है।
और यह विश्वास प्राप्त होता है, स्वाश्रय की जमीन पर। जब वह पूरी तरह निराश्रय हो जाता है। तभी उसके भीतर अन्तर्मुखता का प्रवाह जन्मता है। तब उस प्रवाह में उसके भीतर जो अंतर्मन है, जो स्व है, यह प्रकट हो जाता हैं
वही तो अपना आश्रय होता है। वही स्व है। उसका अनुगमन स्वधर्म हैं जिससे न तो देशकाल की दूरी होतर है, और न ही फिर जिसकी प्राप्ति के बाद उससे कभी अलगाव हो पाता है। जहां, अपना आश्रय है, उसका नाम कुछ भी दिया जा सकता है।
यह यात्रा अहम् से आत्म तक की है। जो अहम् है, वह स्थूल होता है, स्थूल को परिभाषित कर सकते हैं, परन्तु जो आत्म है, वहां अहम् है ही नहीं। और जहां कुछ भी नहीं है, उसकी परिभाषा नहीं होती है। उसके लिए जगत ही आत्मवत हो जाता है। श्रुति ने बार बार कहा है सर्व भूतेषु सर्वभूतेषु हिते रतः यही अंतिम अवस्था है। जहां जगत के समस्त प्राणी आत्मवत है। पृथकता का नाम मात्र का अंकन तक नहीं है। यही संस्कृति जन्मती है। जिसकी धरती पर धर्म का वृक्ष खड़ा होता है। इस संस्कृति की बुनियाद व्यवहार है। आचरण है।
यहां बाहुबल नहीं हैं, यहां धन बल नहीं है, यहां मात्र ज्ञान है। ज्ञान, श्रुति स्मृति पर आधारित कोई बड़ी बातें नहीं है। ज्ञान तो हमारा व्यवहार है। हमारा आचरण होता है। तब जो कुछ जाना गया है, वही व्यवहार हो जाता है। यही ज्ञान का आरम्भ है। ज्ञान किसी पाठशाला में नहीं मिलता। न ही सिखाया जाता है। यह तो आचरण की बात है। हमारा व्यवहार ही ज्ञान की परख को बताता है। किताबी बातों को ज्ञान नहीं कहते हैं।
सभी का सार तत्व यही है कि मनुष्य को वर्तमान में रहने की कला आनी चाहिए। और यह प्राप्त होती है मात्रा आत्म कृपा से। तब शरीर और मन और प्राण की धारा एकोन्मुख हो जाती है। इसके लिए किसी ब्राहृाप्रयास की आवश्यकता नहीं है। यहां जो कुछ भी होता है, अंतस में होना है: यही सच्ची धार्मिकता होती है। हमें इसी जीवन में ही विश्व का संचालन करने वाली इस महान शक्ति का अनुभव प्राप्त करना है। और यही तभी होता है जब हम सारे आश्रयों से मुक्त हो जावें, तभी बाहृयमन निष्क्रिय होता जाता है। यह होना एक निरंतरता है, परन्तु जो अचानक घटता है, वह यह है कि अन्तर्मन जो जाग्रत तो था, परन्तु उसका अहसास नहीं था, उसका अहसास जग जाता है यही जागृति है।
परन्तु यही नहीं होता है, हम कितनी भी शास्त्र चर्चा करें, कितना ही बाहृा प्रयास करें, ये सब बाहृा मन को सक्रिय ही करते हैं। चित्त में तो वैसे ही प्रर्याप्त संग्रह था, हम और संग्रह करते जाते हैं, साधना के नाम पर असाधन ही करते हैं। यही माया है। हाँ, जो वर्तमान में हैं, वही इस चक्र से बाहर जा सकता है। चित्त में संग्रह होता है, निरंतर खूटियां पकड़ने से ये खूंटिया होती है, राग -द्वेष की।। राग- द्वेष के संग्रह से यहां भी भीड़ जमा होती रहती है, सुख व दुख का कारण तलाश करने की आदत से। इससे निरंतर भटकाव बना रहता है। पराश्रय कायम रहता है। ये दोनों एक दूसरे के सहयोग है। पूरक हैं। एक कम होता है, दूसरा अपने आप कम होता जाता है।
स्वामीविवेकानंद जी ने दीवान साहब श्री हरिदासजी को 29 जनवरी 1894 के पत्र में लिखा था-
”
”हम केवल सब धर्मों के प्रति सहिष्णुता ही नहीं रखते ,वरन् एन्हें स्वीकार भी करते हैं, एवं प्रभु की सहायता से सारे संसार में इसका प्रचार करने का प्रयत्न भी मैं कर रहा हूॅं।
प्रत्येक मनुष्य और ंएवं प्रत्येक राष्ट्र को महान बनाने के लिए तीन बातें आवश्यक हैं।-
1 सदाचार की शक्ति में विश्वास
2 ईर्ष्या और सन्देह का परित्याग
3 जो सत् बनने या सत् करने के लिए यत्नवान हों, उनकी सहायता करना।
क्या कारण है हिन्दू राष्ट्र अपनी अद्भुद बुद्धि एवं अन्यान्य गुणों के रहते हुए भी टुकड़े- टुकड़े हो गया।? मेरा उत्तर होगा- ईर्ष्या। कभी भी कोई जाति इस मन्द भाग्य हिन्दू जाति की तरह इतनी नीचता के साथ एक दूसरे से ईर्ष्या करने वाली, एक दूसरे के सुयश से ऐसी डाह करने वाली नहीं हुई, और यदि आप कभी पश्चिमी देशों में आएॅ, तो पश्चिमी राष्ट्रों में इसके अभाव का अनुभव सबसे पहले करेंगे।“ भाग2 पृ325
इस दबाव से तभी मुक्त हुआ जा सकता है, जब इस चक्र को सहज विकास क्रम के अन्तर्गत स्वीकार किया जाता है। विष्णु के चक्र का यही रहस्य है। यही बोधिसत्व का चक्र है। इस चक्र से मात्रासमझ के द्वारा ही स्वतन्त्रता पाई जा सकती है। अन्यता यहां तो मात्रा बंधन ही है। जहां तक अहम है वहां तक जड़ता है। बंधन है। जहां अहम का अभाव होगा, वहां मात्र मुक्तता होगी। और उसकी न तो कोई विशेष पहचान होगी, न कोई विशेषता होगी। यहां जो बच जाती है, वही मात्रा तितिक्षा है। तितिक्षा सहनशीलता नही है यहां तो जो घटता जा रहा है, उससे अप्रभावित होने की क्षमता है। अभी मनोजगत तुरन्त विचलित हो जाता है। मात्र एक आवेग, एक संकेत, एक सहारा ही बहाव के लिए पर्याप्त होता है। परन्तु तितिक्षा धीरे धीरे इस बहाव की गति पर रोक लगाती जाती है। तब प्राप्त होती है, आश्रयहीनता। एक ऐसी अवस्था जहां मात्रा ऊसर जमीन रह जाती है। खूंटियों का अभाव हो जाता है।
रेगिस्तान का भी अपना सौंदर्य है। डूबते हुए सूरज का जो अक्स रेत के टोलों पर पड़ता है, वही शेष रह जाता है, इतना स्पष्ट है कि पद चिन्ह भी साफ साफ दिख जाते हैं। बहाव के प्रति इतनी संवेदनशीलता सतकर्ता से प्राप्त होती है सतर्कता की बच जाती है। जो सजगता में ढलना चाहती है यहीं जो शेष बचता है वही दिगम्बरत्व है। दिगम्बर कपड़ों का खोल देना नहीं हैं। यह तो परम सौंदर्य की उपलब्धि है। यहां तो अंतस का घट रीत गया है। एक अजीब सा खालीपन। वहां रिक्तता भी नहीं हैं। भरा भरा सा है। कुछ छलक जाने को है। खूंटियां नहीं है। बाहृा का दबाव नहीं हैं बन्धन नहीं हैं। खाली भी हुआ है पर भर भी गया है। क्या सचमुच यहां प्रेम नहीं होता ? प्रेम न स्थान घेरता है, न उसकी कोई आकृति है, न कोई छाप होती है। वह तो स्वयं पूर्ण होता है और दिया भी पूरा जाता है जिसे मिलता है वह पूर्ण है जिसके पास रह गया है, वह भी पूर्ण है। यही जो भी व्यक्ति आ रहा है मात्रा एक निमिष में अपने आपको भरा हुआ पा रहा है घट तो उसका ही है, यहां तो मात्रा एक प्रवाह है अंनत प्रवाह, निमिष में ही पात्रा भर जाता है, पात्र फूटा है, और स्वयं ही गले तक भरा हुआ है तो बात दूसरी है, अन्यथा यहां तो देना मात्रा एक छटांक भर है, और पाना मन भर होता है यहीं स्वाश्रय की उपलब्धि होती है। यही आत्मकृपा है। तभी आत्मविश्वास पैदा होता है। तभी विवेक जगता है।
स्वाश्रय ही आत्म कृपा पैदा करता है। आत्म कृपा, साधक को अभय प्रदान करती है। अभय और विवेक यहीं की उप संपदाऐं हैं।
यह कथन मात्रा शाब्दिक नहीं हैं, आज आध्यात्मिक जगत में सबसे अधिक नगण्य मनुष्य हो गया है। उससे उसकी निजता छीन ली गई है। धर्म, शब्द आज इतना विकृत हो चला है कि वह बाहुबल का ही पर्याय हो चला है। सनातन धर्म अपनी गत्यात्म्क यात्रा को खोता हुआ, मनुष्यत्व की स्थापना को छोड़ता हुआ मात्रा विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति के निर्माण में ही मानो संलग्न हो गया है।
धर्म के केन्द्र में मनुष्य है । उसका मनुष्यत्व है। उपासना गृह नहीं हैं। जड़ इमारतें नहीं हैं। आज इमारतें महत्वपूर्ण हो गई है। प्रस्तर खंड महत्वपूर्ण है। परन्तु परम चैतन्य मनुष्य उपेक्षित हो गया है। यहां जो यात्रा है, वह मनुष्यत्व की है। आत्मकृपा शब्द बहुमूल्य हैं
जहां तक मंदिर है, उपासना हैं, कर्मकाण्ड है, अर्चना है, वहां दूसरा है, वहां तक पराश्रय है। शक्ति का आश्रय बाहर है। जहां तक आश्रय बाहर है, वहां तक बर्हिमुखता रहेगी। बहाव रहेगा। मन खूंटियों में जकड़ा रहेगा। वह अपने आपसे जुड़ नहीं पाएगा। वह अतीत और भविष्य के संक्रमण में रहेगा। परन्तु जब वह अपने आप से जुड़ने लगता हैं और जितना वह वर्तमान में रहने लगता है, उतना ही उसका मन जो चक्रकार गति से बाहर बहता है वह एकोन्मुखता पाकर अन्तर्मुखी होने लगता है। प्राण मात्रा श्वास ही नहीं हैं। श्वास तो मात्रा सहायक है। मन में गति है। परन्तु प्राण में सृजन करने की क्षमता है। शशु जब गर्भ में होता है तब ले, लेकर उसकी अंतिम यात्रा तक पोषण करने वाली शक्ति ही प्राण है।
विपश्यना साधना आज जिस रूप में प्रचलित है, वह वृक्ष के पत्तों का बाहृा रूपान्तरण है। बिना पतझड़ की प्रतीक्षा लिए नई कोपलें नहीं आती है। एक बार तो निर्वसन होना ही होगा। स्वाश्रय की गन्ध जब देह वृक्ष से निसृत होती है, तब जो कोपले इस वृक्ष से फुटती है, वहां विपश्यना स्वतः उपलब्ध हो जाती है।
विशिष्ट भी है, विपरीत भी है। यह पराश्रय से स्वाश्रय की यात्रा है। बिना स्वाश्रय पाए, आत्मकृपा नहीं आती है इसी भाव भूमि पर ही विपश्यना का संगीत उभरता है। सावित्राी सत्यवान और यम, भारतीय चिन्तन का अद्भुत उदाहरण है। सावित्राी रहस्य प्राण साधना ही है। यह प्राण अब स्वतः ही जो उर्ध्वाकार रहा था। मन की आत्मा कृपा को भाव भूमि पर, जितना वह वर्तमान को उपलब्ध होता जाता है उससे संयुक्त होने लग जाता है। यही योग है। यह युक्ति ही मुक्त मनुष्य की उपसंपदा है। क्योंकि जब स्वतः ही उस मनुष्य के भीतर उसे विवेक की उपलब्धि प्राप्त होती है। यही ब्रहृा निष्ठ गुरू की प्राप्ति का रहस्य है। गुरूत्व स्वतः ही समर्पित होता है। यहां यात्रा अहम् से आत्म की है। आत्म तत्व ही उसका उद्धार कर सकता है। उसे होना है तो अपने आपके प्रति समर्पित होना है।
यहीं तो हृदय की मुक्तावस्था होती है। साधारणी करण में ही आनंद भाव पैदा होता है। हृदय की मुक्तावस्था में ही आनंद उपजता है। और यह मुक्तावस्था ही स्वाश्रय की भूमिका है। यही तो आत्मकृपा है। बिना यहां आए क्या रसेश्वरी से साक्षात्कार संभव है। हृदय की मुक्तावस्था ही श्री राधिका रहस्य है। यहीं आत्मकृपा है। उसकी उपसंपदा प्रेम है। प्रेम का मानवीकरण ही तो श्री कृष्ण है। यही प्रेम है। यहां मात्रा आकर्षण है। अपार्थिक सतत चेतन्य का नृत्य है। जो चिरंतन हो रहा है। इस नृत्य में, इस रास में शरीक होना हो तो हर गोपिका का धर्म है, उसकी जीवेच्छा है। हर बूंद जो सहसा उछली है, और मटमैली हो गई, वह अपना मटमैलापन दूर करके उज्जवल हो पाए, तभी तो सागर में विलीन हो पाती है। पर बूंद कहीं सागर से अलग है। वह तो उसकी अपनी ही है, उसके साथ भी है और अलग भी है। ससाथ तो पहले भी थी, पर पहचान नहीं थी। आज पहचान जो मिल गई है। पहचान होते ही गुण धर्म गया। स्वभाव बन गया। वह अब गोपिका हो गई। और चिरंतन रास में शरीक हो गई। यह महारास चिरंतन है। और इसकी प्राप्ति है, मात्रा प्रेम जिसकी न तो कोई परिभाषा है, न कोई पहचान है।
साधना के नाम पर अतिरिक्त कुछ नहीं करना है, मात्रा वर्तमान में रहना है। जिस भी कार्य में हो, वहां पूरी समग्रता में रहो। मन को वहीं रखो किंचित मात्रा भी विपरीत मत जाने दो।
जब कार्य सम्मुख नहीं हो तब अवलोकन की सहायता से विचारों की श्रंखला को कम करो। यहीं साधन सामग्री सतर्कता है। जो अन्त में सजगता में ढल जाती है। जो जीवन प्राप्त हुआ है वह बहुमूल्य है। उसे पूरी समग्रता में जीना है। सम्पूर्णता में जीना है। यही सुख का रहस्य है। सुख की अवहेलना में समाज जी नहीं सकता है। स्थायी सुख ही शान्ति का भाव है। वर्तमान में रहने से लाभ यह होता है कि व्यक्ति को वह संतुलन प्राप्त हो जाता है कि वह सुख भी पाता है और शांति भी पाता है। और शांति का भोक्ता जो मन है, वह अगर अहर्निश इसी स्थिति में रहने लग जाता है तब वह क्रमशः निष्क्रिय होता हुआ अन्तर्मन में विलीन होने लग जाता है।
यही रास है। वृन्दावन, अंतःकरण है। जहां यह लीला नित्य हो रही है। ”गो” इन्द्रियां हैं। जहां देह वेणुगीत से संयुक्त है। देह जब वांसुरी बन जाती है। जब पराश्रय चला जाता है तब चीर हरण हो जाता है। तब आता है, निराश्रय, फिर स्वाश्रय आता है। और उसी भाव भूमि मंे आत्मकृपा आती है। आत्मकृपा ही रसेश्वरी है। जब दूसरा जो था, वह अप्रासंगिक हो गया, अर्थहीन हो गया, गोपिका जो थ्ज्ञी, वह नृत्योम्मुख हो गई। पूर्णिमा की यह रात है, चारों और सुगंध है, वेणुगीत अंतःकरण मानों उलोच रहा है, एक ऐसा खालीपन जो पहले कभी जाना नहीं था-जो था, वह बाहर आ रहा है, आंखें, आंसुओं से भरी है-पर अब व्यथा नहीं है। दुख भी सहन नहीं हो पा रहा है। भीतर का जब कवंल खिलता है, तब मन गुजार करता हुआ भ्रमर बन जाता है। मानो सारा रस आज ही पी जाएगा। डूबते हुए सूरज को देखा है। कभी कभी आसमान इतना सुनहरी हो जाता है कि मानों रंग बिखर गये हों। यही तो धमाल है। रंग बिखर गए हैं। अंतस भीगा भीगा सा है। उस अंतःकरण में ही आत्मकृपा उपजती है और तब जो शेष रह जाता है, वह आनंद ही है। आनंद की अभिव्यक्ति ही प्रेम है। यहां प्रेम ही साधना है, प्रेम ही साध्य है।
और प्रेम ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। यही भारतीय चिंतना की बड़ी देन है। पश्चिमी आंख पदार्थ, जन्य ज्ञान को देखती है। उसका आग्रह भौतिकता में हैं। संपत्ति के अधिक से अधिक संग्रह में हैं। विकासशील देश, विकासशील समाज वही है, जहां अधिक से अधिक धन हैं। संपत्ति ही विकास का मानक है। परन्तु इसके विपरीत भारत की आंख, भारत की दृष्टि इसके विपरीत है।
जो त्याग में ही, भारतीयता देखते हैं, वह भी अधूरापन है। यहां तो ”त्येन त्यक्तेन भुंजी था” लक्ष्य रहा यहां मार्ग सामर्थ्य के सदुपयोग का रहा। यह सदुपयोग ही है जो दुरूपयोग को रोक देता है। तब जो जगत है, न तो उसके प्रति लोभ व भोग रहता है, नही उससे पलायन रहता है, वरन् उसके प्रति कर्तव्य बोध जग जाता है। यह कर्तव्य भूमि है, यहां, कुछ भी छोड़ना नहीं है, जिसे छूटना होगा वह स्वयं छूटता जाता है, होना तो यही है, मात्रा वर्तमान में रहने का अधिक से अधिक अभ्यास होना है। जो जीवन प्राप्त हुआ है वह बहुमूल्य है। उसे पूरी समग्रता से जीना है। संपूर्णता में लेना है। यही सहज मार्ग है।
धर्म मनुष्य को उसकी पहचान सौंपता है। उसका नया जन्म होता है। यही द्विज की भूमिका है। अब नया जन्म अन्तर्मुखता की दहलीज पर होता है। जहां पर कृपा छूट जाती है। पराश्रय चला जाता है। वर्तमान रहने का प्रारम्भ यही होता है। अब मन का भूत और भविष्य से संचरण कम होता जाता है अवधारणाएं रहती तो है पर अब उनसे प्रभावित होने की क्षमता कम होती चली जाती है।
आज धार्मिक जगत अवधारणाओं के दासत्व में सोया हुआ है। धार्मिक जन व सामान्य जन में कोई अन्तर नहीं रहा है वे नन्हें शिशुओं की तरह अपने गुड्डे व गुड़ियों को ही श्रेष्ठ मानकर मात्रा बहस ही नहीं करते, वरन् मनुष्य जाति का ही संहार कर रहे हैं। धर्म का यह स्वरूप नहीं है।
पथ आज इतना कठिन नहीं है, जितना सौ वर्ष पूर्व था,स्वामी विेवेकानंदजी ने जो भारत का भविष्य देखा था उस सपने,को हमें पूरा करना है- आपने कहा था-
”मुझसे कहा गया है,अतीत की ओर नजर डालने से सिुर्फ मन की अवनति होती हे और इससे कोई फल नहीं होता, अतः हमें भविष्य की ओर दृष्टि रखनी चाएि। यह सच है। परन्तु अतीत से ही भविष्य का निर्माण होता हें अतः जहॉं तक हो सके, अतीत की ओर देखो पीछे जो चिरन्तन निझंर बह रहा हे।, आकंठ उसका जल पीयो और उसके बाद सामने देखो और भारत को उज्जवलतर , महत्तर और पहले से भी और ऊॅंचा उठाओ।”
$$$$$$$- हमारे पास एकमात्र सम्मिलन भूमि है, हमारी पवित्र परम्परा, हमारा धर्म। एकमात्र सामान्य आधार वही है, और उसी पर हमें संगठन करना होगां। यूरोप में राजन्ैतिक विचार ही राष्ट्रीय एकता का कारण है ,।किन्तु एशिया में राष्ट्रीय एक्य का आधार धर्म ही है। अतः भारत के भविष्य संगठन की पहली शर्त के तौर पर उसी धार्मिक एकता की ही आवश्यकता हेै। देश भर में एक ही धर्म सबको स्वीकारना होगा। एक ही धर्म से मेरा क्या मतलब है? यह उस तरह का एक ही धर्म नहीं ,जिसका , ईसाइयों, मुसलमानो, बौद्धो में प्रचार हेै। हम जानते हैं कि हमारे विभिन्न संप्रदायों के सिद्धांत तथा दावे चाहे कितने ही विभन्न क्यों न , हमारे धर्म के कुछ सिऋयंत ऐसे हें, जो सभी संप्रदायों द्वारा मान्य हैं।$$$$$$और अपने धर्म के ये जीवनप्रद सामान्य तत्व हम सबके सामने लायें,और देश के सभी स्त्री -पुरुष, बाल वृद्ध उन्हें जाने समझें, तथा जीवन में उतारें,- यही हमारे लिए आवश्यक है। सर्वप्रथम यही हमारा कार्य है।ं,“भाग5 पृ181
स्वामीजी के इस चिन्तन का निष्कर्ष आज भी हमारे लिए मार्ग दर्शक है-
”भारत में जाति ,भाषा, समाज संबंधी सारी बाधॉं धम््र की इस एकीकरण की शक्ति के ससामने उड़ जाती हें।। हम जानते हैं कि भारतीय मन के लिए धार्मिक आदर्श से बड़ा और कुछ भी नहीं है । धर्म ही भारतीय जीवनका मूल मंत्र है। पृ 181 भाग 5
साम्प्रदायिकता ही आज धार्मिकता हो गई है। और वह दिन पर दिन बदसूरत होती जा रही है।
हम जिस रास्ते पर चलते हैं, वही लक्ष्य हमें प्राप्त होता है। यह एक प्राकृतिक नियम है। अगर सैंकड़ों सालों की गुलामी के बाद स्वाधीन भारत के मनुष्य की सुख शांति उपलब्ध नहीं है। उसका सामाजिक जीवन और बदतर हो गया है तो उसे इसका कारण अपने भी ही तलाश करना होगा।
वे निरर्थक मूल्य, वे विचारधाराएं जिनका अनुकरण आज मात्रा दोहराव होकर रह गया है। जो हमारे जीवन में कोई रूपान्तरण नहीं ला सकती है, जो उसे उसकी निजता से जोड़ने में असफल रही है, उन्हें छोड़ना ही श्रेयस्कर है।
बुधवार, 13 जनवरी 2016
गजेन्द्र सिंह सोलंकी और उनका साहित्यिक अवदान
गजेन्द्र सिंह सोलंकी और उनका साहित्यिक अवदान
डस दिन अचानक लाड़पुरा जाने का अवसर मिल गया था। भारतेन्दु समिति के भवन को देखकर न जाने क्यों पुरानी समिति का भवन याद आगया। तब समिति का कार्यालय एक कमरे में ही था, बाहर दुकाने थीं। बाहर की तरफ एक गली में सोलंकी जी का अपना एकात्म प्रेस भी था। वे वहॉं से एकात्म साप्ताहिक निकाला करते थे। वे ही संपादक और प्रकाशक थे। पीछ के ही मौहल्ले में वे किराए के मकान में रहते थे। तब वे और भारतेन्दु समिति मानो एक ही थे। वे भारतीय जनसंघ के स्थापना सदस्यों में एक थे। पहला लोकसभा का चुनाव भी उन्होंने लड़ा था। राजा गंगासिंह जो कहानीकार थे, ं नयापुरा में उनका व्यवसाय था, सोलंकीजी वहॉं व्यवस्थापकीय कार्य भी देखते थे।
पर उनकी पहचान पत्रकार और कवि के रूप में थी। वे साहित्य प्रेमी थे। साहित्य की हर गाष्ेठी में उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। उनकी पहचान यही थी कि वे सहृदय साहित्यकार थे, जो कर्म से पूरी तरह समाजवादी थे, कर्मकांड से दूर धार्मिक व्यक्तित्व के धनी थे। वे आजीवन न्याय और मूल्यों के पथ पर चले। वे सांस्कृतिक राष्टवाद के अनन्यतम प्रचारक थे।
वे जितने सहज भाव से साहित्य परिषद के कवियों से मिलते थे, उतने ही सहज भाव से मार्क्सवादी कवियों से मिलते थे। किसी के प्रति द्वेष उनके भीतर नहीं था। ब्रज भाषा पर उनका अधिकार था। हिन्दी साहित्य अकादमी के साथ ब्रज भाषा अकादमी के भी कार्यक्रम वे कराते थे। वे अपने कर्म और अभिरुचि में हाड़ौती के बाबा नागार्जुन ही थे। उनके मित्र उन्हें बाबा ही कहते थे। जीवन के उत्तरार्ध में भी वे सृजनकर्म से जुड़े रहे। वृद्धावस्था में उन्हें लकवा लग गया था, उनके ं पुत्रों ने बहुत सेवा की, उनके महाप्रयाण के पूर्व में और शिवराज श्रीवास्तव उनसे मिलने उनके घर गए थे। । वे लेटे हुए थे, पुत्र ने उनके कान में सूचना दी। उनकी चेतना लौटी। उन्हें बैठाया गया। वे सचेत हुए , बोले , इन्हें चाय पिलाओ, नाश्ता कराओ, फिर उत्साह से अपने छंद भी सुनाए।
एक कवि की विरासत , उसकी पूंजी जो उसके जीवन की सहयात्री होती है, वह कविता ही है, तब जाना था।
आज जब हर छोटे - बड़े कवि के सम्मान समारोह की अनुगूॅंज सुनाई देने लगी है, तब सोलंकी जी की यादें उभरने लगती है, जिन्होंने देना ही सीखा था , लेना नहीं, मुझे याद नहीं उनके मित्रों ने कभी उन्हें किसी मंच पर सम्मानित होते हुए कभी देखा हो। वे स्वयं दूसरों को सम्मानित करते हुए प्रसन्न रहते थे।
यही कारण रहा कि जब वे अस्वस्थ थे, तब साहित्य अकादमी के तत्कालीन अघ्यक्ष जब कोटा आए थे, उनसे सोलंकी जी से मिलने का कार्यक्रम बनवाया था, पर वह रह गया। न तो, उनकी साहित्य परिषद ने, न, उनकी मेहनत पर खड़ी भारतेन्दु समिति ने उनकी स्मृति में कोई कार्यक्रम किया। उन्होंने गद्य और कविता में बहुत लिखा, जीवन के अंतकाल में वे एक उपन्यास लिख रहे थे। साहित्य अकादमी की ओर से उनके ऊपर एक मोनोग्राफ अवश्य निकला था। पर अभी उनकी रचनाधर्मिता का मूल्यांकन अपेक्षित है।
आज जब साहित्य की दुनिया में सहिष्णुता की चर्चा मुखर हैं, तब सोलंकी जी की स्मृति का आना स्वाभाविक है, उन्होंने अपने जीवन में किसी के प्रति कभी दृर्व्यवहार सोचा ही नहीं। सन सत्तर के आसपास का समय था, नफीस आफरीदी की कहानियॅंा बहुत तेजी से प्रकाशित हो रही थीं, उन्होंने नफीस की कहानियों पर चर्चा आयोजित कराई थी, वे सब जगह नफीस की चर्चा किया करते थे। महेन्द्र नेह की मार्क्सवादी कविताओं के प्रशंसक थे, जिनका आज उतनी सरलता से वाचन कठिन है। वे सही मायने में सहृदय पाठक थे, उन्होंने पूरा जीवन साहित्य की सेवा में लगा दिया था।
लगभग साठ वर्षों से भी कविता तथा साहित्यिक गतिविधियों में सक्रियता बनाए रखने वाले गजेन्द्र सिंह सोलंकी, बृज भाषा के भी सशक्त कवि रहे हैं। आप की राजनैतिक पक्षधरता स्पष्ट थी। तथा आप की रचनाओं पर उस का सीधा हस्तक्षेप है। आप संास्कृतिक राष्ट्रवादी काव्य धारा के कवि हैं। आप का कवि कर्म आप के द्वारा सम्पादित, प्रकाशित ‘एकात्म’ साप्ताहिक की रीति-नीति का पक्षधर रहा था। आप अपने ‘पक्ष’ के सुविचारित कवि रहे हैं। आप की कविताओं में रागात्मकता तथा वैचारिकता दोनों का अन्तर्सम्बन्ध है। आप परम्परागत शिल्प का मोह भी नहीं छोड़ पाते हैं तथा परम्परागत ‘अन्तर्वस्तु’ के प्रतिपादन के प्रति भी स्पष्ट हैं। यही उन की विशेषता है तथा कमज़ोरी भी।
‘गागर’ (1969 ई.), आप की पहली कृति थी, जो परम्परागत ‘दोहा’ छन्द मंे प्रकाशित हुई थी। यह आप की राष्ट्रवादी कविताओं का संग्रह है। खड़ी बोली, ब्रज तथा हाड़ौती तीनों ही भाषाओं के शब्द भण्डार से कवि ने नए-नए प्रयोग किए हैं। विषय वैविध्य है, परन्तु काव्य रूप परम्परागत ‘दोहा’ है। परम्परागत पाठकों में यह संग्रह लोकप्रिय भी हुआ है:-
”भव्य भवन के भाल पै,भासित भअहुं न चाह
नींव धरूँ जा देह की,जा सम जस कुछ नाह।
उपरोक्त छन्द में ‘गागर’ की अन्तर्वस्तु तथा काव्य रूप की पहचान सहज ही परिलक्षित है। महा कवि हरनाथ की काव्य परम्परा में आप हैं।
‘अमर सेनानी ताँत्या टोपे’ ;प्रबन्ध काव्य( 1987 ई.) मंे प्रकाश मंे आया था। राष्ट्रीयता का स्पन्दन ही आप की काव्य धारा का प्रमुख स्वर है। यह एक लम्बी उदात्त कविता है। इस के कला शिल्प में एकोन्मुखता है। चरित नायक की अस्मिता की खोज ही यहाँ प्रतिपाद्य है। कवि ने तथ्यों को अपनी जीवनानुभूतियों से एक नई गरिमा दी है। ‘ताँत्या’ मात्र एक सेनानी ही नहीं है, वह ‘आम जन’ की लड़ाई लड़ रहा है, आम आदमी है, उस का साहस, उस का शौर्य, उस की पराजय और उस की सहन करने की क्षमता, कवि की जीवनानुभूति का स्पर्श पा कर सहज सम्वेदनात्मक रूप से पाठक तक पहुँचने में समर्थ है।
कवि ने ताँत्या टोपे के माध्यम से, वर्तमान की नैराश्य भरी परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए ‘राष्ट्रीयता’ के आधार पर समस्याओं के सन्धान का पथ तलाश किया है। वर्तमान में व्याप्त कटुता, निराशा और दैन्य से उत्पन्न जो तमस है, कवि का सृजनशील मन उस के प्रति सजग है। वह प्रश्नों के उत्तर अतीत में तलाशता है और फिर अतीत की मनोहारी कल्पनाओं में आप का कवि मन डूबता है, फिर भी समाधान न पा कर वर्तमान को झकझोरता है। एकान्विति ही इस का आधार है। वृत्तों का यह परस्पर संगुफन तथा समग्रता में एक बिन्दु पर आ कर उन का बिखराव, आप के काव्य-शिल्प की पहचान है:-
”त्याग और बलिदान आज कुंठित हो रहे
स्मरण मात्र से रोमांचित हो जाता है कण-कण
अर्थ बदल डाले सारे जीवन-मूल्यों के
बिकाऊ लोग पाएंगे, तेरी रज का कण?
यह बिन्दु उत्सर्ग भावना है। राष्ट्र ही सर्वोपरि है। यही एक मात्र मूल्य है।
कवि मन वर्तमान की परिस्थितियों से आहत है, वह ताँत्या टोपे के माध्यम से जीवन की उदात्तता का स्पर्श करना चाहता है। कवि मन जीवन और जगत की परिस्थितियों से अपनी कर्मठता के साथ संघर्ष चाहता है। आप की राजनैतिक पक्षधरता कहीं-कहीं ‘अन्तर्वस्तु’ का अतिक्रमण भी कर जाती है। प्रतिबद्ध रचनाकर्मी की विवशता यहाँ स्वाभाविक हैै। कवि ने यहाँ शिल्प में परम्परागत ढाँचे का अतिक्रमण किया है, अन्तर्वस्तु की बनावट और बुनावट के अनुरूप भाषा ने काव्य रूप तलाश किया है:-
”बाह्य जगत हेय बता
कि होता भी और क्या
एक अजब सी आस्था
नहीं तथ्यों से वास्ता
विश्व बंधुत्व भावना
कि जग हित की कामना
क्लीवता में ढल गई
कि पोर-पोर धुल गई।
‘ताँत्या टोपे’ मात्र एक प्रतीक है, उस साधारण भारतीय जन का, जिस के भीतर विराट असाधारणता है। जहाँ कहीं चुनौती आती है, वह उस के प्राणों की अकुलाहट को मूर्तता देती हुई तेजस्विता बन जाती है और व्यक्तित्व की तेजस्विता तथा समाज की वह दुर्बलता, जो इस अग्नि को अग्नि कुण्ड में धधकने से रोक देती है। यह विरोधाभास, जो इस देश की सब से बड़ी नियति है, समग्रता के साथ इस ड्डति में चित्रित है।
राष्ट्रीयता की खोज ही इस काव्य का मुख्य स्वर है। कवि मन अतीत में झाँकता हुआ, सभी मध्य युगीन प्रतिमानों को पड़ताल करता है। संस्कृति के सभी प्रतिमानों को वह परखता है। वह क्यों? यह क्यों? इतना ज्ञान, इतना कौशल, व्यक्ति रूप में इतनी तेजस्विता तथा समूह रूप में एक न होने की विवशता, यह सब क्यों? यही तलाश इस काव्य-कथा का केन्द्र-बिन्दु है।
‘रण रागिनी’ में गजेन्द्र सिंह सोलंकी की स्वतन्त्रता पूर्व की कविताऐं संकलित हैं। आप का यह काव्य-संकलन ‘रण-रागिनी’ अपने शीर्षक से ही कविकी दृष्टि और अभिरुचि का संकेत कर देता है। और अधिक स्पष्ट होते हुए उन्हों ने इसे राष्ट्रीय-चेतना का काव्य-संकलन घोषित भी कर दिया है। आप लगभग साठ वर्षों से निरन्तर सृजनशील रहे हैं-
”है नहीं वह रागिनी जो तप्त हृदय को गुदगुदा दे
या हृदय ही है नहीं जो रागमय कुछ गीत गा दे।
‘आज तुमको क्या सुना दूं’, पृ. 23.
‘छन्दसि-त्रिविधा’ (2005 ई.), गजेन्द्र सिंह सोलंकी का चौथा काव्य संकलन, नाम के अनुरूप विधि छन्दमयी रचनाओं का स्वतन्त्र संकलन है। कवित्त, मनहरण, धनाक्षरी, सवैया, कुण्डलिया आदि छन्दों का यहाँ निर्वाह हुआ है। राष्ट्रीय मनोभाव कवि सोलंकी की काव्य चेतना की प्रमुख विषय वस्तु है। ‘बृज माधुरी’ इस संकलन में पृथक खण्ड है, जहाँ ब्रज भाषा में शंृगारिक कविताओं का चयन है।
‘हूक’(;2007 ई.) आप की स्वतन्त्र कविताओं का एक संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिन्हें आप 1947 ई. से निरन्तर लिखते आए हैं। यहाँ कवि का मन, जिन घटनाओं से निरन्तर, उद्वेलित होता आया है, उन का यहँं काव्य चेतना के परिप्रेक्ष्य में सुन्दर चित्रण मिलता हैः-
”ज्ञान गठरिया भारी भरकम लगता है दबे जा रहे तुम,
स्वेद छलकता पीत वर्ण हो सूख रहा सांसों का सरगम
जो लादे हो बोझा है, तुम जो साधे धोखा है
अहम् तुम्हारा जान न सकता, पर ज्ञान बजे वह थोथा है ।
यहाँ कवि के पास साठ साल से अधिक की काव्य-यात्रा से प्राप्त जीवनानुभव है। गजेन्द्र सिंह सोलंकी ‘राष्ट्रीय काव्य धारा’ के प्रतिनिधि कवि रहे हैं, वे जीवन संघर्ष से तपे-निखरे कवि हैं, जहाँ उन का कर्म व वचन दोनों ही एकमेक हैं। तभी कवि इतनी तटस्थता के साथ यह कहने का साहस भी रखता है:-
”लो विदा की घड़ी अब तो आने को है
कर्म अस्बाब अपना खुद संभाले रखो,
कि कब आ जाए बुलावा पता कुछ नहीं
वक्त अपना न पलभर को जाया करो।“.
गजेन्द्र सिंह सोलंकी की कविता का स्वर गत साठ वर्षों से निरन्तर एक ही भाव भूमि पर केन्द्रित रहा है, राष्ट्र के प्रति उन की ममत्व मयी समर्पण भावना, उन की जीवन शैली का भी अविभाज्य अंग है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उन की काव्य धारा की सुस्पष्ट वैचारिक भूमि रही है। फिर भी वे अपनी राजनैतिक दृष्टि के स्पष्ट होने के बावजूद, एक नैतिक जीवन जीते हुए, सामान्य जन व देशज भूमिका रखते हुए कविता में उस के पक्षधर रहे हैं। वास्तव में वे लोक से जुड़े हुए ज़मीनी इन्सान थे।, उन की कविता और वे सचमुच एक रूप हैं।
आपने कहानियॉं भी लिखीं थीं।
कथाकार श्री सोलंकी का यह कथा संग्रह ” अंत्येष्टि“ 2007 में प्रकाशित हुआ है।
अन्येष्टि उनकी कहानी लगभग पचास वर्ष पहले संभवतः लिखी गई थी। किसी संग्रह में आई भी थी। ‘राजन, एक बेरोजगार नवयुवक है, बेरोजगारी में वह आत्महत्या कर लेता है, वह साहित्यकार है, उसकी पत्नी नीलू को पागलखाने भेजे जाने की सूचना इसमें मिलती है। इन कहानियों का ऐतिहासिक महत्व है। तब कहानी किस प्रकार लिखी जाती थी, यह सूचना यहां से मिलती है। ‘अंधी और सफर’, बहुत छोटी सी , बड़ी कहानी है। मनुष्य भी काम पिपासा, और त्रासदी की मार्मिक कथा है, अंधी अपनी गोदी में लड़की लिए ट्रेन में चढ़ती है। तब उसकी अवस्था और मनुष्य की काम पिपासा, संतान अनेक प्रश्न आज के यथार्थ की विसंगतियों को उजागर कर जाते हैं। यह संग्रह की एक अच्छी कहानी है। श्री सोलंकी, उपदेशक नहीं हैं, उनका खोजी पत्रकार मात्र अनुत्तरित प्रश्नों को खड़ा कर जाता है। श्री सोलंकी का यह संग्रह निश्चित ही उनका मूल्यांकन कराने में समर्थ हैं। अस्सी साल की आयु में आपका यह संग्रह प्रकाशित हुआ था, कथा-परंपरा के अध्ययन में इसका मूल्य है।
तात्याटोपे की फॉंसी पर आपका इतिहास ग्रंथ भी है।ताँत्या टोपे की कथित फाँसी‘ 1994 ई. गजेन्द्र सिंह सोलंकी का इतिहासपरक शोध वृत्तान्त’ है। 1857 की क्रान्ति के अमर नायक ताँत्या टोपे को शिवपुरी में दी गई कथित फाँसी पर विश्लेषणात्मक शोध परक यह आलेख है।
अभी तक दी गई सूचना के आधार पर ‘पाडोन’ के ठिकानेदार मान सिंह के सहयोग से अंग्रेज़ों ने शिवपुरी के जंगलों में ताँत्या को पकड़ा था, तथा 18 अपै्रल 1859 को फाँसी दी गई थी। गजेन्द्र सिंह सोलंकी ने, इस सन्दर्भ में अपने शोध पूर्ण आलेख में इस सत्य को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, उस दिन तात्या के स्थान पर श्री नारायण राव भागवत को फाँसी दी गई थी। ताँत्या टोपे, तथा गोविन्द राव भागवत बच कर निकल गए थे।
”गजेन्द्र सिंह सोलंकी ने, वीर सावरकर के ‘1857 का भारतीय स्वातन्त्र्य समर’, सुरेन्द्र नाथ सेन तथा डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार के इतिहास ग्रन्थ, श्रीनिवास बालाजी हर्डीकर द्वारा सम्पादित ‘अठारह सौ सत्तावनः नया समाज’ के ‘सन सत्तावन शताब्दी अंक’, ‘दी अदर साइड ऑफ़ दी मेडिल ;थाम्सन, डॉ. एस. एम. सिन्हा के शोध प्रबन्ध ‘दी रिवोल्हट ऑफ़ 1857 इन बुन्देल खण्ड’, ‘ताँत्या टोपे का बस्ता, उस में मिले पत्र आदि का विश्लेषण करते हुए हर तथ्य की जाँच, पड़ताल सूक्ष्मता से करते हुए यह स्थापित किया है कि उन की मृत्यु स्वाभाविक रूप से 1909 में हुई थी।“
लगभग पैंतीस वर्षों की कठिन साधना से गजेन्द्र सिंह सोलंकी ने इस आलेख को पूरा किया था। भारतीय इतिहास विज्ञ की सब से बड़ी परेशानी आज यही है कि इतिहास लेखन की स्वतन्त्र स्थिति अब तक नहीं आई है। पश्चिमी इतिहास दृष्टि से, भारतीय इतिहास दर्शन, पूर्णतः प्रभावित है। इतिहास घटनाओं का प्रमाणिकता के आधार पर विश्लेषणात्मक विवेचन माँगता है, जो पूर्णतः वस्तुगत होता है, यहाँ भावनाओं और आदर्शों का स्थान नहीं होता। गजेन्द्र सिंह सोलंकी की यह कृति, इतिहासकारों से, वस्तुगत मूल्यांकन की अपेक्षा रखती है। उन की यह कृति महत्त्व पूर्ण है।
उनके एकात्म के संपादकीयों का संग्रह भी ऐतिहासिक दस्तावेज है। राजस्थान साहित्य अकादमी ने आपके कृतित्व पर मोनोग्राफ प्रकाशित किया था, यह उल्लेखनीय है।, आज वे हमारे साथ नहीं हैं, पर उनकी स्मृति हमारे समीप ही है, उनके मित्र उन्हें स्मरण रखेंग,े इसी कामना के साथ।
डस दिन अचानक लाड़पुरा जाने का अवसर मिल गया था। भारतेन्दु समिति के भवन को देखकर न जाने क्यों पुरानी समिति का भवन याद आगया। तब समिति का कार्यालय एक कमरे में ही था, बाहर दुकाने थीं। बाहर की तरफ एक गली में सोलंकी जी का अपना एकात्म प्रेस भी था। वे वहॉं से एकात्म साप्ताहिक निकाला करते थे। वे ही संपादक और प्रकाशक थे। पीछ के ही मौहल्ले में वे किराए के मकान में रहते थे। तब वे और भारतेन्दु समिति मानो एक ही थे। वे भारतीय जनसंघ के स्थापना सदस्यों में एक थे। पहला लोकसभा का चुनाव भी उन्होंने लड़ा था। राजा गंगासिंह जो कहानीकार थे, ं नयापुरा में उनका व्यवसाय था, सोलंकीजी वहॉं व्यवस्थापकीय कार्य भी देखते थे।
पर उनकी पहचान पत्रकार और कवि के रूप में थी। वे साहित्य प्रेमी थे। साहित्य की हर गाष्ेठी में उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। उनकी पहचान यही थी कि वे सहृदय साहित्यकार थे, जो कर्म से पूरी तरह समाजवादी थे, कर्मकांड से दूर धार्मिक व्यक्तित्व के धनी थे। वे आजीवन न्याय और मूल्यों के पथ पर चले। वे सांस्कृतिक राष्टवाद के अनन्यतम प्रचारक थे।
वे जितने सहज भाव से साहित्य परिषद के कवियों से मिलते थे, उतने ही सहज भाव से मार्क्सवादी कवियों से मिलते थे। किसी के प्रति द्वेष उनके भीतर नहीं था। ब्रज भाषा पर उनका अधिकार था। हिन्दी साहित्य अकादमी के साथ ब्रज भाषा अकादमी के भी कार्यक्रम वे कराते थे। वे अपने कर्म और अभिरुचि में हाड़ौती के बाबा नागार्जुन ही थे। उनके मित्र उन्हें बाबा ही कहते थे। जीवन के उत्तरार्ध में भी वे सृजनकर्म से जुड़े रहे। वृद्धावस्था में उन्हें लकवा लग गया था, उनके ं पुत्रों ने बहुत सेवा की, उनके महाप्रयाण के पूर्व में और शिवराज श्रीवास्तव उनसे मिलने उनके घर गए थे। । वे लेटे हुए थे, पुत्र ने उनके कान में सूचना दी। उनकी चेतना लौटी। उन्हें बैठाया गया। वे सचेत हुए , बोले , इन्हें चाय पिलाओ, नाश्ता कराओ, फिर उत्साह से अपने छंद भी सुनाए।
एक कवि की विरासत , उसकी पूंजी जो उसके जीवन की सहयात्री होती है, वह कविता ही है, तब जाना था।
आज जब हर छोटे - बड़े कवि के सम्मान समारोह की अनुगूॅंज सुनाई देने लगी है, तब सोलंकी जी की यादें उभरने लगती है, जिन्होंने देना ही सीखा था , लेना नहीं, मुझे याद नहीं उनके मित्रों ने कभी उन्हें किसी मंच पर सम्मानित होते हुए कभी देखा हो। वे स्वयं दूसरों को सम्मानित करते हुए प्रसन्न रहते थे।
यही कारण रहा कि जब वे अस्वस्थ थे, तब साहित्य अकादमी के तत्कालीन अघ्यक्ष जब कोटा आए थे, उनसे सोलंकी जी से मिलने का कार्यक्रम बनवाया था, पर वह रह गया। न तो, उनकी साहित्य परिषद ने, न, उनकी मेहनत पर खड़ी भारतेन्दु समिति ने उनकी स्मृति में कोई कार्यक्रम किया। उन्होंने गद्य और कविता में बहुत लिखा, जीवन के अंतकाल में वे एक उपन्यास लिख रहे थे। साहित्य अकादमी की ओर से उनके ऊपर एक मोनोग्राफ अवश्य निकला था। पर अभी उनकी रचनाधर्मिता का मूल्यांकन अपेक्षित है।
आज जब साहित्य की दुनिया में सहिष्णुता की चर्चा मुखर हैं, तब सोलंकी जी की स्मृति का आना स्वाभाविक है, उन्होंने अपने जीवन में किसी के प्रति कभी दृर्व्यवहार सोचा ही नहीं। सन सत्तर के आसपास का समय था, नफीस आफरीदी की कहानियॅंा बहुत तेजी से प्रकाशित हो रही थीं, उन्होंने नफीस की कहानियों पर चर्चा आयोजित कराई थी, वे सब जगह नफीस की चर्चा किया करते थे। महेन्द्र नेह की मार्क्सवादी कविताओं के प्रशंसक थे, जिनका आज उतनी सरलता से वाचन कठिन है। वे सही मायने में सहृदय पाठक थे, उन्होंने पूरा जीवन साहित्य की सेवा में लगा दिया था।
लगभग साठ वर्षों से भी कविता तथा साहित्यिक गतिविधियों में सक्रियता बनाए रखने वाले गजेन्द्र सिंह सोलंकी, बृज भाषा के भी सशक्त कवि रहे हैं। आप की राजनैतिक पक्षधरता स्पष्ट थी। तथा आप की रचनाओं पर उस का सीधा हस्तक्षेप है। आप संास्कृतिक राष्ट्रवादी काव्य धारा के कवि हैं। आप का कवि कर्म आप के द्वारा सम्पादित, प्रकाशित ‘एकात्म’ साप्ताहिक की रीति-नीति का पक्षधर रहा था। आप अपने ‘पक्ष’ के सुविचारित कवि रहे हैं। आप की कविताओं में रागात्मकता तथा वैचारिकता दोनों का अन्तर्सम्बन्ध है। आप परम्परागत शिल्प का मोह भी नहीं छोड़ पाते हैं तथा परम्परागत ‘अन्तर्वस्तु’ के प्रतिपादन के प्रति भी स्पष्ट हैं। यही उन की विशेषता है तथा कमज़ोरी भी।
‘गागर’ (1969 ई.), आप की पहली कृति थी, जो परम्परागत ‘दोहा’ छन्द मंे प्रकाशित हुई थी। यह आप की राष्ट्रवादी कविताओं का संग्रह है। खड़ी बोली, ब्रज तथा हाड़ौती तीनों ही भाषाओं के शब्द भण्डार से कवि ने नए-नए प्रयोग किए हैं। विषय वैविध्य है, परन्तु काव्य रूप परम्परागत ‘दोहा’ है। परम्परागत पाठकों में यह संग्रह लोकप्रिय भी हुआ है:-
”भव्य भवन के भाल पै,भासित भअहुं न चाह
नींव धरूँ जा देह की,जा सम जस कुछ नाह।
उपरोक्त छन्द में ‘गागर’ की अन्तर्वस्तु तथा काव्य रूप की पहचान सहज ही परिलक्षित है। महा कवि हरनाथ की काव्य परम्परा में आप हैं।
‘अमर सेनानी ताँत्या टोपे’ ;प्रबन्ध काव्य( 1987 ई.) मंे प्रकाश मंे आया था। राष्ट्रीयता का स्पन्दन ही आप की काव्य धारा का प्रमुख स्वर है। यह एक लम्बी उदात्त कविता है। इस के कला शिल्प में एकोन्मुखता है। चरित नायक की अस्मिता की खोज ही यहाँ प्रतिपाद्य है। कवि ने तथ्यों को अपनी जीवनानुभूतियों से एक नई गरिमा दी है। ‘ताँत्या’ मात्र एक सेनानी ही नहीं है, वह ‘आम जन’ की लड़ाई लड़ रहा है, आम आदमी है, उस का साहस, उस का शौर्य, उस की पराजय और उस की सहन करने की क्षमता, कवि की जीवनानुभूति का स्पर्श पा कर सहज सम्वेदनात्मक रूप से पाठक तक पहुँचने में समर्थ है।
कवि ने ताँत्या टोपे के माध्यम से, वर्तमान की नैराश्य भरी परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए ‘राष्ट्रीयता’ के आधार पर समस्याओं के सन्धान का पथ तलाश किया है। वर्तमान में व्याप्त कटुता, निराशा और दैन्य से उत्पन्न जो तमस है, कवि का सृजनशील मन उस के प्रति सजग है। वह प्रश्नों के उत्तर अतीत में तलाशता है और फिर अतीत की मनोहारी कल्पनाओं में आप का कवि मन डूबता है, फिर भी समाधान न पा कर वर्तमान को झकझोरता है। एकान्विति ही इस का आधार है। वृत्तों का यह परस्पर संगुफन तथा समग्रता में एक बिन्दु पर आ कर उन का बिखराव, आप के काव्य-शिल्प की पहचान है:-
”त्याग और बलिदान आज कुंठित हो रहे
स्मरण मात्र से रोमांचित हो जाता है कण-कण
अर्थ बदल डाले सारे जीवन-मूल्यों के
बिकाऊ लोग पाएंगे, तेरी रज का कण?
यह बिन्दु उत्सर्ग भावना है। राष्ट्र ही सर्वोपरि है। यही एक मात्र मूल्य है।
कवि मन वर्तमान की परिस्थितियों से आहत है, वह ताँत्या टोपे के माध्यम से जीवन की उदात्तता का स्पर्श करना चाहता है। कवि मन जीवन और जगत की परिस्थितियों से अपनी कर्मठता के साथ संघर्ष चाहता है। आप की राजनैतिक पक्षधरता कहीं-कहीं ‘अन्तर्वस्तु’ का अतिक्रमण भी कर जाती है। प्रतिबद्ध रचनाकर्मी की विवशता यहाँ स्वाभाविक हैै। कवि ने यहाँ शिल्प में परम्परागत ढाँचे का अतिक्रमण किया है, अन्तर्वस्तु की बनावट और बुनावट के अनुरूप भाषा ने काव्य रूप तलाश किया है:-
”बाह्य जगत हेय बता
कि होता भी और क्या
एक अजब सी आस्था
नहीं तथ्यों से वास्ता
विश्व बंधुत्व भावना
कि जग हित की कामना
क्लीवता में ढल गई
कि पोर-पोर धुल गई।
‘ताँत्या टोपे’ मात्र एक प्रतीक है, उस साधारण भारतीय जन का, जिस के भीतर विराट असाधारणता है। जहाँ कहीं चुनौती आती है, वह उस के प्राणों की अकुलाहट को मूर्तता देती हुई तेजस्विता बन जाती है और व्यक्तित्व की तेजस्विता तथा समाज की वह दुर्बलता, जो इस अग्नि को अग्नि कुण्ड में धधकने से रोक देती है। यह विरोधाभास, जो इस देश की सब से बड़ी नियति है, समग्रता के साथ इस ड्डति में चित्रित है।
राष्ट्रीयता की खोज ही इस काव्य का मुख्य स्वर है। कवि मन अतीत में झाँकता हुआ, सभी मध्य युगीन प्रतिमानों को पड़ताल करता है। संस्कृति के सभी प्रतिमानों को वह परखता है। वह क्यों? यह क्यों? इतना ज्ञान, इतना कौशल, व्यक्ति रूप में इतनी तेजस्विता तथा समूह रूप में एक न होने की विवशता, यह सब क्यों? यही तलाश इस काव्य-कथा का केन्द्र-बिन्दु है।
‘रण रागिनी’ में गजेन्द्र सिंह सोलंकी की स्वतन्त्रता पूर्व की कविताऐं संकलित हैं। आप का यह काव्य-संकलन ‘रण-रागिनी’ अपने शीर्षक से ही कविकी दृष्टि और अभिरुचि का संकेत कर देता है। और अधिक स्पष्ट होते हुए उन्हों ने इसे राष्ट्रीय-चेतना का काव्य-संकलन घोषित भी कर दिया है। आप लगभग साठ वर्षों से निरन्तर सृजनशील रहे हैं-
”है नहीं वह रागिनी जो तप्त हृदय को गुदगुदा दे
या हृदय ही है नहीं जो रागमय कुछ गीत गा दे।
‘आज तुमको क्या सुना दूं’, पृ. 23.
‘छन्दसि-त्रिविधा’ (2005 ई.), गजेन्द्र सिंह सोलंकी का चौथा काव्य संकलन, नाम के अनुरूप विधि छन्दमयी रचनाओं का स्वतन्त्र संकलन है। कवित्त, मनहरण, धनाक्षरी, सवैया, कुण्डलिया आदि छन्दों का यहाँ निर्वाह हुआ है। राष्ट्रीय मनोभाव कवि सोलंकी की काव्य चेतना की प्रमुख विषय वस्तु है। ‘बृज माधुरी’ इस संकलन में पृथक खण्ड है, जहाँ ब्रज भाषा में शंृगारिक कविताओं का चयन है।
‘हूक’(;2007 ई.) आप की स्वतन्त्र कविताओं का एक संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिन्हें आप 1947 ई. से निरन्तर लिखते आए हैं। यहाँ कवि का मन, जिन घटनाओं से निरन्तर, उद्वेलित होता आया है, उन का यहँं काव्य चेतना के परिप्रेक्ष्य में सुन्दर चित्रण मिलता हैः-
”ज्ञान गठरिया भारी भरकम लगता है दबे जा रहे तुम,
स्वेद छलकता पीत वर्ण हो सूख रहा सांसों का सरगम
जो लादे हो बोझा है, तुम जो साधे धोखा है
अहम् तुम्हारा जान न सकता, पर ज्ञान बजे वह थोथा है ।
यहाँ कवि के पास साठ साल से अधिक की काव्य-यात्रा से प्राप्त जीवनानुभव है। गजेन्द्र सिंह सोलंकी ‘राष्ट्रीय काव्य धारा’ के प्रतिनिधि कवि रहे हैं, वे जीवन संघर्ष से तपे-निखरे कवि हैं, जहाँ उन का कर्म व वचन दोनों ही एकमेक हैं। तभी कवि इतनी तटस्थता के साथ यह कहने का साहस भी रखता है:-
”लो विदा की घड़ी अब तो आने को है
कर्म अस्बाब अपना खुद संभाले रखो,
कि कब आ जाए बुलावा पता कुछ नहीं
वक्त अपना न पलभर को जाया करो।“.
गजेन्द्र सिंह सोलंकी की कविता का स्वर गत साठ वर्षों से निरन्तर एक ही भाव भूमि पर केन्द्रित रहा है, राष्ट्र के प्रति उन की ममत्व मयी समर्पण भावना, उन की जीवन शैली का भी अविभाज्य अंग है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उन की काव्य धारा की सुस्पष्ट वैचारिक भूमि रही है। फिर भी वे अपनी राजनैतिक दृष्टि के स्पष्ट होने के बावजूद, एक नैतिक जीवन जीते हुए, सामान्य जन व देशज भूमिका रखते हुए कविता में उस के पक्षधर रहे हैं। वास्तव में वे लोक से जुड़े हुए ज़मीनी इन्सान थे।, उन की कविता और वे सचमुच एक रूप हैं।
आपने कहानियॉं भी लिखीं थीं।
कथाकार श्री सोलंकी का यह कथा संग्रह ” अंत्येष्टि“ 2007 में प्रकाशित हुआ है।
अन्येष्टि उनकी कहानी लगभग पचास वर्ष पहले संभवतः लिखी गई थी। किसी संग्रह में आई भी थी। ‘राजन, एक बेरोजगार नवयुवक है, बेरोजगारी में वह आत्महत्या कर लेता है, वह साहित्यकार है, उसकी पत्नी नीलू को पागलखाने भेजे जाने की सूचना इसमें मिलती है। इन कहानियों का ऐतिहासिक महत्व है। तब कहानी किस प्रकार लिखी जाती थी, यह सूचना यहां से मिलती है। ‘अंधी और सफर’, बहुत छोटी सी , बड़ी कहानी है। मनुष्य भी काम पिपासा, और त्रासदी की मार्मिक कथा है, अंधी अपनी गोदी में लड़की लिए ट्रेन में चढ़ती है। तब उसकी अवस्था और मनुष्य की काम पिपासा, संतान अनेक प्रश्न आज के यथार्थ की विसंगतियों को उजागर कर जाते हैं। यह संग्रह की एक अच्छी कहानी है। श्री सोलंकी, उपदेशक नहीं हैं, उनका खोजी पत्रकार मात्र अनुत्तरित प्रश्नों को खड़ा कर जाता है। श्री सोलंकी का यह संग्रह निश्चित ही उनका मूल्यांकन कराने में समर्थ हैं। अस्सी साल की आयु में आपका यह संग्रह प्रकाशित हुआ था, कथा-परंपरा के अध्ययन में इसका मूल्य है।
तात्याटोपे की फॉंसी पर आपका इतिहास ग्रंथ भी है।ताँत्या टोपे की कथित फाँसी‘ 1994 ई. गजेन्द्र सिंह सोलंकी का इतिहासपरक शोध वृत्तान्त’ है। 1857 की क्रान्ति के अमर नायक ताँत्या टोपे को शिवपुरी में दी गई कथित फाँसी पर विश्लेषणात्मक शोध परक यह आलेख है।
अभी तक दी गई सूचना के आधार पर ‘पाडोन’ के ठिकानेदार मान सिंह के सहयोग से अंग्रेज़ों ने शिवपुरी के जंगलों में ताँत्या को पकड़ा था, तथा 18 अपै्रल 1859 को फाँसी दी गई थी। गजेन्द्र सिंह सोलंकी ने, इस सन्दर्भ में अपने शोध पूर्ण आलेख में इस सत्य को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, उस दिन तात्या के स्थान पर श्री नारायण राव भागवत को फाँसी दी गई थी। ताँत्या टोपे, तथा गोविन्द राव भागवत बच कर निकल गए थे।
”गजेन्द्र सिंह सोलंकी ने, वीर सावरकर के ‘1857 का भारतीय स्वातन्त्र्य समर’, सुरेन्द्र नाथ सेन तथा डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार के इतिहास ग्रन्थ, श्रीनिवास बालाजी हर्डीकर द्वारा सम्पादित ‘अठारह सौ सत्तावनः नया समाज’ के ‘सन सत्तावन शताब्दी अंक’, ‘दी अदर साइड ऑफ़ दी मेडिल ;थाम्सन, डॉ. एस. एम. सिन्हा के शोध प्रबन्ध ‘दी रिवोल्हट ऑफ़ 1857 इन बुन्देल खण्ड’, ‘ताँत्या टोपे का बस्ता, उस में मिले पत्र आदि का विश्लेषण करते हुए हर तथ्य की जाँच, पड़ताल सूक्ष्मता से करते हुए यह स्थापित किया है कि उन की मृत्यु स्वाभाविक रूप से 1909 में हुई थी।“
लगभग पैंतीस वर्षों की कठिन साधना से गजेन्द्र सिंह सोलंकी ने इस आलेख को पूरा किया था। भारतीय इतिहास विज्ञ की सब से बड़ी परेशानी आज यही है कि इतिहास लेखन की स्वतन्त्र स्थिति अब तक नहीं आई है। पश्चिमी इतिहास दृष्टि से, भारतीय इतिहास दर्शन, पूर्णतः प्रभावित है। इतिहास घटनाओं का प्रमाणिकता के आधार पर विश्लेषणात्मक विवेचन माँगता है, जो पूर्णतः वस्तुगत होता है, यहाँ भावनाओं और आदर्शों का स्थान नहीं होता। गजेन्द्र सिंह सोलंकी की यह कृति, इतिहासकारों से, वस्तुगत मूल्यांकन की अपेक्षा रखती है। उन की यह कृति महत्त्व पूर्ण है।
उनके एकात्म के संपादकीयों का संग्रह भी ऐतिहासिक दस्तावेज है। राजस्थान साहित्य अकादमी ने आपके कृतित्व पर मोनोग्राफ प्रकाशित किया था, यह उल्लेखनीय है।, आज वे हमारे साथ नहीं हैं, पर उनकी स्मृति हमारे समीप ही है, उनके मित्र उन्हें स्मरण रखेंग,े इसी कामना के साथ।
सोमवार, 28 सितंबर 2015
भूले बिसरे चित्र डॉ.शांति भारद्वाज ”राकेश“
भूले बिसरे चित्र डॉ.शांति भारद्वाज ”राकेश“
कोटा का साहित्यिक परिदृश्य तीन भागांे में बॅंटा हुआ हें कोटा जंक्शन , पुराना कोटा तथा नया कोटा। कोटा जंक्शन पर साहित्यिक जगत एक परिवार की तरह रह रहा है। 1948 के आसपास मासिक ”कामना“ पत्रिका यहॉं से निकलती थी। राजेन्द्र सक्सैना, जगदीश वोरा संपादक मंडल में थे। इसकी एक प्रति मेरे पास थी।
बाद के वर्षोमें नगेन्द्रकुमार सक्सैना, शांति भारद्वाज , इस क्षेत्र की साहित्यिक चर्चाके केन्द्र में रहे। अभी भी , हिन्दी और बृज भाषा की गोष्ठियॉं अधिकतर जंक्शन क्षेत्र में होती रहती हैं। शांति भारद्वाज राजस्थान में अपने साहित्यिक योगदान के लिए महत्वपूर्ण रहे। आप वर्षों अकादमी की मधुमती पत्रिका के संपादक रहे। राजस्थानी अकादमी बीकानेर के अध्यक्ष रहे। आपके उपन्यास ”उड़जा रे सुआ“ पर आपको केन्द्रीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। आपने ”राग दरबारी का राजस्थानी में अनुवाद किया।
पर आज में उनकी याद एक कटु अनुभव के साथ कर रहा हूॅं। उनका परिवार हरवर्ष उनकी याद में उनकी जन्मतिथि पर साहित्यकारों को सम्मानित करता है। समारोह करता है। राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर ने उनकी स्मृति में मानोग्राफ भी निकाला हैं।
पर रचनाकार के लिए उसके जीवन काल में उसकी कृतियों का समयक मूल्यांकन अधिक महत्वपूर्ण रहता है।
वे कवि थे, उपन्यासकार थे, अनुवादक थे, पर उन सबसे बहुत आगे, वे एक सहृदय बड़े भाई थे। उनका प्रेम, इस अंचल के हर साहित्यकार पर जीवन के अंत समय तक रहा।
मित्रो, हमारे अंचल की विशेषता है, कि हम हर बड़े इन्सान की छोटी सी कमजोरी को पाकर , खुश हो जाते हैं, उसे अपनी स्मृतियों से बाहर धकेल आते हें। इस हीनता ग्रंथि ने हमें बहुत नुकसान पहुंचाया है। जीवन के उत्तरार्ध में आपका काव्य संग्रह ,”द्वार खुले हैं“ तथा उपन्यास ”एक और यात्रा (2006) प्रकाशित हुए थे। उन्होने बड़े संकोच के साथ कहा था , मित्रों ने इस पर चर्चा तक नहीं की। यह सच है कि कोटा की किसी साहित्यिक गोष्ठी में इन पुस्तकों पर चर्चा तक नहीं हुर्इ्र।
तब मैं हाड़ौती हिन्दी पद्य और गद्य की परंपरा पर कार्य कर रहा था। बीसवीं शताब्दी का यह साहित्य का इतिहास था। आप बीमार थे, पर कार्य कैसा हो रहा हे। पूरा ध्यान रखते थे।
कहीं ऐसा तो नहीं है, परपरागत मानसिकता के कारण हमारा ही कोर्इ्र मित्र , हममें थेाड़ा बड़ा होजाता है, तो वह हम लोगों की सामूहिक ईर्ष्या का शिकार बन जाता है। हिन्दी साहित्य समाज से मिली उपेक्षा से वे कालांतर में राजस्थानी में अनुवाद के क्षेत्र में चले गए।
रचनाकार एक बड़े परिवार को बनाता है, जहॉं वह सांस लेता है। उसकी प्राण वायु अपने सहृदय साहित्यकारों के सानिध्य से ही पल्लवित होती है। उनका चिन्तन , उनकी रचनाओं का आस्वादन हमें ही संस्कारित करता है,। चलिए आज उनके साथ , उनकी साहित्यिक यात्रा पर चलंे , भारद्वाजजी की कविता और कथा -यात्रा के हम सहयात्री बनें।
‘द्वार खुले हं’ै ;(1999) भारद्वाज जी की नई कविताओ का संग्रह है।
कवि ने लगभग चालीस वर्ष की अपनी काव्य यात्रा में लौटकर आया आज में द्वार पर....... इस उक्ति को अपनी ‘अनुभूत्यात्मक संवेदना ’ से व्यंजित किया है। अनजाने में भूमिका में कवि ने ... ‘यों कहें कि एक ही गन्तव्य है।’’ ‘ऑंगन के पार द्वार’, तथा ‘कितनी नावों में कितनी बार’.... के प्रतीक ‘स्वीकृति’, को रेखांकित कर दिया है।
यहां पर आकर कवि की संवेदना पारदर्शी तथा जो बूंुूद सहसा .उछली . थी, वह मटमैली न होकर.निरंतर अध्यवसाय तथा गहन काव्य साधना से परिष्कृत होती हुई उज्जवल होती चली गई है। सजगता काव्य चेतना का आधार है.... परन्तु वह अब शांत है, ‘अनुभव को शब्द देना कितना कठिन है, इसका अनुभव भी इसी यात्रा में सर्वाधिक हुआ।’
अंतर्मुखता की वापसी, शब्द को असंग व निसंग कर जाती है, वहीं जो ध्वनित होता है, वह मात्र अनुगूंज ही होती है।
‘‘ और तब
उभर आते हो तुम’
परत झड़ते ही जैसे
प्रज्वलित हो पाती है यज्ञ की अग्नि !
तुम हो और मैं हंू
कहॉं है इतना एकान्त ?
यह मन की सहजता जहां अनुभव मौन निर्वाक मै अभिव्यक्ति ढूढंता है,.... यहां शब्द पश्यंती के द्वार पर दस्तक देते है.ं.. भाषा की यह संस्कार धर्मिता विरल है, राजस्थान के अन्य कवियों में नंद किशोर आचार्य के यहां यह है।
‘‘प्रतीक्षा रत भी तो नहीं था मै-
फिर क्यों जगा दिया ऐसा उन्माद?
उठा दिया एक प्रश्न
किसकी प्रतीक्षा है मुझे ?’’
द्वार ... शब्द अनेक व्यूहों में खुलता है... हर बार एक नई भंगिमा है। यहां योग सूत्र के कोषों. का. खुलना नहीं है, बंद कुहासे से ,धूमिल चेतना का नवीन परिष्कार होने की सृचना है,’’
‘‘जागा रहता है दिया
तुम्हारे लिए
द्वार
इसीलिए तो खुले हैं ’
पृष्ठ 19
‘अब तो लौट लौटकर
वहीं फन पटकता हैं
समय का सांप।
बार बार थपेड़ा जाकर भी
बंद द्वार नही छोड़ता’
पृष्ठ 33
‘इधर मुझे खट ख्टाते हैं द्वार
अंधेरी सुरंग के
वर्जनाओं का पांव धरते हुए।
दौड़ना है।
नई पगडंडी रेखांकित करते हुए
अकेले ही ।’
साहित्यकार के जीवन की व्यथा , यही है, जब वह अंत में घर लौटता है, तो पाता हे, वह अकेला रह गया है एक जमाने की भरी हुई मुट्ठी अंत में खाली रह जाती है।
यह अकेलेपन की त्रासदी हर मन की व्यथा है। भाग्यवान रहता हैे कवि, जब साथ के संगी भी साथ छोड़ जाते हैं, रिश्तों में दूरियॅंा कम होने का नाम नहीं लेती है। तब उसकी कविता ही उस के साथ चलती है। कविता कवि का अपना संस्कार है इसीलिए कवि को शास्त्र ने ईश्वर के समीप माना है, वह बात दूसरी है, उसे उसके निजि स्वरूप की विस्मृति हो गई है।
”द्वार खुले हैं , प्रांत के महत्वपूर्ण काव्य संग्रहो में एक हें यह बात दूसरी है, हम गुटबंदी में इतने डूब गए हें कि कविता की पहचान और परख खो बैठे हैं। आज की दुनिया में हम अपने अलावा अन्य को पहचानने से भी मना करजाते हें युग ”सैल्फी“ का होगया है।
”एक और यात्रा“,(2006) भारद्वाज जी का ‘‘सूर्यास्त’’ के बाद यह दूसरा उपन्यास है। ‘यहां स्वतंत्रता पूर्व पैदा हुए ‘सूरज प्रकाश’ की कथा है, जो स्वतंत्र भारत में अपना विस्तार पाती है।
आंचलिक परिवेश है, ... ग्रामीण भारत जो ‘कस्बाई संस्कृति में विकसित हो रहा था, ... जहां ट्रेन से परिचय प्रारंभ हुआ है, ... डाकघर आया है, स्कूल खुले हैं, ... ‘समय’ को चिन्हित करते हुए उसे यथोचित परिलक्षित करने का भाव यहां केन्द्रित है। पिता आदर्शवादी है, ... वे शिक्षक हैं, ... तथा बाद में उनका सेवा कार्य ‘विजय सिंह पथिक’ की तरह बहुआयामी हो जाता है। वे पुत्र की पढ़ाई के प्रति चिंतित हैं, ... पर अपने पारिवारिक दायित्व के प्रति उदासीन भी हैं।
‘सूरज प्रकाश’ की पढ़ाई, छोटे कस्बे से, ... शहर तक आती है। वह स्कूल से कॉलेज तक की यात्रा करता है। तत्कालीन शैक्षणिक माहौल तथा समाज की सभी धाराओं का जो क्षीण गलियों से गुजरती हुई नगर के मैदान तक आती है, ... उन्हें चित्रित करते हुए विश्लेषित करने का आग्रह है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह जिस रूप में राजनीति में अपना चेहरा बदला था, उसके महीन धागों को परीक्षित भी किया गया है। अराजकीय क्षैक्षणिक प्रबंधन में लेखक का परिचय गहन रहा है। उसकी प्रतिध्वनि यहां पर है। सूरज प्रकाश, सरकारी नौकरी में न जाकर, ... निजी शैक्षणिक प्रबंधन में कार्य करना उचित समझता है।
कायस्थ परिवार की कन्या के प्रति वह आकर्षित है। उसके पिता उसके पूर्व के शिक्षक रहे हैं। टूटता मध्यवर्ग, ... तथा उसका चारित्रिक पतन यहां चित्रित है।
चीन के हमले ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था को पहली बार झिंझोड़ दिया था। राजनीति में विरोधी स्वर भी प्रबल होने लगे थे। उपन्यास में चित्रित कथा संसार में तत्कालीन राजनैतिक सामाजिक घटनाओं को समेटने का आग्रह तो है, पर सूक्ष्म विश्लेषण जहां सामाजिक विघटन का बीजारोपण परिदृश्य में उभर रहा था, ... उसका अभाव सा है। इस अंचल की बदलती सामाजिक चेतना का यह एक जीवन्त दस्तावेज है।
व्यक्ति केन्द्रित सामाजिक उपन्यास, तथा आंचलिक उपन्यास की संरचना में मौलिक भेद रहता है। आंचलिक उपन्यास की संरचना में, ... व्यक्ति सत्य का चित्रण हल्का होता है, ... वे महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व नहीं रखते, हां, परिप्रेक्ष्य की सजीवता, अंचल का मानवीकरण यहां प्रमुखता ले लेता है। व्यक्ति कन्द्रित, उपन्यास में व्यक्तित्व का विकास, ... नैतिक या अनैतिक हो यह महत्वपूर्ण नहीं होता, ... यथार्थ के ताने-बाने से वह प्राणवान होता हैं पात्र जितना जीवन्त होता है, ... उसका निरुपण कथा को उतना ही सहज व सरस बनाता जाता है।
यह सही है, यहाँ ‘व्यक्ति प्रधान’ यह उपन्यास ‘सूरज प्रकाश’ के चरित्र के साथ न्याय नहीं कर पाता है। उसके जन्म से विवाह तक की कथा में, ... जो मानसिक व बौद्धिक विकास के पहलू हैं वे जगह नहीं ले पाए हैं परन्तु अंचल को सजीवता देने के लिए कथा-संयोजन में पर्याप्त कुशलता बरती गई है। शिल्प की दृष्टि से यह संयोजन कठिन कर्म है।
भारद्वाज की इन दोनो कृतियों को इसलिए याद किया गया है कि उनकी पहचान मात्र हाड़ौती के राजस्थानी कथाकार के रूप में ही नहीं रहे। वे प्रांत के महत्वपूर्ण कवि एवं कथाकार थे, कोटा नगर को उन्होंने बहुत कुछ दिया, कम से कम हाड़ौती के रचनाकार इस ”सैल्फी“युग में अपनी परंपरा से परिचित तो हो सकें।
डॉ नरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 23 जनवरी 2015
भूले बिसरे चित्र नगेन्द्र कुमार सक्सेना -
भूले बिसरे चित्र
नगेन्द्र कुमार सक्सेना -
1971 में मेरी पहली आलोचना की पुस्तक ”गत दो दशक के काव्य में राष्ट्रीय चेतना प्रकाशित हुई थी। तब श्री नंदन जी के साथ सक्सेना जी से मिलने गया था। यह आपसे मेरी पहली मुलाकात थ। आप तब महात्मा गांधी हायर सैकंडरी स्कूल रामपुरा में प्रिंसपिल पद पर कार्य कर रहे थे। आपका साहित्य के प्रति प्रेम आपकी बातचीत से लगाा था। बाद में मैं बाहर सेवारत रहा।
1997 में जब कोटा आया था, तब आपसे दुबारा संबंध नवीनीकृत हुआ। आप सेवानिवृत्ति के बाद सक्रिय रूप से साहित्य में सक्रिय हो चुके थे। आपके कविता संग्रहों की बाढ़ सी आ गई्र थी।ं आपने बहुत लिखा, शांति भारद्वाज कहा करते थे, आपका गद्य , आपकी कविताओं से बेहतर हैं आप अच्छे वक्ता थे, संगीत में रुचि थी। आपने अपनी पत्नी के सहयोग से संगीत की सेवा के लिए , एक संस्था बनाई थी। जिसमे आप संगीतकारों के सम्मान के साथ , साहित्यकारों का सम्मान किया करते थे। आपके घर पर नियमिज काव्य गोष्ठियॉं हुआ करती थीं। आप स्वयं फोन करके , दूरभाष पर निमंत्रित किया करते थे। कोटा जंक्शन पर आपकी साहित्यिक सक्रियता मूल्यवान थी। आपका निवास साहित्य का केन्द्र बन गया था। जीवन के अंतिम समय में आप पुत्र के साथ उदयपुर चले गए थे। वहीं से ही सूचना आपके महाप्रयाण की मिली थी। समय का चक्र बहुत तेजी से चलता है। मुझे याद नहीं , उनके जाने के बाद किसी गोष्ठी में आपको हमने याद भी किया हो। वे बहुत बड़े कवि नहीं थे, निबंध कार नहीं थे। पर सहृदय पाठक थें । निरंतर अपनी उपस्थिति का अहसास हर साहित्यिक कार्यक्रम में बनाए रखते थे। उनकी साहित्य और संगीत के प्रति तीव्र अभिरुचि उन्हें ं सांस्कृतिक चेतना के वाहक के रूप में स्मृति में बनाए रखती है।
अनुभूति’, ‘सत्यमेव जयते’, ‘जीने की सरगम’, ‘समय के स्वर’, ‘शब्दसृष्टि’, ‘दशानन’, ‘स्वांतसुखाय’, ‘नीलगगन के तले’, ‘अदर्शन का दर्शन’, ‘अस्तित्व का प्रवाह’, ‘आनंद स्रोत, ‘अंतःस्वर’, ‘नए सूरज की किरण’ तथा ‘अंतर्प्रवाह’ आप के महत्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं। आप के अठारह के आस-पास काव्य-ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं।
नगेन्द्र कुमार सक्सेना के 1.राष्ट्रीय एकता के सांस्ड्डतिक सूत्र 1988 ई. 2. लोकमान्य से लोकनायक तक 1994 ई., 3. आदि से अन्त तक 1995 ई., 4. भारतीय सांस्कृतिक चेतना 1999 ई., 5. भारतीय लोकतन्त्र की अर्र्द्ध शताब्दी 2001 ई., 6. सुखी जीवन के सूत्र 2002 ई. 7. जीवन मूल्य 2003 ई., 8. सफल जीवन की पूर्णता ;2003 ई., तथा 9. शाश्वत सत्य 2005 ई. नौ आलेख संग्रह प्रकाशित हुए हैं।
नगेन्द्र कुमार सक्सेना की सनातनी धार्मिक दृष्टि है, जो संस्कारित है। वे अपनी विचारधार्मिता को स्पष्टता से लिए हुए हैं, उन के चिन्तन केन्द्र में, परिवार में विकसित होता हुआ व्यक्ति है, जो मनुष्यत्व को पाना चाहता है। एक दृष्टि में उन की आध्यात्मिकता तथा सांस्कृतिक-चेतना सम्पन्न दृष्टि, उन की विचार धारा को जहाँ पल्लवित करती है, वहीं विकसित भी करती है।
‘लोकमान्य से लोकनायक तक’, ग्यारह निबन्धों में, राष्ट्रीय चेतना के उन्नायक राष्ट्र नेताओं का स्मरण है।
‘सुखी जीवन के सूत्र’, ‘सफल जीवन की पूर्णता’, ‘जीवन मूल्य’, ड्डतियों के निबन्धों में नगेन्द्र कुमार सक्सेना की पारिवारिक मूल्यों के विघटन से चितिन्त एक पथिक की वेदना की दस्तावेज़ हैं।
‘शाश्वत सत्य’, बारह निबन्धों का संग्रह है। ये विचारात्मक निबन्ध हैं। ‘ईश्वर की अवधारणा’ तथा ‘आनन्दानुभूति’ एक साधक की यात्रा का साक्षित्व है। यही नगेन्द्र कुमार सक्सेना की अपनी विशिष्टता है। आपका गद्य लेखन पठनीय है। उसका एक विशिष्ठ पाठक वर्ग है।
उनका कवि मन छायावादोत्तर काव्य प्रभावों से विकसित हुआ हैं
”छा गयी, काली घटायें
पलक पर पावन बसा है, मौन स्वर निर्घोष करते।
समर्पित किया है, तुम्हें जबसे मैंने
मेरे रात और दिन महकने लगे हैं ।
मन के विपिन में विचरते जो पंछी
मलय गंध पाकर चहकने लगे हैं।“
आप की कविताएँ, समसामयिक परिस्थितियों से आहत एक नागरिक की मनोव्यथा है। आक्रोश उन के कवि-मन को सदा बेचैन करता रहा है। समय के स्वर की यही विवशता है। समसामयिकता का दबाव आप की कविताओं की प्रारम्भिक अन्तर्वस्तु है। ‘दशानन’ भी इसी प्रवृत्ति का ही विकास है। परन्तु कवि मन जहाँ सामान्य नागरिक की भूमिका में समसामयिकता की मातृ-भूमि को अंगीकार करता है, वहीं उन की अन्तर्मुखता उन्हंे रहस्य की ओर ले जाने का प्रयास करती है। यह द्वन्द्व कवि नगेन्द्र की कविताओं का प्रमुख स्थान है। वे बाह्य के दबावों से पीड़ित होते हुए भी अपने ‘स्व’ की सार्वभौमिक रसात्मकता को नहीं छोड़ पाते हैं। उन का मन, अन्तःसलिला में पुनः पुनः लौट कर रसानुभूति की मधुरम फुहारों को, शरद के लौटते हुए मेघों की तरह अनायास बरसा कर चला जाता है। यही कारण है कि ‘जीने की सरगम’ में पुनः वे छयावादोत्तर काव्य सम्वेदना से जुड़ जाते हैं। उन का रहस्य के प्रति सम्मान और उस से प्राप्त अन्तर्मुखता उन की काव्य सम्वेदना को क्रमशः परिमार्जित करती रही है।
समसामयिकता का दबाव जहाँ उन की अभिव्यक्ति को कहीं-कहीं अत्यधिक स्थूल व सपाट बयानी तक पहुँचा देता है, वहीं उन की अन्तर्मुखी अभिव्यक्ति, परिष्कृत काव्य भाषा और अन्तर्मन पर कार्य व्यवहारों का सूक्ष्म चित्रात्मक अप्रन सहज ही सौंप जाती है।
अन्तःप्रवाह में आप ने इसी अन्तर्यात्रा के विभिन्ना अनुभवों को अभिव्यक्ति दी हैः-
”अंतःप्रवाह जो उमड़ता वेगवान गति से साकार
तट के मल विक्षेप आवरण पा जाते शुद्ध संस्कार।’
यहां पर कवि का मन उस अतीद्रिय आलोक में विमुग्ध हो उठता है जब वाणी ‘वैखरी’ से ‘मध्यमा’ को पार करती हुई ‘पश्यन्ति’ के द्वार पर साधक में मन को चुपचाप दस्तक दे जाती है।
‘अब लगता है जीवन सार्थक है,
वे मेरे है और मैं उनका हूँ।
वाणी विचार तनमन में गहराए,
एकाकार हो गए, रस बरसा कर।’
कवि नगेन्द्र ने जीवन के उत्तरार्द्ध में लिखना तथा प्रकाशित कराना प्रारम्भ किया था। कालान्तर में उन की कृतियाँ काव्य सौन्दर्य से हटती दिखाई पड़ती हैं। कविता उन के लिए एक लयात्मक सम्वाद ही बन कर रह गई थी। दयाकृष्ण विजय के बाद सर्वाधिक काव्य संग्रह आप के ही प्रकाशित हुए हैं।
संख्या की दृष्टि से कवि नगेन्द्र के कविता संग्रह अपने आप में जहाँ अभूतपूर्व हैं, वहीं सहृदय सुधी पाठकों के लिए आदर योग्य हैं। उन्हों ने कविता के प्रति प्रेम, एक शिक्षक की तरह अपने आस-पास, हमेशा काव्य संग्रहों को पाठकों को भेंट में देने में सँजोए रखा। वे एक सुसंस्कृत उदात्त सहृदय गृहस्थ थे। कविता के लिए उसके आराधक कवि की सम्ृति ही सबसे बड़ी प्रार्थना है।
नगेन्द्र कुमार सक्सेना -
1971 में मेरी पहली आलोचना की पुस्तक ”गत दो दशक के काव्य में राष्ट्रीय चेतना प्रकाशित हुई थी। तब श्री नंदन जी के साथ सक्सेना जी से मिलने गया था। यह आपसे मेरी पहली मुलाकात थ। आप तब महात्मा गांधी हायर सैकंडरी स्कूल रामपुरा में प्रिंसपिल पद पर कार्य कर रहे थे। आपका साहित्य के प्रति प्रेम आपकी बातचीत से लगाा था। बाद में मैं बाहर सेवारत रहा।
1997 में जब कोटा आया था, तब आपसे दुबारा संबंध नवीनीकृत हुआ। आप सेवानिवृत्ति के बाद सक्रिय रूप से साहित्य में सक्रिय हो चुके थे। आपके कविता संग्रहों की बाढ़ सी आ गई्र थी।ं आपने बहुत लिखा, शांति भारद्वाज कहा करते थे, आपका गद्य , आपकी कविताओं से बेहतर हैं आप अच्छे वक्ता थे, संगीत में रुचि थी। आपने अपनी पत्नी के सहयोग से संगीत की सेवा के लिए , एक संस्था बनाई थी। जिसमे आप संगीतकारों के सम्मान के साथ , साहित्यकारों का सम्मान किया करते थे। आपके घर पर नियमिज काव्य गोष्ठियॉं हुआ करती थीं। आप स्वयं फोन करके , दूरभाष पर निमंत्रित किया करते थे। कोटा जंक्शन पर आपकी साहित्यिक सक्रियता मूल्यवान थी। आपका निवास साहित्य का केन्द्र बन गया था। जीवन के अंतिम समय में आप पुत्र के साथ उदयपुर चले गए थे। वहीं से ही सूचना आपके महाप्रयाण की मिली थी। समय का चक्र बहुत तेजी से चलता है। मुझे याद नहीं , उनके जाने के बाद किसी गोष्ठी में आपको हमने याद भी किया हो। वे बहुत बड़े कवि नहीं थे, निबंध कार नहीं थे। पर सहृदय पाठक थें । निरंतर अपनी उपस्थिति का अहसास हर साहित्यिक कार्यक्रम में बनाए रखते थे। उनकी साहित्य और संगीत के प्रति तीव्र अभिरुचि उन्हें ं सांस्कृतिक चेतना के वाहक के रूप में स्मृति में बनाए रखती है।
अनुभूति’, ‘सत्यमेव जयते’, ‘जीने की सरगम’, ‘समय के स्वर’, ‘शब्दसृष्टि’, ‘दशानन’, ‘स्वांतसुखाय’, ‘नीलगगन के तले’, ‘अदर्शन का दर्शन’, ‘अस्तित्व का प्रवाह’, ‘आनंद स्रोत, ‘अंतःस्वर’, ‘नए सूरज की किरण’ तथा ‘अंतर्प्रवाह’ आप के महत्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं। आप के अठारह के आस-पास काव्य-ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं।
नगेन्द्र कुमार सक्सेना के 1.राष्ट्रीय एकता के सांस्ड्डतिक सूत्र 1988 ई. 2. लोकमान्य से लोकनायक तक 1994 ई., 3. आदि से अन्त तक 1995 ई., 4. भारतीय सांस्कृतिक चेतना 1999 ई., 5. भारतीय लोकतन्त्र की अर्र्द्ध शताब्दी 2001 ई., 6. सुखी जीवन के सूत्र 2002 ई. 7. जीवन मूल्य 2003 ई., 8. सफल जीवन की पूर्णता ;2003 ई., तथा 9. शाश्वत सत्य 2005 ई. नौ आलेख संग्रह प्रकाशित हुए हैं।
नगेन्द्र कुमार सक्सेना की सनातनी धार्मिक दृष्टि है, जो संस्कारित है। वे अपनी विचारधार्मिता को स्पष्टता से लिए हुए हैं, उन के चिन्तन केन्द्र में, परिवार में विकसित होता हुआ व्यक्ति है, जो मनुष्यत्व को पाना चाहता है। एक दृष्टि में उन की आध्यात्मिकता तथा सांस्कृतिक-चेतना सम्पन्न दृष्टि, उन की विचार धारा को जहाँ पल्लवित करती है, वहीं विकसित भी करती है।
‘लोकमान्य से लोकनायक तक’, ग्यारह निबन्धों में, राष्ट्रीय चेतना के उन्नायक राष्ट्र नेताओं का स्मरण है।
‘सुखी जीवन के सूत्र’, ‘सफल जीवन की पूर्णता’, ‘जीवन मूल्य’, ड्डतियों के निबन्धों में नगेन्द्र कुमार सक्सेना की पारिवारिक मूल्यों के विघटन से चितिन्त एक पथिक की वेदना की दस्तावेज़ हैं।
‘शाश्वत सत्य’, बारह निबन्धों का संग्रह है। ये विचारात्मक निबन्ध हैं। ‘ईश्वर की अवधारणा’ तथा ‘आनन्दानुभूति’ एक साधक की यात्रा का साक्षित्व है। यही नगेन्द्र कुमार सक्सेना की अपनी विशिष्टता है। आपका गद्य लेखन पठनीय है। उसका एक विशिष्ठ पाठक वर्ग है।
उनका कवि मन छायावादोत्तर काव्य प्रभावों से विकसित हुआ हैं
”छा गयी, काली घटायें
पलक पर पावन बसा है, मौन स्वर निर्घोष करते।
समर्पित किया है, तुम्हें जबसे मैंने
मेरे रात और दिन महकने लगे हैं ।
मन के विपिन में विचरते जो पंछी
मलय गंध पाकर चहकने लगे हैं।“
आप की कविताएँ, समसामयिक परिस्थितियों से आहत एक नागरिक की मनोव्यथा है। आक्रोश उन के कवि-मन को सदा बेचैन करता रहा है। समय के स्वर की यही विवशता है। समसामयिकता का दबाव आप की कविताओं की प्रारम्भिक अन्तर्वस्तु है। ‘दशानन’ भी इसी प्रवृत्ति का ही विकास है। परन्तु कवि मन जहाँ सामान्य नागरिक की भूमिका में समसामयिकता की मातृ-भूमि को अंगीकार करता है, वहीं उन की अन्तर्मुखता उन्हंे रहस्य की ओर ले जाने का प्रयास करती है। यह द्वन्द्व कवि नगेन्द्र की कविताओं का प्रमुख स्थान है। वे बाह्य के दबावों से पीड़ित होते हुए भी अपने ‘स्व’ की सार्वभौमिक रसात्मकता को नहीं छोड़ पाते हैं। उन का मन, अन्तःसलिला में पुनः पुनः लौट कर रसानुभूति की मधुरम फुहारों को, शरद के लौटते हुए मेघों की तरह अनायास बरसा कर चला जाता है। यही कारण है कि ‘जीने की सरगम’ में पुनः वे छयावादोत्तर काव्य सम्वेदना से जुड़ जाते हैं। उन का रहस्य के प्रति सम्मान और उस से प्राप्त अन्तर्मुखता उन की काव्य सम्वेदना को क्रमशः परिमार्जित करती रही है।
समसामयिकता का दबाव जहाँ उन की अभिव्यक्ति को कहीं-कहीं अत्यधिक स्थूल व सपाट बयानी तक पहुँचा देता है, वहीं उन की अन्तर्मुखी अभिव्यक्ति, परिष्कृत काव्य भाषा और अन्तर्मन पर कार्य व्यवहारों का सूक्ष्म चित्रात्मक अप्रन सहज ही सौंप जाती है।
अन्तःप्रवाह में आप ने इसी अन्तर्यात्रा के विभिन्ना अनुभवों को अभिव्यक्ति दी हैः-
”अंतःप्रवाह जो उमड़ता वेगवान गति से साकार
तट के मल विक्षेप आवरण पा जाते शुद्ध संस्कार।’
यहां पर कवि का मन उस अतीद्रिय आलोक में विमुग्ध हो उठता है जब वाणी ‘वैखरी’ से ‘मध्यमा’ को पार करती हुई ‘पश्यन्ति’ के द्वार पर साधक में मन को चुपचाप दस्तक दे जाती है।
‘अब लगता है जीवन सार्थक है,
वे मेरे है और मैं उनका हूँ।
वाणी विचार तनमन में गहराए,
एकाकार हो गए, रस बरसा कर।’
कवि नगेन्द्र ने जीवन के उत्तरार्द्ध में लिखना तथा प्रकाशित कराना प्रारम्भ किया था। कालान्तर में उन की कृतियाँ काव्य सौन्दर्य से हटती दिखाई पड़ती हैं। कविता उन के लिए एक लयात्मक सम्वाद ही बन कर रह गई थी। दयाकृष्ण विजय के बाद सर्वाधिक काव्य संग्रह आप के ही प्रकाशित हुए हैं।
संख्या की दृष्टि से कवि नगेन्द्र के कविता संग्रह अपने आप में जहाँ अभूतपूर्व हैं, वहीं सहृदय सुधी पाठकों के लिए आदर योग्य हैं। उन्हों ने कविता के प्रति प्रेम, एक शिक्षक की तरह अपने आस-पास, हमेशा काव्य संग्रहों को पाठकों को भेंट में देने में सँजोए रखा। वे एक सुसंस्कृत उदात्त सहृदय गृहस्थ थे। कविता के लिए उसके आराधक कवि की सम्ृति ही सबसे बड़ी प्रार्थना है।
मंगलवार, 20 जनवरी 2015
भूले बिसरे चित्र रमेश चन्द गुप्त
भूले बिसरे चित्र
रमेश चन्द गुप्त
मैं जब सेवानिवृत्ति के बाद जब कोटा आया था, तब किसी कवि गोष्ठी में पहलीबार गुप्ताजी से मिलना हुआ था। अत्यधिक विनम्र तथा संवेदनशील कवि थें उन्होंने ही बताया था कि वे सेवानिवृत्ति के बाद ही काव्यजगत में आए थे। उनका कंठ मधुर था। वे तन्मयता से गीत पढ़ते थे। अस्वस्थ रहते थे। हर बार यही कहते थे, ईश्वर की कृपा हुई तो फिर मिलना होगा।
उनकी सरलता और गीतात्मक अभिव्यक्ति का मुझ पर प्रभाव था, जब वे कविता पाठ करते थे, तब मैं उनके शब्दों के साथ उनके भावजगत में खो जाता था। मैं उनके जाने के बाद उनको भूल ही गया था कि कोटा में प्रेस क्लब में जब नंद बाबू को श्रद्धांजलि दी जारही थी , तब इन्द्र बिहारी जी ने अवगत कराया था कि आज जल्दी जाना है, जंक्शन पर गुप्ता जी की पुण्य तिथि मनाई जा रही है, अचानक गुप्ताजी की स्मृतियॉं समीप आगई्रं।
कोटा के साहित्यप्रेमी तो उनसे परिचित थे , पर बाहर भी मित्र उनकी कविताओं से परिचित हो सकें , यही आशा है। आपके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हुए थे। आपके निवास पर अक्सर कवि गोष्ठियॉं होती थीं, जहॉं जंक्शन पर मित्रों से मिलना हो जाता था।
‘गीत जाह्नवी’ (2002 ई.) रमेश चन्द गुप्त की कविताओं का संग्रह है। रमेश चन्द गुप्त सांस्ड्डतिक काव्य धारा के कवि हैं। वे सुमधुर गीतकार हैं, तन्मयता से गीत गाते हैं। उन की भाषा सरल, सहज व प्रभावोत्पादक है। छन्द वैशिष्ट्य उन का अपना है। राग, छन्दों में समादृत हो कर स्वतः विस्तृत होती है। भाषा आम जन की है, पर शब्दार्थ की रमणीयता उन की विशिष्टता है।
यहाँ जन, मनुष्यता की पीर का वाहक है। वह ‘स्वयं’ सेवार्थी है। यहाँ करुणा मात्र सम्वेदना की वाहक नहीं है, वह ‘कर्मरत जीवन’ को समर्पण के लिए प्रेरित करती है:-
”चुन सको तो चुनो, बन्धु ऐसी डगर
जो निहारा करे नित्य गन्तव्य को,
जहां कर्म का लक्ष्य निर्मल नहीं
निरर्थक हुआ हाय, जीवन मरण।
अत्यन्त संक्षिप्तता में, काव्य भाषा सूत्रात्मक हो जाती है। ‘शब्द’ स्वतः सहज गेयता मंे, अपने लक्ष्य को सम्वेदित करने में समर्थ हैं। पर यह सपाट बयानी नहीं है।
”स्नेह और बन्धुत्व भूमिगत
जीवन के विश्वास खो गए
मर्यादाएं शिष्ट आचरण
अब तो बस इतिहास हो गए।
‘भूमिगत’ शब्द, व्यंजना में, आज की भौतिकवादी सामाजिक संरचना के समस्त विद्रूप को सरलता से पर्त-दर-पर्त खोलता जाता है।
”शोषक औ शोषित का शाश्वत
वैरभाव चलता आया,
नेह नहीं हो सकता भोली
मछली का मछुआरों से।“
वर्ग वैषम्य की आधार शिला और उस के द्वन्द्व को, जहाँ जनवाद प्रतिवाद, प्रतिकार, प्रतिशोध की भाषा सौंपता है, वहाँ रमेश चन्द गुप्त, विवेक की भूमि पर, सामर्थ्य का सदुपयोग कर के, कर्मरत जीवन को वरेण्यता सौंपते हैं। रमेश चन्द गुप्त, ? मैथिली शरण गुप्त की विस्मृत काव्य धारा, शब्दावली व रूप विधान का आभास, याद दिला जाते हैं। जो गेयता के कारण ‘जन काव्य’ बन गई थी।
‘मुट्ठी भर मधुमास (2006 ई.), गीतकार रमेश चन्द गुप्त का दूसरा काव्य संग्रह है।
रमेश चन्द गुप्त, सांस्कृतिक काव्य धारा के कवि हैं। उन के ‘काव्य रूप’ तथा ‘काव्य वस्तु’ अपनी ज़मीन की उपज हैं। वे जहाँ ‘मनोजगत’ में अपने शब्दों का आधार तलाश करते हैं, वही बाह्य जगत की विसंगतियों से आहत हो कर, उस पीड़ा को सार्वकालिक व सार्वभौमिक बनाने का प्रयास भी करते हैं:-
”पन्थ है अवसाद बोझिल
और घायल है चरण।
कामना के कल्प तरु का
पर नहीं बन्ध्याकरण।“
‘कामना का कल्प तरु’, पृ. 37.
यहाँ व्यक्ति-मन की पीर, अचानक जब निर्वसना हो जाती है तब ‘व्यक्ति मन’, ‘समष्टि मन’ में परिवर्तित हो जाता है:-
”सभ्य जगत में मर्यादा का
बजता रहा सदा इकतारा
लोकतंत्र के गलियारों से
पर संयम-संकेत खो गए।“1 ‘बुनते-बुनते’, पृ. 94.
रमेश चन्द गुप्त की ‘काव्य भाषा’ प्रसाद मयी है, इस में लालित्य है। छन्द में एक स्वाभाविक गति है। यहाँ शब्द क्षिप्र गति से प्रवाहित नदी की शान्त लहरों की तरह तट को छूते हैं। सहज स्वभाविकता, तथा मन्थर गति, उन की काव्य रचना की अपनी विशिष्ट पहचान है। अनुकरण तथा अनुकरण से दूर कवि गुप्त की कविता में जहाँ अनुभूतियों का विरल संगुफन है, वहीं अभिव्यक्ति के स्तर पर मधुरतम सूत्रात्मक भाषा की खोज, उन की कविता का अपना सौन्दर्य है।
आज कवि गोश्यिों में कृत्रिम अट्टहास तथा ”अपना पढ़ा और चुपचाप चलते बने“ की परंपरा विकसित होगर्इ्र है, वहॉं रमेशचंद्र गुपत की स्मृतियॉं एक सुगध मय हवा का स्पर्श करा जाती हेैं ।
रमेश चन्द गुप्त
मैं जब सेवानिवृत्ति के बाद जब कोटा आया था, तब किसी कवि गोष्ठी में पहलीबार गुप्ताजी से मिलना हुआ था। अत्यधिक विनम्र तथा संवेदनशील कवि थें उन्होंने ही बताया था कि वे सेवानिवृत्ति के बाद ही काव्यजगत में आए थे। उनका कंठ मधुर था। वे तन्मयता से गीत पढ़ते थे। अस्वस्थ रहते थे। हर बार यही कहते थे, ईश्वर की कृपा हुई तो फिर मिलना होगा।
उनकी सरलता और गीतात्मक अभिव्यक्ति का मुझ पर प्रभाव था, जब वे कविता पाठ करते थे, तब मैं उनके शब्दों के साथ उनके भावजगत में खो जाता था। मैं उनके जाने के बाद उनको भूल ही गया था कि कोटा में प्रेस क्लब में जब नंद बाबू को श्रद्धांजलि दी जारही थी , तब इन्द्र बिहारी जी ने अवगत कराया था कि आज जल्दी जाना है, जंक्शन पर गुप्ता जी की पुण्य तिथि मनाई जा रही है, अचानक गुप्ताजी की स्मृतियॉं समीप आगई्रं।
कोटा के साहित्यप्रेमी तो उनसे परिचित थे , पर बाहर भी मित्र उनकी कविताओं से परिचित हो सकें , यही आशा है। आपके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हुए थे। आपके निवास पर अक्सर कवि गोष्ठियॉं होती थीं, जहॉं जंक्शन पर मित्रों से मिलना हो जाता था।
‘गीत जाह्नवी’ (2002 ई.) रमेश चन्द गुप्त की कविताओं का संग्रह है। रमेश चन्द गुप्त सांस्ड्डतिक काव्य धारा के कवि हैं। वे सुमधुर गीतकार हैं, तन्मयता से गीत गाते हैं। उन की भाषा सरल, सहज व प्रभावोत्पादक है। छन्द वैशिष्ट्य उन का अपना है। राग, छन्दों में समादृत हो कर स्वतः विस्तृत होती है। भाषा आम जन की है, पर शब्दार्थ की रमणीयता उन की विशिष्टता है।
यहाँ जन, मनुष्यता की पीर का वाहक है। वह ‘स्वयं’ सेवार्थी है। यहाँ करुणा मात्र सम्वेदना की वाहक नहीं है, वह ‘कर्मरत जीवन’ को समर्पण के लिए प्रेरित करती है:-
”चुन सको तो चुनो, बन्धु ऐसी डगर
जो निहारा करे नित्य गन्तव्य को,
जहां कर्म का लक्ष्य निर्मल नहीं
निरर्थक हुआ हाय, जीवन मरण।
अत्यन्त संक्षिप्तता में, काव्य भाषा सूत्रात्मक हो जाती है। ‘शब्द’ स्वतः सहज गेयता मंे, अपने लक्ष्य को सम्वेदित करने में समर्थ हैं। पर यह सपाट बयानी नहीं है।
”स्नेह और बन्धुत्व भूमिगत
जीवन के विश्वास खो गए
मर्यादाएं शिष्ट आचरण
अब तो बस इतिहास हो गए।
‘भूमिगत’ शब्द, व्यंजना में, आज की भौतिकवादी सामाजिक संरचना के समस्त विद्रूप को सरलता से पर्त-दर-पर्त खोलता जाता है।
”शोषक औ शोषित का शाश्वत
वैरभाव चलता आया,
नेह नहीं हो सकता भोली
मछली का मछुआरों से।“
वर्ग वैषम्य की आधार शिला और उस के द्वन्द्व को, जहाँ जनवाद प्रतिवाद, प्रतिकार, प्रतिशोध की भाषा सौंपता है, वहाँ रमेश चन्द गुप्त, विवेक की भूमि पर, सामर्थ्य का सदुपयोग कर के, कर्मरत जीवन को वरेण्यता सौंपते हैं। रमेश चन्द गुप्त, ? मैथिली शरण गुप्त की विस्मृत काव्य धारा, शब्दावली व रूप विधान का आभास, याद दिला जाते हैं। जो गेयता के कारण ‘जन काव्य’ बन गई थी।
‘मुट्ठी भर मधुमास (2006 ई.), गीतकार रमेश चन्द गुप्त का दूसरा काव्य संग्रह है।
रमेश चन्द गुप्त, सांस्कृतिक काव्य धारा के कवि हैं। उन के ‘काव्य रूप’ तथा ‘काव्य वस्तु’ अपनी ज़मीन की उपज हैं। वे जहाँ ‘मनोजगत’ में अपने शब्दों का आधार तलाश करते हैं, वही बाह्य जगत की विसंगतियों से आहत हो कर, उस पीड़ा को सार्वकालिक व सार्वभौमिक बनाने का प्रयास भी करते हैं:-
”पन्थ है अवसाद बोझिल
और घायल है चरण।
कामना के कल्प तरु का
पर नहीं बन्ध्याकरण।“
‘कामना का कल्प तरु’, पृ. 37.
यहाँ व्यक्ति-मन की पीर, अचानक जब निर्वसना हो जाती है तब ‘व्यक्ति मन’, ‘समष्टि मन’ में परिवर्तित हो जाता है:-
”सभ्य जगत में मर्यादा का
बजता रहा सदा इकतारा
लोकतंत्र के गलियारों से
पर संयम-संकेत खो गए।“1 ‘बुनते-बुनते’, पृ. 94.
रमेश चन्द गुप्त की ‘काव्य भाषा’ प्रसाद मयी है, इस में लालित्य है। छन्द में एक स्वाभाविक गति है। यहाँ शब्द क्षिप्र गति से प्रवाहित नदी की शान्त लहरों की तरह तट को छूते हैं। सहज स्वभाविकता, तथा मन्थर गति, उन की काव्य रचना की अपनी विशिष्ट पहचान है। अनुकरण तथा अनुकरण से दूर कवि गुप्त की कविता में जहाँ अनुभूतियों का विरल संगुफन है, वहीं अभिव्यक्ति के स्तर पर मधुरतम सूत्रात्मक भाषा की खोज, उन की कविता का अपना सौन्दर्य है।
आज कवि गोश्यिों में कृत्रिम अट्टहास तथा ”अपना पढ़ा और चुपचाप चलते बने“ की परंपरा विकसित होगर्इ्र है, वहॉं रमेशचंद्र गुपत की स्मृतियॉं एक सुगध मय हवा का स्पर्श करा जाती हेैं ।
गुरुवार, 15 जनवरी 2015
भूल बिसरे चित्र अरूण सैदवाल
भूल बिसरे चित्र
अरूण सैदवाल
अरुण सैदवाल झालावाड़ जिले के रहने वाले थे। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की सहयोगी सेवा डिफेंस एकाउन्ट्स में चयनित होकर देहली चले गए थे। वे अर्थशास्त्र में प्रारम्भिक वर्षों में प्राध्यापक भी रहे थे। मेरे मित्र प्रीतम चोयल के पुत्र से उनकी बेटी का विवाह हुआ था। उस विवाह में ही उनसे मेरा परिचय पहली बार हुआ था। वे सेवानिवृत्ति के बाद कोटा आगए थे। विकल्प की काव्य गोष्ठियों में उनके कवि रूप से परिचय मिला था। वे उच्च प्रशासनिक सेवा से आए थे , पर वे इसका अहसास किसी को होने नहीं देते थे उन्होंने प्रेमजी प्रेम की राजस्थानी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। बच्चों के लिए एक विज्ञान कथा भी लिखी थी , जो चिल्डरन बुक हाउस से प्रकाशित हुई्र थी। वे जीवन के अतिम दिनो में हाड़ौती शब्द कोश पर कार्य कर रहे थे। उनका प्रोजेक्ट मैसूर की किसी संस्था से स्वीकृत हुआ था। उन्होंने कोटा में एक कार्यशाला भी आयोजित की थी। विकल्प संस्था की ओर से प्रकाशित अभिव्यक्ति के अंक में हितेष व्यास ने उन पर आलेख लिखा था।
अरूण सैदवाल के अविकल्प (1979) तथा करवट लेता समय (2003) प्रकाशित हुए हैं। उनकी कविताओं की एक काव्य पुस्तिका भी विकल्प ने प्रकाशित की थी। जिसका संपादन अंबिका दत्त ने किया था।
सैदवाल, की कविता, महानगर में अपनी पहचान तलाशते उस नागरिक की व्यथा-कथा है जो संपूर्ण जिम्मेदारियों के वहन करने के बावजूद पाता है कि वह अपनी अस्मिता को, खोता जा रहा है,... झील में डूबते हुए... उस व्यक्ति की छटपटाहट जो हर तिनके को सहारा पाकर, तट पर आना चाहता हैं... शायद थोड़ा सुकून वह पा जाए,... मार्मिक मनः स्थितियां तथा पारदर्शी भाषा, ... हर पल तेजी से कैनवास पर बिखरते रंगों से संगफझन की चाहत में उपजते दृश्य बिम्ब, उनकी कविता की अपनी विशेषताएं है-
‘‘ अब मैं चुपचाप उनकी
साजिशों में शामिल होने लग गया हंू।
दोस्त ठीक ही कहते हैं
अब मेरे पेट की चर्बी
और चेहरे की चमक बढ़ने लगी है...
‘काम का आदमी’ पृ.11
झटका या हलाल
दोनों में से किसी एक मौत को
चुनने की
मुझे पूरी आजादी है
यह विकल्प भी है
मेरे ऊपर की गई
कितनी बड़ी मेहरबानी है
(विकल्प)
डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने ‘करवट लेता समय’ के पुरोवाक में उनकी काव्य प्रक्रिया पर जो टिप्पणियां दी है, वह विवेचनीय है- ‘वे साधारण-सी स्थितियांे को अपने अनुभव-संसार का हिस्सा बनाते हैं और फिर उसे एक सार्वजनिक से अनुभव में डाल देते हैं। ‘स्व’ से ‘एकदम’ पर की दुनिया की प्रतीती शब्दों के स्तर पर नहीं हो सकती।... परन्तु ‘सैदवाल’ एक सहज सृजन कर्मी की तरह उसका सजग और संयत इस्तेमाल करते हैं।
डॉ. कलानाथ शास्त्री ने, कृति की समीक्षा में (मधुमती जून 2004) कहा है कि -“संकलन, करवट लेता समय’- जिस एक शब्द से भी परिभाषित किया जा सकता है, वह शब्द है, ‘वैविध्यमय’। इसमें कथ्य और शिल्प की विविधता तो है ही भाषा वैविध्यमयी है... साधारण सी साधरण स्थिति भी कवि की व्यंजना का स्पर्श पाकर, जिस दृश्य बिम्ब को सघनता में अभिव्यंजित कर देती है,... वह भाषा गत योजना कवि की अपनी है ।”
“देखिएगा
कुछ बरसों बाद
पहले आएगी खबर,
बाद में होगी घटना
वह दिन दूर नहीं
जब इंटरनेट पर देख लूंगा
मैं अपनी मृत्यु का समाचार
और अगले दिन पाएंगे
लोग मुझे मुरदा।” (समाचार-पृ. 70
तमिल के उपन्यासकार मुरुगन ने यही तो किया हें इंटरनेट पर लिखा है, उपन्यासकार मुरुगन नहीं रहे , शिक्षक मुरुगन जीवित है। साहित्यकार की इसी व्यथा को सैदवाल ने अपने शब्द दिए थे।
...वह साधारण सी स्थित का चयन करता है... वह उसकी अनुभति का स्पर्श पाकर,... एक वृहद आयाम को सौंप जाती है... काव्य भाषा में यह सांकेतिकता.. संक्षिप्तता तथा तरलता यहां दृष्टव्य है-
‘मेरे पास है सिर्फ़
एक आवाज
हो सकता है
तुम्हारे काम आए।
सैदवाल कविता प्रेमी थे। अंग्रेजी , हिन्दी , हाड़ौती पर उनका अधिकार था। पता नहीं क्यों हम अपने सीमित दायरे से बाहर नहीं झांक पाते। वे केन्द्रिय प्रशासनिक सेवा से वर्षों बाहर सेवारत रहकर अपने घर आए थे, वे अपने आपको कविता को समर्पित करने के बाद भी मित्रों से दूर ही समझते रहे। प्रेमजी प्रेम की हाड़ौती कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद उनका अंचल के प्रति प्रेम था। पता नहीं क्यों , हम जो अभी- अभी हमारे बीच से उठकर गया है, इतनी जल्दी उसे भूल जाते है।
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