गुरुवार, 13 नवंबर 2014

मन वृन्दावन

         मन वृन्दावन

माँ, नदी थी, तट था और था मैं,  दिख रहा था दूर से
डूबता सूरज, पृथ्वी का मिलन आकाश से
तुमने कहा था कुछ नहीं
बस उठी थी वह भुजा हाथ में जिसके था खड़ग
और पांव के नीचे दबा था वह असुर,
सिंह वाहिनी....उस सिंह से भयभीत ‘‘मैं’’ था सोचता,
क्या असुर वध के लिए था जरूरी सिंह का होना....?

रूप तेरा, लपलपाती जीभ,हाथ में खप्पर,
रक्त में स्नान कर आ गई हो...

उस क्षितिज के पार, तट कालिंदी किनारे
दौड़ती रंभाती फिर रहीं गायें
हाथ में बंशी लिए वह ‘‘कान्ह’’
माँ,... ढूंढ़ता तुझको,
जो सहारे कदंब के नीचे थी खड़ी
आरक्त पद नख से धरती को टिकाए...वह गोपिका,

रोम रोम स्पंदित तन-मन ,गूंज रहा था नाद
कुंकुमी आकाश, मांग मानो भर गई हो,
या उड़ चला आकाश, होलिका दहन की आग,
उस शीतल आग में, वस्त्र मानों जल गए हों,

क्या रहा था शेष, जब कषायों से सजी यह देह
हो चुकी निःशेष, रंगों से नहायी
थी सखी ललिता, कर रही थी नृत्य चिन्मय,
शब्द... खो गए आधार, अर्थ...बस बेबस
वाक्, पार अपरा के, परा की कोख में हो मौन।

मात्र सौरभ, जल उठा उपवन
आम्र मंजरियों के अचानक जागने से या खिल उठी चंपा या मालती
कुछ ना असंभव उस छोर पर
गंध ने दे दिया सब कुछ

वाक् ने चुपचाप लिया और पी लियावह रस,
दृष्टि का जो भेद था, रंग का रूप का कुल गोत्र का जाति का
नहीं था शेष।

सखी ललिता थी वहां, और नहीं था कुछ
हवा चुप थी, जो साथ था ,वह मौन था,
और था वहां वह कुछ जो था अरूप....।

उतरा शीश से ले साथ अलकनंदा, भगीरथ चाह को
हिमालय रौंदती वह बह चली, अपनी डगर पर
कुछ मांगती ,कुछ छोड़ती शिव धाम को, स्पर्शित-
जगत की कामना और थी वह चाह ,पार जाने की जगत से,
था वहां पर जगत अपनी सार्थकता ले,
वहाँ उतरी ,वह वेग, मानो सब बह गया हो।

त्रिनेत्र था, वह जो जगा, पर शांत था
नहीं था ‘‘पर’’ वहाँ ,वहां मात्र वह था,
मात्र वह ,जो वह एक था,

माँ...  सचमुच तुम वहां थीं, तुम वहाँ थीं
मुझमें समायी, दूर मुझसे
बात करती और हँसती ,पास रहती दूर जाती,
मैं जो चला था वह नहीं था, वह कुछ और था।

और दिखा था दृश्य वह माँ नहाती तुम
और सागर की उफनती उद्दाम लहरें
वक्ष को छू रही थीं, स्तंभित दिशाऐं
उठती थीं भुजाऐं इस ओर से उस ओर तक
था दिखा वह पथ ,जहाँ से सृष्टि जगती और सोती
माँ, सिर्फ तुम वहां थीं,

तुमने दिखाया वह, आना और जाना
सखी ललिता का
आकाश से उतरी गई, आकाश में ,आकाश...
उसके सिवा था कुछ नहीं ,जो बचा आकाश
जो रहा आकाश,  आकाश में आकाश था
आकाश से आकाश था, आकाश में था,  मैं,  जो पात्र था
सखी ललिता भी, जो हँस रही थी, दोष था मेरा
मेरे वसन का, मेरे गात का, कल्मष उसी को दे दिया था
वह नहायी और सजकर उस गात से, जो कि मेरा था,

और दिखा वह धाम
जब शब्द वीणा से हुआ गंुजार भ्रमर नाल पर
बैठे थे पितामह और देखा वे तुम्हें करते नमन थे, तुम उन्हें,
यह दृश्य मैं भूला नहीं था,
हाँ, ‘‘अहम्’’ ही था कमलदल
जहां पितामह रच रहे संकल्प थे
ब्रह्म नाभि से उपजा वह ‘‘अहम्’’
ले प्राण का आधार, ब्रह्माण्ड को पुलकित किए
था दे रहा था गान, मधुर गुंजार, अनहद नाद,
जो निरंतर हो रही निस्सृत चिन्मयी वाद्य से
 जो निरंतर है, जो गति है,

चाक ब्रह्मा का निरंतर घूमता
उससे ही उपजा यह जगत, उसी में लीन होती
घूमना था चाक को, गति ही तो ब्रह्मा है, गति ही प्राण है,
जो खिल रहा था बीज, दो कोंपल लिए
मन, प्राण का, यह योग ही तो है जगत का बीज,
और थीं माँ तुम, लिए गर्भ में उस बीज को
मुझको, मेरे इस गात को
सृष्टि में निरंतर भटकती इस देह को...

कहा था, यही उसने ,
जो हिमालय की कृपा को, साथ ले सती, या उमा को
कर रहा था वास, बाघम्बर लपेटे, हाथ में डमरू
अपार्थिव नृत्य था वह जब हुआ था,
कांपती धरती पर वह चुप
अधरों पर समेटे ‘‘हास’’ धरती का
लिए कंठ में विष धरती का
वह कुछ कह गया था-
पार मेेरे ही जाना है तुझे
है वहीं पर धाम माँ का,
जो खड़ी है सामने तेरे , दूर नदी तट पर
दिखाती है जगत को, जगत के पार को
फिर जगत जिसका हुआ है जन्म, होना लीन,
उसकी भी नियति यह , वहाँ पर बस ‘‘चिदाकाश’’ है
वही पथ है ,जो महेश्वर धाम है।
जा... सब भूल जा
दुःख और सुख के बीच का यह रास्ता
हाँ, यह पीना है गरल तुझको ,रहना चुप नहीं
पूरा आनन्दित  ,तभी तू जा सकेगा
इस घाट से उस घाट तक।

वहां पर है रखा वह पात्र, जिसका मुख ढका
स्वर्ण से, ले उठा
दो पग, पर ध्यान रख
हिरण्यमय यह पात्र
जिसके लिए जानकर भी ‘‘राम’’
चल पड़े थे ले धनुष स्वर्ण मृग संधान करने,
जानती सीता, सब कुछ
कर गयीं वे पार, रेखा खींचकर जो गए लक्ष्मण
तभी तो ‘‘अहम्’’ का स्तूप, रावण छल गया।

स्वर्ण का यह पात्र, छलता ही रहा है
तथागत को भी मिला था, इसका आमंत्रण,
पर चले थे, वे यह सोचकर
वैभव राजसी दे न पाएगा, कभी संतोष,
छल या छलना इस जगत की, भरमा रही सबको सदा से
तभी तो महावीर ने जाना,
दे निर्मम यातना इस देह को,
पा सकें वह, जो कि उनका है
जो वे स्वयं है, मुक्ति का यह पर्व
मुक्ति उससेे भरमाया जिसनै जीवन को
कषाय का यह वलय,
‘‘अध्यवसाय’’ को घेरे में लिए ,संवर साधना से
कट सकेगा, सार पाया, श्रमण ने वेराग्य में...

यह जो वेला है, यह विद्या और अविद्या की संधि रेखा है
मधु यामिनी, मधु कलष लो खुल गया है
मधु वह जो सार है इस जगत का,
क्या जगत यह व्यर्थ है, निःस्सार है,
 माँ, बैठी, शेष शैया पर प्रभु पद दबाती, जो लक्ष्मी रूपा है,
क्या असंगत, मात्र कल्पना की चित्रशाला है?

हाँ, माँ, लक्ष्मी रूपा खो गए नारद जिसके मोह में
मांग बैठे, हरिरूप स्वयं ‘‘हरि’’ से,
और फिर जब वरमाला प्रभु को
कर समर्पित लक्ष्मी रूपा हँस पड़ी,
तो हो कुपित ,प्रभु से ले शाप ,स्वर्ण के इस पात्र से मोहित
पद रत छोड़, विभ्रम का ले दुपट्टा
तमस की गहरी अमावस रात में गए खो...यही तो सार है।

इस धरा का, यह धरा जो है वृन्दावन
सजी, सी चिन्मय, दिव्याकाश में
जहां नहीं है गंध ,न है रूप , न है शब्द ,न है कामना
वहीं पर है चिन्मय कालिंदी
जहाँ है गोपियाँ, सखी ललिता भी,
वैणु है रखी श्यामल देह के रक्ताभ अधरों पर ,
पीताम्बर पट,
दे सहारा बाँह का श्री राधा को, चिन्मयी माँ प्रृ्रकृति को
हो रहा नित्य नर्तन चिर स्पंदन मात्र गति है, मात्र गति,
अहर्निश रास, अधर कोमल, सिहरता गात
स्पंदन ही सजगता और बेसुध तन, लौटता लहरों से आता पवन
तट के सहारे छोड़ता हाँ, हाँ यही तो था...वहाँ...
भागवत का गीत प्रेमिल,
‘‘चैतन्य’’ का वह चिन्मय नृत्य
घुंघरू बांधकर नाची वह श्यामल रंग में,
तोड़कर वह पात्र का ढक्कन जो रखा था, स्वर्ण के घट पर
सिंहासन की परिधि को लांघकर,
‘‘रैदास’’ भक्ता वह,
कह रही थी भाषा उस ‘‘दरद’’ की...

सूर की गोपी अजानी
बरसते थे नेत्र जिसके देखकर काली घटाऐं
श्यामल रंग को,
‘‘कबीरा’’ का वह बेसुध मन
जो खुमारी में रहा था डूबता, जागता
सजगता में ‘‘परा’’ को बेखरी पर बांधता हँसता, हँसता...
अपनी फकीरी में रहा खुद को लगाता।

हाँ, वह गोरख, जो चला था योग की धूनी लगाए
कह गया था, साथ उसके वह रहेगा, जो जगा है
जो जगा है, सदा निशदिन, वही रहता, साथ उसके
जो सदा ही जगा रहता।

यह घड़ी भी माँ तुम्हारे, सहज स्नेहिल स्पर्श की
कि मैं जगा था, देखता
तुमको, नदी को, तट को और सबको
माँ, सब छूटता, यह गात, यह जात, यह देह का आधार
वह जो बीज था, अब खुल गया था
उठ रहा था ज्वार , कभी बाहर का आमंत्रण
कभी भीतर की अकुलाहट
माँ, यह सब दिखाया , उस स्पर्श ने
जो रह रह कर उठा था, जब जगा था।

माँ, पहली बार धरती पर माँ की कोख में,
वह पुलक, वह सिहरता गात, जब स्पर्श पाया देह ने
तब हुआ स्पंदित, यह तन यह मन, वही सिहरन,
जो उठी थी नाभि से, हो गई थी व्याप्त नस नस में
हां, माँ वही, वही तो था
वही, लौट आया शिशु मेरा जो खो गया था।

जगत की,  इस ज्ञान की, इस सूचना की ,इस शास्त्र की
प्रचारित कर्दमी जड़ बेला में,
जहां प्रस्तर खंड पूजित, शब्द अर्चित, चिन्मय अपमानित,
स्वर्ण घट की प्रतीक्षा में खड़े सब
इस देह में यंत्र मानव से,
शास्त्र को चादर सा लपेटे, बैखरी धुन पर नचते
नट विद्याा ही सीखे, दे रहे जग को प्रलोभन
जगत की मिथ्यात्व की घोषणा का पाठ दोहराते,
स्वयं भीतर जग की दासता में लिप्त, स्वर्ण घट की कामना में हो रहे बूढ़े
बूढ़े ही थे जन्मे,
इस चिन्मयी वृन्दावनी रस भूमि पर
जिनका शैशव जन्म से ही खो गया था,

हाँ जगा माँ वह, गोरख ने कहा था
आधी रात में है एक बालक बोलता,
माँ, वह बालक
वह जगा था, खोकर सब कुछ
कुल, जाति, धारण जो किया था मात्र बालक
वह बटुक भैरव, माँ वह मेरा, काल भैरव
जो ममेतर था रहा कल तलक था, वह  भी विदा अब ले  गया,...

कह रहा था वह पखेरू, बैठा वृक्ष पर, फल कुतरता
और था जो देखता था, वह अचानक ही बचा था
चखते चखते पंख उसके जो जले थे,
वह अचानक कह गया था
वह चखना भूलकर के अब, बस देखता है
देखता है जो वही तो है बटुक, बटुक भैरव
वह मिला था, और थी ललिता
जो सदा से साथ थी
उतरी आकाश में, आकाश में ही मिली थी देह में,
देख ले-
वृन्दावनी चिन्मयी धरा पर, ले हाथ में वंशी,
न ले, चाह तेरी, बांध ले घुंघरू
जगत यह पाप है अब नहीं, लीला भूमि है यह कान्ह की
जो बटुक है, वही तो मुक्त है
स्वर्ण तट की प्रतीक्षा है नहीं अब
सर्प और स्वर्ण का नहीं है भेद
यह बटुक हंसता, हंसाता
अभी तो जन्मा यही है
हाँ, माँ, मैं खड़ा था, नदी तट पर साथ तेरे,

बटुक ही तो सार है, सार्थकता यात्रा की, जो हुयी है ज्ञात
ऋषियों से, मुनियों और गुरुओं से,
पर ही न जाने क्यों, हम बटुक को छोड़कर
वृद्ध को ही साथ रखते हैं सदा।

हां, तभी तो भूमि वृन्दावन जहाँ भक्ति, नवयौवना के पुत्र
थककर क्लांत थे जो गिरे
और नारद विस्मय का छोड़ पीताम्बर, गए थे पूछने,
प्रश्न पितामह से- ‘क्या ‘भागवत’’ का बीज ही हैे यह,
या कथा श्री राम की
जहां मिलना मारूति का श्रीराम से
पाना खोई सीता, शांति श्रीराम की
विवेक का जागरण ही अंतिम गीत है।

प्राप्त होता, जो मिला इस जीव को जग में
उसी धारणा से, जो स्वधर्म है
सामर्थ्य का सुदपयोग ही तो धर्म है
जो खोलता है द्वार ,लेकर साथ विवेकी मन
उस धाम का चिर चिन्मय लीला भूमि का।

तब चिदाकाश में ,उड़ता वह पखेरू
जो चख रहा था, पंखों को जलाकर
पाकर अपनापन कि वह अब देखता है,
उड़ चला है ,चिदाकाश में
उसके पंख उजले, शुभ्र, ज्योतित
विवेक और वैराग्य के, जो छूटता था, और था जिसे जाना
वह अब जा चुका है, था जिसे आना
वह अब आ चुका है।

जो शिशु जन्मा, वह कान्ह हो यीशु, वह भी बटुक था
उसका ही आना, आगमन का गीत है
जो जगा है, वह बटुक है
जो बटुक है, वह जगा है।

है नहीं यहा पर धूल, पारस और अमृत की
नहीं है स्वर्ग का सुख
नहीं है भय की चादर ,
नहीं घृणा की बहती नदी है
हिमालय से निकली भगीरथी का जन्म है यह, जो मिली है
‘‘शिव’’ की जटा पर आज आकर, चंद्रमा है खिला
कंठ में लपेटे, सर्प विषधर
बाघम्बर लपेटे शांत है वह, वह ‘‘शिवम्’’ है,
कल्याण की इच्छा संजोए
नाद डमरू में भाषा छन्द लेकर,
नृत्य की भंगिमा हो, या ज्ञान वेदों का,
आगम, निगम की संधि रेखा,, तंत्र की आधार भूमि
चिर कैलाश की चिर भाव भूमि, यहीं तो है।

यहीं पर जन्मे हैं, ‘‘गणेश’’
जो स्वयं पशु का शीष रखकर, बुद्धि का आगार हैं,े
 वे दे रहे आधार सबको,
नाभि अपनी करते उजागर, मोदक भोग लेते
क्या नहीं असहज रूप उनका।

हां, शीश ही तो सार दुख का है
हो गया निरंतर विकास इसका,
हृदय तक अब चेतना का द्वार कुंठित
जा नहीं सकती, वह यह दासत्व खोकर
जो कि पाया ,सभ्यता के विस्तार से उसने यहां पर
शक्ति मन की हो या प्राण की, दोनों एक हैं
वास उसका नाभि,, आना है यहां
जो कि अब हो गयी है कैद घर मस्तिष्क में
जहां से जाता पथ जगत की लालसा का।

कह गया था वह- लोभ मत कर
संपत्ति यह किसी की है नहीं
त्याग से ही भोग का पथ है
और वास ईशा का जगत में
है, जगत से वह परे भी है।

लोभ का यह पथ, कषायों का बना है सिलसिला
तथागत की, विषभरी तृष्णा की नीली धार है यह
छोड़ जिसको वे गये, पा गए महावीर पथ वैराग्य को ले साथ....।

यह उपजती शीश पर, जितने केश हों उतनी ही तृष्णा जान
करते लुंचन केश का, और वे ‘‘मुंडक’’ के अनुयायी
‘‘अग्नि’’ को जगाते शीश पर, केश अर्पित कर
भगवा पहन, जग में चल पड़े।

कहते गणपति, पशुता तुम्हारी शीश पर बसती
भले ही तुम मनुज हो,, मनुज का वास तो नीचे हृदय में है
कंठ, जहां शिव ने, गरल को है रखा
इसी द्वार के नीचे रहती तितिक्षा है,
वहाँ खुला आकाश है, भाषा बैखरी से मध्यमा,
मध्यमा से होकर पश्चंती... ढूंढ़ती है पथ,  परा में डूबना
जहां जगता ‘‘सोम’’, वही मधुमय सोम,
मन और प्राण का आधार बनता,‘‘अन्न’’ से उपजा
खोता आपको, दे मन-प्राण को आधार।

यह वह भूमि है, जो बनी वृन्दावन
जहाँ तमस के पार कालिंदी, जहाँ है खड़े श्री कान्ह
ले माधुर्य, जो बस प्रेम है
जिसको पाकर कह उठा था ‘‘जायसी’’
इसके सिवा यह देह सचमुच व्यर्थ है।

यही है वह धाम ,जहाँ है देश हंसों का
जो उड़ते हैं चिदाकाश में, यही है सार्थकता
मानव देह की, होना बस मनुज
कर दूर सारे आवरण, जो ढंके हैं
चेतना को लिए इस स्वर्ण घट पर
हाँ, उठा ढक्कन, अब होगी...अब यहीं पर
चेतन निस्सृत सजग, वह नाम उसका दे सको तो दे ही देना
नाम ही तो है मनुज की आकांक्षाओं का द्वार
इसके सिवा वह जा नहीं सकता
कभी निज के पार।

अर्हत भूमि का आस्वाद है यह, उतरना छिलके कांदे के
जो मिला है, अंत में वह क्या...
क्या अस्तित्व है सहज, भाषा होती मूर्त जहां हो व्यक्त करना,
संज्ञा और विशेषण पर,
पर जहां मात्र लहरें हों और लहरों से परे जो गर्भ है
जहाँ नहीं है कुछ, जो हो सके रूपायित कहीं पर
वहाँ तो बस दिगम्बर है।

खोज उसकी क्यों करो, संधान संज्ञा का
पर वह है, वहाँ तो मात्र वंशी नाद है,
जो गति है जन्म देती...और रखती और कर देती विदा
यह क्यों? है नहीं माया
यह लीला भूमि है कान्ह की जो है योग निन्द्रा में
महासागर नीली लहरों बीच ,शैया शेष नाग
 हाँ, है वहां पर माँ,
लीला सहचरी, निरंतर जागृत चिन्मय,
उसका लास्य ही तो है सौंदर्य इस धरा पर।

उसकी ही हँसी, जो है मुदित नीले आकाश में
यह जल, थल, अग्नि, पावक सब वही हैं
है, वही जो मात्र गति है और था मैं, मैं मनुज, बटुक भैरव
था छूटता था ज्ञान प्रौढ़ पन की जो सूचना थी, जग गया था वह शिशु
या जागरण का गीत, था उस पार,
घाटी पर दिख रहा  था, जगत, ‘‘जोगी महल’’ सा, जहां है मात्र खंडहर
अतीत के जड़ संवाहक भविष्योन्मुखी डूबते मस्तूल के वे खंड,
जहां  असुरक्षित है मनुज है
जो मात्र पशु है,
और उसका होना पशु सनातन कर्म है ,जो पशु है वही होगा
यहां पशु आहार, यही अभ्यारण्य है।


वह शिशु बटुक भैरव,  यहीं था जन्मा ,गणपति, सानिध्य ही
जागरण की ,नव मनुज की
नव सूर्य के आगमन की सूचना थी।


पौ फटी थी, बरसते बादलों के बीच उस कालिमा में
हल्की सी झांकती, खिले गुलाब सी वह लालिमा थी
 आगत का संदेश...था उसमें,
जो जगा है, आज, थिर हो नहीं सकता
छाया तेरी कालिमा से है बनी,
संग तेरे ही चली है, जन्म से ही ,साथ तेरे वह रहेगी
होना तुझको है सहज, सजगता ही सार जीवन है।

हां, नदी तट पर लिखा था...यह
सुवासित कमल दल बीज,
मेरे और तेरे बीच , बहता प्राण था
छन्द गायत्री, वह सविता, माँ, ले ‘‘सोम’’ का आधार
मन और प्राण होकर एक  मुझमें लीन, मुझसे मुझको छीन
नव शिशु का हुआ था जन्म,
प्रणव सहचर, नहीं था शून्य, नहीं था दैन्य
तट कालिंदी वृन्दावन रज,
खड़ा था ‘‘वह’’ बटुक, बना वंशी ,सखी ललिता साथ
कहाँ थी वह, कहाँ था वह
दोनों एक,  क्षण वह एक
कल की  रंभाती गाय, धेनु भी अब चुप
कदंब की महकती थी  गंध।

माँ, तेरे कान्ह के अधरों पर, रखी वंशी
प्रणव सहचर, मधुरिमा में रहा था जग
अरूणाई ही अरूणाई
दिशाऐं थी दिगम्बर सी
कहतीं रूप ही तेरा, तुझी को कर अलग, रहता अलग,
यही छाया है, जो तमस है.....तू नहीं  है वह।





















शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

हमारे पुरोधा साहित्य के अनाम साधक बृजेश चंचल

हमारे पुरोधा
साहित्य के अनाम साधक बृजेश चंचल


तब मैं  अजमेर में पढ रहा था, कोटा का कवि सम्मेलन सुनने आया था पैंसठ की लड़ाई हो चुकी थी। कोटा के कवि सम्मेलन  की पूरे देश में धूम थी । यहॉं हमने बच्चन जी को सुना, नीरज जी को सुना, कैफी आजमी को सुना ही नहीं , उनका सानिध्य भी पाया था। इस अंचल के प्रसिद्ध कवि रघुराज सिंह हाड़ा को पहली बार वहीं सुना था, शायद ”कैसूला का फूल“ उनकी कविता थी। पर महत्वपूर्ण पहचान जिस कवि की मिली थी, वे बृजेश चंचल थे, वे भूख से व्याकुल बच्चे की करुण दशा की मार्मिक वेदना को शब्दायित कर रहे थे। मैंने देखा था, मैं ही नहीं सैंकड़ों लोगो की ऑंखें तरल थी। करुण रस के , वीर रस के बृजेश चंचल अद्भुद कवि थे।
वे आज कहॉं हैं, संभवतः परिवार जन को भी पता नहीं।
”लापता हुआ वह चेहरा“ हमारी क्षरित संवेदना का वे मूक गवाह बनकर रह गए। उनके भाई  प्रेमचंद कुलीन भी कहानी कार रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व उनके परिवार के एक सदस्य आकाशवाणी  मे मिले थे, उनके बारे मैं जानने का प्रयास किया था। पर उनके अज्ञातवास पर जाने के बाद से उनके बारे में कोई सूचना उनके पास नहीं थी।
मुझे याद है,  उन दिनो जब किसी पत्रिका में किसी रचना का प्रकाशन साहित्यकार के लिए महतवपूणर््ा घटना बन जाती थी, बृजेश चंचल की रचनाएॅं हर छोटी बड़ी पत्रिका में निरंतर प्रकाशित हो रहीं । वे मंच के उन दिनो सर्वाधिक लोकप्रिय कवि भी थे। एक बार मासिक पत्रिका कादंबिनी ने उनका गीत मुखपृष्ठ पर प्रकाशित किया था। तब इस नगर में उसकी बहुत चर्चा हुई थी।
दुर्भाग्य है, उनका कोई संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ। तब इस नगर में भी प्रांत की साहित्यिक गुटबंदी ने पॉंव पसारने शुरु कर दिए थे।
वे अपने समकालीन कवियों से बहुत आगे थे, पर उनकी प्रतिभा और जीवन की समस्याएॅं उन के लिए बोझा ही बन गईं।  कविता के साथ जुड़ा हुआ उनका  मन जहॉं उदात्त हो जाता था, वहॉं उनके परिवार , नौकरी बात उन्हें अचानक अप्रिय लग जाती थी।
हमारी आज भी यही आदत है हम कविताऔर कवि का मूल्यांकन भी , सोच- समझकर बाजार को देखते हुए करते हैं।
उनकी एक कविता मेरे पास है, जो संभवतः आपातकाल के आसपास लिखी गई थी।  उसके कुछ अंश मैं आपके साथ साझा करना चाहॅंगा
”स्वर्गीय शारदा पुत्रों की
जब कलमें कुर्क कराओगे।
कुछ तो बोलो,निज काल पात्र
किस अंधे से लिखवाओगे।

खुशहाली एक खिलोने सी
हर रोज तोड़ती मॅंहगाई।
मैना ने पूछा तोते से,
यह कैसी आजादी आई?

कॉंटे तो सब आजाद हुए,
फूलों पर अब तक पहरे हैं।
कुछ कहने वाले गॅूंगे हैं ,
कुछ सुनने वाले बहरे हैं।

अब पूछ रहा है लाल किला,
झंडा फहराने वालों से-
क्ब तक मेरे माथे ऊपर
ये रीते कलश चढा़ओगे?

हर बार लोरियॉं देने से
यह देश नहंी सोजाता है।
अब तो बतलाओ सही-सही
कब नए सवेरे लाओगे?

आदरणीय मित्रो, हम बृजेश चंचल की शोकसभा भी नहीं कर पाए क्या पता वे जीवित हों?  वे कहॉं हैं, न वे किसी दुर्घटना के शिकार हुए , न उनके सन्यासी होने की सूचना है। संभवतः गत पच्चीस वर्ष से वह कवि का चेहरा हमारे बीच से गुम हो गया है। इसीलिए हम उन्हें भूल गए। उनका व्यक्तित्व साक्षी है, अधिक उर्जा का वेग पात्र को तोड़ देता हे।  क्या कारण रहा ,क्या उनका शरीर दुर्बल था, जो उनकी प्रतिभा को सभॉंल नहीं पाया ,या हमारा दुराग्रह रहा जहॉ हम आज भी प्रतिभा को अवमूल्यित कर , अपात्र के महिमा मंडन में अपनी गुटीय प्रतिबद्धता को लगा देते हैं। हमने उनकी प्रतिभा को आदर नहीं दिया।
मित्रो उन्होंने बहुत अच्छा लिखा था, क्या पता आपके साथ सुरक्षित किसी पत्रिका मैं हो, भारतेन्दु समिति के संग्रहालय में हो सकता है, उनके परिवार जन ने कुछ सुरक्षित रख रखा हो, वह बाहर आए, संग्रह प्रकाशन हो, उनकी स्मृति में हमारा यही सहयोग होगा।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

अनाम साहित्य सेवक दुर्गाशंकर त्रिवेदी

हमारे पुरोधा

अनाम साहित्य सेवक दुर्गाशंकर त्रिवेदी

आदाणीय मित्रो, , संभवतः हम सब इस अनाम साहित्य सेवक को लगभग भूल ही गए हैं। भवानीमंडी में जन्मे , त्रिवेदी जी कोटा के सोशलिस्ट समाचार कार्यालय के प्रभारी थे। सन् सत्तर के दशक में उनका कार्यालय साहित्यकारों का एक विशेष आकर्षण का केन्द्र था।  वे उस समय भारत की हर छोटी बड़ी पत्रिका में निरंतर छपते रहते थे। देश की हर पत्रिका का अंक आप उनके यहॉं प्राप्त कर सकते थे। वे स्वयं सहर्ष अन्य को पत्रिका  का पता बताते थे, छपने के लिए प्रोत्साहन देते थे। उस जमाने में कोटा में दस के आसपास साप्ताहिक और पाक्षिक पत्र निकलते थे। विशेषांकों का अपना महत्व था।आज तो देश के बड़े पत्र भी वैसे अंक नहीं निकाल सकते हैं। आज प्रांत के दोनो बड़े पत्र इंटरनेट से उतारी गई सूचनाओं के संग्रह मात्र रह गए हैं।
त्रिवेदी जी कोटा से अस्सी के आसपास जयपुर में राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट को देख रहे थे। वहॉं से वे  बाद में जयपुर के पास किसी गॉंव में निजि आवास बनाकर लेखन कार्य में संलग्न थे।
त्रिवेदीजी साहित्य के मौन साधक थे। उन्होंने बहुत लिखा , लेखन ही उनकी आजीविका का साधन रहा। अत्यंत विपन्नता में भी उनका व्यक्तित्व अपराजेय रहा। वे निरन्तर हर छोटे लेखक की मदद में रहे।
सन 1967 मे कोटा आया था। तब  कहानीकार नफीस अहमद से मेरा परिचय था, वही मुझे त्रिवेदी जी से मिलवाने लेगया था। बृजेश चंचल, शचीन्द्र उपाध्याय, प्रेम जी प्रेम, रामकुमार, उस दौर के अनेक साहित्यकार उस समय शाम के समय प्रेस में मिल जाते थे, त्रिवेदी जी सबको चाय और कचौड़ी खिलाया करते थे। पैसे की बात करते ही तुरंत कहते आज मनीआर्डर आया है, आप तो खाओ।
समय के साथ सब बदल जाता है, आज साहित्यकारों की विवशता यही है, बाजारवाद में साहित्य और साहित्यकार अपने ही घर- परिवार में अवमूल्यित हो गया है। अपने साहित्य के इतिहास के ग्रंथों की तैयारी के समय जब साहित्य की सामग्री का संग्रह कर रहा था, तब यही वाक्य प्रायः सुनने में आया, ”उनें साहित्य से हमें क्या मिला? कोई दुकान ही खोल देते तो परिवार कहॉं से कहॉं होता? साहित्यकार की  रचनाएॅं उसके सामने उसके जीवनकाल में ही उपेक्षित हो जाती हैं।
शायद गलती हमारी ही है। हम बहुत अधिक आत्ममुग्ध हो गए हैं। राजनेताओं की तरह हमारा व्यक्त्वि हो गया है। त्रिवेदी जी ने बहुत लिखा, वे अपने आलेखों का विशेषकर संस्मरणों का संग्रह निकालना चाह रहे थे। पर वह रह गया। उसका प्रकाशन किया जाना उचित है।
समाचार पत्र में एक छोटी सी खबर थी, जयपुर के समीप रेल की पटरीपार करते हुए , एक वृद्ध की मौत होगई, वह साहित्यकार दुर्गाशंकर त्रिवेदी थे। धक्का सा लगा,उनके पुत्र बालमुकुंद का फोन भी मेरे पास नहीं था, कुछ वर्षों से संबंध टूट गया था। पहले उसका भी कोटा में प्रेस था, वह बंद होगया था। परंपरा के हिसाब से वह भी उनसे दूर हो गया था।

न तो कोटा में कोई शोकसभा हुई , न मधुमती में कोई सूचना आई, किसी ने चर्चा भी नहीं की, कि कहीं ऐसा व्यक्तित्व भी हमारे बीच में था।  जिस व्यक्ति ने पूरा जीवन साहित्य सेवा में निकाल दिया, सबकी मदद भी करता रहा, उसकी याद मैं आप के साथ बॉंट रहा हूॅं। मेरी दृष्टि में साहित्यकारों की स्मृतियॉं ही हमारी पूॅंजी है, जो आगे का रास्ता हमें दिखाती हैं।

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

हमारे पुरोधा मास्साब मदन लाल पँवार


  हमारे पुरोधा मास्साब  मदन लाल पँवार

तब मैं भाटापाड़ा कोटा  के प्राईमरी स्कूल में भरती हुआ था। मेरी बड़ी बहिन जो मुझे घर में पढ़ाती थीं, पहली बार शाला में लेगईं थीं। तीसरी कक्षा में मास्साब मदनलाल जी ने अंत्याक्षरी प्रतियोगिता आयोजित की थी। मेरी बहिन को कविताओं का बहुत शौक था , सुभद्राकुमारी चौहान की कविताएॅं उन्हें कंठस्थ थीं। मुझे भी तब राधेश्याम रामायण की चौपाइयॉं याद करवाई गईं थीं। उस प्रतियोगिता में मास्साब ने मेरा भ्ी चयन किया था। तब और आज के स्कूलों में बहुत बदलाव आगया है। आज बहुत कुछ उपलब्ध है, पर जो चाहिए था वह खोगया है। मास्साब ने हमारी तैयारी करवाई थी। हर छंद ”थ“ वर्ण पर समाप्त हो सिखाया गया था। तब की  वे पुरानी कविताएॅं वार्धक्य की इस सीमारेखा पर आज भी याद आती हैं,  पर स्वयं की रचित कविताएॅं, याद ही नहीं रहतीं।

मास्सब हमको पाटनपोल के किसी स्कूल में लेगए थे। तब पैदल ही जाना होता था। वहॉं हमारा स्कूल प्रथम आया था। पॉंचवीं के बाद मैं अलवर चला गया था। अपने बड़े भाई त्रिभुवननाथ जी के पास ही बादमें अध्ययन किया। आज  स्मृतियों सारे शिक्षक चले गए पर मास्साब आज भी याद आते हैं। शायद साहित्य के प्रति अनुराग मैंने वहीं पाया हो। वे शाला में हर शनिवार को साहित्यिक कार्यक्रम रखाकरते थे। महपुरुषों की जयन्ती मनाते थे।

बाद में जब कोटा लौटा , यहॉं से हिन्दी मैं एम.ए भी किया पर मास्साब याद नहीं आए। शायद तब मैं झालावाड़ में पद स्थापित था तब मंडाना के आसपास के किसी सरकारी कर्मचारी ने बताया था कि मदनलाल जी पंवार मंडाना के पास किसी खेत पर रहते हैं। काफी अवसाद में है। कभी- कभी कोटा जाते हैं, पर उनकी पहचान खो गई है। नशे में रहते हैं। मैं उन्हें खोजता हुआ गया, बातें की स्कूल की याद दिलाई वे पहचान गए। कवि पंवार वापिस लौट आए। उन्होंने कविताएॅं सुनाई , अपनी किताब दी। वे सन 1947 से पहले से लिख रहे थे। कोटा के सम्मानित कवि थे।
 परन्तु अचानक राजनीतिक पंडितों  के साहित्य में सक्रिय होने से तब से सही साहित्य कर्मियों की उपेक्षा प्रारम्भ होने लग गई थी।  मुझे बाद में कुछ मित्रों ने बताया था कि वे नशे में गोष्ठियों में आ जाते थे, उन्हे बाहर निकालना पड़ता था।
कहीं पढ़ा था, प्रतिभा का जब समाज सम्मान नहीं करता है, तब निराशा और अवसाद ही साहित्यकार के मित्र बन जाते है। दूसरे की हत्या से अधिक घृणित दूसरे के आत्मसम्मान को कुचलदेना अधिक दुखद है। न जाने क्यों सृजनशील व्यक्त्वि ही अधिक तकलीफ पाते हैं। उनके साहित्य के संबंध में मैंने कहीं नही पढ़ा, वे कब दुनिया से चले गए ,मुझे भी नहीं पता ,पर इतना मुझे याद है,सन 45 से पचपन के बीच वे कोटा के प्रसिद्ध रचनाकार रहे। आपकी कृति ”क्रांति किरण “ मेरे पास है। उनकी अन्य कोई कृति प्रकाशित हुई हो, यह सूचना मेरे पास नहीं है।
कवि मदन लाल पँवार की कृति ‘क्रान्ति किरण’ सन् 1953 ई. में प्रकाशित हुई थी। कृति में स्पष्टतः दो विभाजन हैं। स्वतन्त्रता से पूर्व तथा उस के पश्चात।
‘क्रान्ति’ की भूमिका में शम्भू दयाल जी सक्सेना ने लिखा है कि वे अपने समय के लोकप्रिय कवि हैं। । कवि पँवार की कविता में तत्कालीन सामाजिक दुर्दशा तथा पराधीनता से उत्पन्न ग्लानि बीज बन कर, अभिव्यक्ति पाना चाहती है। उस काल के कवियों के सामने परिवेशगत सच्चाई, स्पष्ट थी। छायावादी कवियों की तरह पलायन और कला के प्रति रुझान यहाँ परिलक्षित नहीं रहा है।

”आज बन्धन मुक्त माता हो,
 यही अभिलाषा मेरी
आज अपने ही करांे से
लूँ मिटा अस्तित्व अपना
शीश के बदलेे कहीं यदि
पा सकूँ मैं स्वत्व अपना

एक क्या शत जन्म ले कर
शीश हँस-हँस कर चढ़ाऊंॅं
निज करांे से चण्डिका का
रिक्त खप्पर भर बढ़ाऊॅं।“41
भावोद्रेेक कवि की पूँजी है। शब्द चयन तथा गति, सौन्दर्य प्रभावी है।
”हे, उड़ते विहग ज़रा उन से
कह देना, दूर विषाद हुआ
माता के बन्धन टूट गए
भारत फिर से आज़ाद हुआ।“

कवि सन् 1947 ई. की पन्द्रह अगस्त का स्वागत करते हुए गीत गा रहा है, वह उन नाम-अनाम शहीदों की स्मृति में, उन तक स्वतन्त्रता का सन्देश पहुँचा रहा है।
‘शिक्षक’, ‘युवक’, ‘किसान’ एवं ‘नरेश’ इस संग्रह की अन्य कविताऐं हैं। इस अ´चल की हिन्दी कविता को कवि पँवार का योगदान रहा है। आप की काव्य-भाषा सहज, प्रभावी है। आप ने अपनी कविताओं में परिवेशगत सच्चाईयों को यथारूप अभिव्यक्ति देने से बचते हुए, भावनाओं का अतिक्रमण करते हुए, नैतिक आग्रह को जन सामान्य के लिए सहज गम्य बनाने का प्रयास किया था। इस रूप में वे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण हैं।
कुछ मित्रों के पास और जानकारी होगी, बॉंटें , यह एक यज्ञ है, जहॉं हम हमारी उस पीढ़ी के प्रति जो साहित्य सृजन में लगी रही, पर अब वे विस्मृति के अंधकार में खोगई हैं, उस परंपरा से नई पीढ़ी को परिचित कराएॅं,।

रविवार, 24 नवंबर 2013

हमारे पुरोधा रामनाथ कमलाकर

हमारे पुरोधा   रामनाथ कमलाकर

आदरणीय मित्र-गण, आप इस लेखमाला से हृदय से जुड़ गए हैं, मेरे लिए यह उत्साह वर्द्धक है। हमारा हिन्दी साहित्य बीसवीं शताब्दी में ही प्रारम्भ हुआ, विकसित हुआ और आज हमारे ही कारण से अवसान के समीप भी आगया है। हिन्दी के समाचार पत्रों मंे अंग्रेजी लेखकों के लेखों के हिन्दी अनुवाद या इन्टरनेट से उतारी सूचनाओं का संग्रह ही अब बच गया है। अपनी भाषा में मौलिक सृजनात्मकता की पहल ही रुक सी गई है। प्रान्त में हिन्दी कविता को पहचान दिलाने वाले कवियों में सुधीन्द्र के समकालीन रामनाथ कमलाकर का योगदान महत्वपूर्ण है। सुधीन्द्र अपने समय में भारत में राष्ट्रªªीय- सांस्कृतिक काव्यधारा के महत्वपूर्ण कवि के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। भारतेन्दु समिति संभवतः 1980 के आसपास तक सुधीन्द्र जयंती मनाती थी, पर उसके बाद से यह लेखकीय पर्व बंद हो गया है।

रामनाथ कमलाकर से मेरा पहला परिचय कोटा के कवि सम्मलन में हुआ था। तब मैं किशोरावस्था में था, जब मैंने उन्हें मंच पा देखा था, उन्हें कवि कुल किरीट के रूप में पुकारा गया था।   संभवतः सन पचपन के आसपास का समय रहा होगा। कमलाकर जी की तब पहचान स्थापित हो चुकी थी। तब कवि जगदीश चतुर्वेदी भी स्थापित कवि होचुके थे। ये दोनो ही कवि जन संपर्क विभाग में कार्य कर रहे थे।

सन 69 में मैं झालावाड़ महाविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक रहा। वही पर कमलाकर जी जन संपर्क अधिकारी थे। आपका पुत्र गोपाल शर्मा मेरा विद्यार्थी रहा, तब उनके घर कई बार जाना हुआ। जयपुर में जब शासन सचिवालय में कार्यरत था तब पुनः कमलाकरजी के सपर्क में आया, वे प्रति माह कविगोष्ठी आयोजित करते थे। उसमें उन्होंने  मुझे बुलाया था। कमलाकर जी का हालही में कुछ वर्षपूर्व देहांत हुआ है। वे रससिद्ध कवि थे। नंद जी ने  आपको अपनी आलोचना की कृतियों में याद किया है।

 हमारी नई पीढ़ी उनके साहित्यिक योगदान से अनभिज्ञ है। वे कवि परम्परा के कवि थे, रस , माधुर्य गीत की रागात्मकता को वे सहज ही व्यंजित कर जाते थे। न जाने क्यों अकादमी ने उन्हें उनके सम्मान से दूर ही रखा।


रामनाथ कमलाकर की अनवरत सृजनात्मकता पचास वर्षों से फैली हुई है। वे नन्द चतुर्वेदी के समकालीन हैं। उन की प्रारम्भिक पुस्तकों में उन का परिचय कवि कुल किरीट कमलाकर दिया हुआ है।
वे अपने ज़माने के ‘कवि सम्मेलन’ के प्रमुख कवि हुआ करते थे। नन्द चतुर्वेदी ने उन की काव्य रचना के बारे में लिखा था:-
”कमलाकर के जीवन में कवि ही की तरह अशेष प्यार की भावना और जलन एक साथ रही है। तारीफ़ यह है कि उस की जलन प्यार को कभी जला नहीं सकी, और यही कारण है कि कमलाकर के काव्य में रह-रह कर अनन्य प्रीति के विश्वासमय स्वर मुखर हुए। सभी गद्य गीतों में वह धरणी के सन्ताप का दुःख गा रहा है और पृथ्वी का आत्मा-हनन, जैसे उसे चैन नहीं लेने दे रहा है।“


‘हन्स तीर्थ’, ‘मेरे गीत: तुम्हारे चरण’, ‘दिलकश दौर’, ‘गौने की चूनर’ आप के प्रमुख प्रकाशित कविता संग्रह हैं।
‘एकोऽहम्,’ उन की पहली ‘गद्य गीत’ ड्डति है। बृज भाषा पर आप का अधिकार रहा। आप कवीन्द्र हरनाथ की परम्परा के वाहक रहे। ‘एकोऽहम’ पर उत्तर छायावाद का पूरा प्रभाव है। भाषा प्रसाद मयी, अलंकृत है। साथ ही दर्शन की पूरी भंगिमा है। तथ्यों को समेट कर अनुभव में ढालने की चेष्टा इस कृति में है। फिर भी हिन्दी भाषा की इस अंचल की ही नहीं, वरन प्रान्त की यह पहली ‘गद्य गीत’ कृति उल्लेखनीय है। अपने समय में इस कृति ने सुधी विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया था।

”ऐसे ही, सम्वेदनाओं के अनेक सन्दर्भों में रामनाथ ‘कमलाकर’ की कविताओं का रसास्वादन किया जाना चाहिए। प्रकृति की विराट प्रभुता, प्रीति का पावन आकर्षण, रहस्य-चिन्तन, वैषम्य पूर्ण जीवन की कुण्ठाऐं और कभी-कभी बीसवीं शताब्दी के कत्रिम जीवन की ग्लानि, इतना कुछ समेटता है कवि ‘कमलाकर’। एक रचना में चाँद के अपरूप सौन्दर्य का यह आत्मीयता पूर्ण वर्णन दृष्टव्य है:-

”लो प्रतीची के अधर पर झुका चन्द्रानन
छॉंह पलती तम किशोरी का जगा यौवन
सोचता क्या ओंठ पर अँगुली धरे आकाश
चाँदनी में मुस्कुराता चाँद मेरे पास।“
ओठ पर अंगुली धरे आकाश , नूतन प्रतीक योजना है,  चंद्रोदय की समीपता , सहृदय को झंकृत कर देती है।

         
”अंजलीगत समर्पण हुआ जब अहम
रह गए एक तुम ही जगत बन स्वयं
भाव घूँघट उठा साधना ने कहा
थे कभी तुम कठिन अब अनायास हो
शब्द से दूर हो अर्थ से पास हो
दूर से दूर हो पास से पास हो।“

अद्वैतानुभूति ही प्रेम का प्रसाद है, जहॉं  कोई गैर नहीं होता कोई और नहीं होता, मनुष्यत्व की सुगंध के कवि कमलाकर हैं।

कमलाकर ने अपनी इस विस्तृत काव्य-समयावधि में काव्य की सभी प्रवृत्तियों का आदर किया। समय के साथ बदलती काव्य संरचना का का सहारा भी लिया, परन्तु उन का मूल स्वर जो उदात्त मानवीय सम्पदा से सन्निाहित था, वह परिवर्तित नहीं होने दिया। गहरी वैष्णवी संस्कृति मंे उन के काव्य संस्कार प्रभावित हुए हैं, जो ‘परम हन्स’, ‘अरविन्द’ आदि अनेक सन्तों के दर्शन से स्थिर हुए, उस संस्कार धर्मिता ने उन की ‘काव्य अन्तर्वस्तु’ का निर्माण किया है।

यही कारण है कि वे निरन्तर धर्म के तथ्यात्मक रूपों की आवृति को छोड़ते हुए गहरे में आध्यात्म से जुड़ते चले गए।

गहन साांस्कृतिक चेतना और उस की अभिव्यक्ति, कमलाकर की काव्य साधना है। वे कविता की ‘अन्तर्वस्तु’ भाव लोक से लाते हैं, जो उन की अपनी ‘अनुभूत्यात्मक सम्वेदना’ है। वे आत्मानुभव को, जीवनानुभव में बदलते हुए, काव्य रूप की, उसी के अनुरूप तलाश करते हैं। उन के यहाँ रूप उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना जो ‘रूप’ उन्हों ने अनुभव किया है। आप की सहज, प्रभावी, दृश्य बिम्बों से सघन, काव्य भाषा की विशेषता का यही कारण है:-

”मत मतान्तर सभी एक मत हो गए,
स्वप्न सब जागरण में असत हो गए।
लक्ष्य पर आ मनोरथ का रथ रुक गया,
राह के संस्मरण अब विगत हो गए।“

”मौन हो गया मन
मंज़िल पर चुक गई चपलता,
शान्ति सेज सो गई मुखरता
जग जिस में प्रतिबिम्बित था
वह उलट गया दर्पण।“    ;पृ. 3. ‘गौने की चूनर’

”दूर कर नींद का आवरण
आ गया लो तुम्हारी शरण।
अब तुम्हारी ख़ुुशी में ख़ुशी,
ज़िन्दगी है तुम्हारे रहन।“

कमलाकर हिन्दी के सूफ़ी कवि थे, जो प्रेम की पीर का सत्य पा चुके थे। नई कविता के आलोचक और कवि  जग जिसमे प्रतिबिम्बित था, उलट गया वह दर्पण, कवि की आंतरिक यात्रा का मूल्यांकन नहीं कर पाए।

कवि कमलाकर साठ वर्ष से  अधिक निरन्तर सृजन रत रहे,   वे दार्शनिक तथ्यों को, सन्तों के अनुभवों को सम्वेदना के स्तर पर स्वीकार करते हैं। उन्हों ने हिन्दी में रुबाइयाँ लिखी हैं। उन का शब्द भण्डार विपुल है:-

”नभ निकंज में सन्ध्या फूली,
श्रमिक कण्ठ झरते मधु निर्झर,
गूँजे नीड़ों में आतुर स्वर,
प्रत्याशित शिशु मुख में मुख दे
तरु फुनगी पर बिहगी झूली।“ ;पृ. 152. ‘गौने की चूनर’

यहाँ जो बिम्ब विधान है, वहाँ मानवीकरण भी है, प्रतीकों का सुन्दर निर्वहन भी है। ‘लोक’, ‘श्रमिक कण्ठ से झरते मधु निर्झर’, ‘प्रत्याशित शिशु मुख में मुख दे’ के साथ ‘प्रकृति’ के ‘माँ’ रूप को प्रस्तुत कर गया है।

यह आलेख कमलाकरजी की काव्य साधना को समझने का प्रयास है।  जब जीवन में विसंगतियों को मूल्य बनाकर कविता के मूल्यांकन का प्रयास किया गया , तब कमलाकर जी की माधुर्य भावना का निरादर होना स्वाभाविक ही था। कविता मनुष्य जाति की सहृदयता की संवर्द्धन औषधि है, इस आधार पर कमलाकर जी का मूल्यांकन अपेक्षित है।


शनिवार, 23 नवंबर 2013

हमारे पुरोधा श्री नारायण वर्मा

हमारे पुरोधा श्री नारायण वर्मा

श्री नारायण वर्मा से हमारे काव्य मित्र अपरिचित ही हैं। कारण स्पष्ट रहा हे, यहॉं के साहित्यकारों में अपने समकालीन उत्कृष्ट रचनाकार की उपेक्षा स्वाभाविक वृत्ति रही है। तब मैं राजकीय महाविद्यालय में हिन्दी विभाग का छात्र था, तब आपके गीतों को पहली बार सुना था। आप राजकीय सेवा में उच्च अधिकारी रहे थे। भारतेन्दु समिति पर तब सांस्कृतिक साहित्य कर्मियों का प्रभुत्व था।  वहॉं साहित्य के प्रति अलिखित दुराग्रह था। श्री नारायण वर्मा समृद्ध गीतकार थे। राज्य सेवा का भी प्रभुत्व उनकी एक पहचान थी।

आपके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं। आप वर्षो तक साहित्य सृजन में संलग्न रहे। परन्तु साहित्यिक गुटबन्दी से बहुत दूर रहे। छावनी में जहॉं आज शोपिंग सैन्टर है , उस जमाने में आपका बड़ा भवन था।मुझे यह पता नहीं आप कब दिवंगत हुए, आपकी स्मृति में न तो कोई मोनोग्राफ आया नहीं कोई आलेख मुझे मिला। आपके दो काव्य संग्रह मुझे मिले , उन्हीं के आधार पर यह स्मृति- कथा नियोजित है, मित्रों के पास सूचना हो अवश्य बताएॅं, ठाड़ा साहब तथा हरि जी के बारे में भाई अतुल कनक ने काफी महत्वपूर्ण जानकारियॉं दी हैं, मैं उनका आभारी हूॅं।

कवि की कविता की आधार सामग्री उस का अनुभूत्यात्मक सच होता है। जहाँ वह अन्तर्मुखी होता है, वहाँ बाहर की दुनिया उस के आग्रह, उसे बाँध नहीं पाते हैं। ‘वह’, ‘स्व’ की खोज में ‘काँदे’ के छिलके उतारता-उतारता, उस परम सत्य की झलक पाने को, जिसे ‘विराट’ भी कहा जाता है, उस नन्हें शिशु की तरह उत्सुकता थामे, जो ख़ाली सीपियों में मोती तलाश करना चाहता है, सागर तट पर रेत में अपनी कोमल अँगुलियों से कुरेदता रहता है।  सच है, अन्तर्मुखता का प्रवेश द्वार यहीं प्राप्त होता है। यहाँ बहिर्मुखता का आकर्षण स्वतः छूटता चला जाता है। सांस्कृतिक काव्यधारा की यह एक प्रमुख विशेषता है।
‘मन की बातें’ आप का पहला कविता संग्रह था।


 नाथू लाल जैन ने ‘तरंगें’ 1991 ई. की भूमिका में कहा है:-
”‘तरंगें’ संग्रह के गीतों में स्वाभाविक रूप से ही अधिक प्रौढ़ता है, परिपक्वता है और आचार्य श्री शिलीमुख जी ने जिसे ‘शुद्ध हार्दिकता’ कहा, वह तो है ही, उस पर आध्यात्मिकता का वह रंग भी है, जो विप्रलम्भ के इन गीतों को भक्ति के बहुत समीप पहुँचा देता है। अब कवि के हृदय में अधिक गहरा आत्म-विश्वास है।“
और इस गहरे आत्म-विश्वास का कारण है:-
”मैं तुम्हारा नाम ले कर चल रहा हूँ
मैं तुम्हारा वेग ले कर चल रहा हूँ
राह मुझ को यों थका लेगी भला क्या?
राह को मैं साथ ले कर चल रहा हूँ
बस कि तुम अब राह से मुझ को लगा दो
तुम मुझे जीवन नया दो।“
”यहाँ अनुभूति की गहनता है, भाषा में सहजता है, कथ्य सहज स्फूर्त है, यहाँ विचार का न दबाव है, न आग्रह है, एक सहज अह-शून्यता है। सच है, जहाँ हीन भावना होती है, वहीं अहंकार होता है, वहाँ काव्य भाषा जटिल प्रतीकों तथा अभिव्यक्ति में उलझ जाती है। बलाघात वहाँ अधिक होता है। जटिलता काव्य गुण नहीं है, हाँ जटिल भावों की व्यथा भी सरल भाषा में व्यष्ति हो पाती है। यहाँ अनुभूति की सघनता तो है, पर वह स्वानुभव की तपिश में, अभिव्यक्ति तलाश कर रही है:-

”कि तुम ने यांे कृपा की कोर दे कर
बहुत झुक कर मुझे ऊँचा उठाया
कि तृण-सा रज-कणों में डूबता था
कि तुम ने फूल-सा सिर पर चढ़ाया
तुम्हारा आसरा मुझ को बड़ा है।
कि मस्तक आज चरणों में झुका है।“ ;पृ. 84.

दार्शनिक भंंिगमाऐं प्रायः ‘बुद्धि जन्य ज्ञान’ पर आधारित होती हैं। फ्ऱायड व मार्क्स के चिन्तन के आधार पर ‘इन्द्रिय जन्य ज्ञान’, काव्य वस्तु बनता है। वहाँ जीवन का यथार्थ, ‘इन्द्रिय जन्य ज्ञान’ हो जाता है। बहिर्जगत की यात्रा यहाँ चिन्तन का रस प्रदान करती है, पर जहाँ कविता, अनुभव की आँख से दुनिया देखना चाहती है, वहाँ हृदय खुलता है, यह करुणा की ज़मीन है, यहाँ प्रेम, साध्य रह जाता है।

”‘सत्य धरती, सत्य यह आकाश भी
सत्य ही सागर धरा के पास भी
एक हैं सब और सब साकार भी
दूर हैं सब और सब हैं पास भी
सत्य को देखंे भला आँखें कहाँ
सत्य ही यह सत्य का आभास है।
स्वप्न का संसार मुझ से दूर है
तथ्य जीवन का हृदय के पास है।“
श्रीनारायण वर्मा की कविता ‘साक्षित्व’ की उप सम्पदा है। आध्यात्म की दुनिया, रहस्यमयी है। वहाँ दार्शनिक की भंगिमा छूट जाती है। दर्शन का क्षेत्र, विचार का है, बुद्धि का है, विश्लेषण का है। प्रायः ‘आध्यात्मिक’ नाम पर ‘धर्म’, सम्प्रदाय की मान्यताओं, उन के चरित्र आख्यानों को सौंपा जाता है।
‘भागवत में ‘चीरहरण’ का प्रसंग आता है, जहाँ सारी अवधारणाऐं छूट जाती हैं, ‘नान कन्डीशन्ड माइन्ड’, कोई साम्प्रदायिक आग्रह नहीं रहता है। श्रीनारायण वर्मा इसी ‘अन्तर्यात्रा के पथिक हैं। ‘तुम’, इस अन्तर्मुखता का मनोहर प्रस्थान बिन्दु होता है। उस की पहचान, उस की मनोहारी कल्पना होती है, जितना उस का सान्निाध्य प्राप्त होता जाता है। उतना ही भीतर का कल्मष दूर होता है।
”यों ही तुम मेरे जीवन में अपना रंग लुटाते जाओ
और रजनियों की आभा में अपना रूप रचाते जाओ।“ ;पृ. 67.
यह ‘तुम’, ... यहाँ प्रीत का भण्डार है। यहाँ प्रेमानुभूति, अनुभूत्यात्मक जगत का सार है। यहाँं कविता जिस ‘सहज धर्म’ का वरण करती है, वह मनुष्यत्व का वाहक है। और यहाँ काव्य, जिस ‘संस्कृति’ को अपनी वाणी देता है, वह बाह्य कलेवरों को छोड़ती हुई ‘आत्मस्थ कवि की सहज स्वानुभूति’ है, जो सांस्कृतिक काव्य धारा की प्रमुख विशेषता है। छायावादी काव्य धारा का सहज विकास है।

गलती हमसे यही हुई है, कि हम परंपरा से कटते हुए , आत्म मुग्ध,  स्वयं अपनी ही सृजनशीलता को ही समर्पित होकर रह गए। हमारे आसपास कुछ अच्छा भी लिखा गया है, लिखा जा रहा है, हम उससे जुड़े , साहित्य का अवरुद्ध मार्ग गतिशील होगा , इसी आशा के साथ।

सोमवार, 18 नवंबर 2013

हमारे पुरोधा कवि और उपन्यासकार माधवसिंह दीपक

हमारे पुरोधा
कवि और उपन्यासकार माधवसिंह दीपक
मित्रों ने इस लेखमाला का स्वागत किया है, वे इसे पढ़ रहे हैं, अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, मैं उनका हृदय से आभारी हूूॅं। मेरा इस लेखमाला लिखने के पीछे आशय यही था, साहित्य के इस महायज्ञ मंे हमारी पुरानी पीढ़ी के वे लोग जो मौन साधना रत रहे, आज वे हमारे बीच में नहीं हैं,जिनके जाने केबाद हम अपने निजी स्वार्थोेे में  उन्हें भूल ही गए। उनके शताब्दी वर्ष भी निकल गए , हम याद भी नहीं कर पाए। उनके समकालीन अकादमी के पुरोधा भी रहे। वे उनकी स्मृति में मोनोग्राफ भी नहीं निकाल पाए, उनके लेखन को मित्रों तक पहुंचाना परंपराके निर्वहन में मेरे लिए यह साहित्यिक धर्म ही है। आज तो शोक सभा भी एक खानापूरी होगई है, जो मोबाइल की बातचीत से हो जाती है। सुबह के अखबार में सूचना छप जाती है।

खैर आज मैं जिस लेखक की चर्चा कर रहा हॅं, वे जीवन मैं लेखक ही रहे। झालावाड़ जिले में जन्मे श्री माधवसिंह दीपक , उच्च प्रशासनिक सेवा में दिल्ली में रहे। वे झाालावाड़ अपनी जागीर सम्हालने आते थे। उनका परिवार झालावाड़ में ही रहा। तब मैं राजकीय महाविद्याालय में हिन्दी प्राध्यापक था।  एक दिन सुबह मेरे घर पर वे आएथे। चूड़ीदार पायजामा अैर अचकन और सुंदर टोपी यही उनकी पहचान थी। उनकी हवेली पर भी गया था। जहॉ बहुत बड़ा निजी पुस्तकालय था। वे अंग्रेजी, हिन्दी तथा कुछ अन्य विदेशी भाषाओं के विद्वान थे। ‘सात सौ गीत उनके गीतांे का वृहद संग्रह था, ’ तलवार की छाया, बोलती लहरें, कर्नाटकी ,रेत की आग आपके उपन्यास थे। झाालावाड़ के मित्रों ने उनके साहित्य  पर बाद में परिचर्चा भी आयोजित की थी।

माधव सिंह ‘दीपक’ के तीन काव्य संग्रह ‘सात सौ गीत’ 1959 ई., ‘लावण्यमयी’ 1959 ई. तथा ‘बलभद्र प्रकाश’ 1960 ई. प्रकाशित हुए थे। उन के पितामह श्री बलभद्र सिंह भी कवि थे, ‘बलभद्र प्रकाश’ खण्ड काव्य उन की ही स्मृति में लिखा गया था। ‘लावण्यमयी’ तीन सौ गीतों का संग्रह है ।

माधव सिंह ‘दीपक’ की कृति‘सात सौ गीत’, सात भागों में विभाजित काव्य संग्रह है, ‘ज्योति’, ‘पिपासा’, ‘लो हम भी हंसे’, ‘कसौटी’, ‘प्रेयसी की याद में’, ‘निर्झर’ एवं ‘मांझी’। प्रत्येक भाग में सौ-सौ गीत हैं। हर भाग के पूर्व में कवि ने संक्ष्प्ति में इन की प्रस्तुति के सन्दर्भ में अपना वक्तव्य भी दिया है।

‘माँझी’, विरह काव्य है। इसे खण्ड-काव्य भी कहा जा सकता है। छायावादी काव्य चेतना का प्रभाव ‘अमर सिंह’ व ‘माधव सिंह दीपक’ में स्पष्ट परिलक्षित होता है। कवि सुधीन्द्र की काव्य चेतना पर भी प्रभाव मिलता है। किन्तु माधव सिंह ‘दीपक’ ने छायावादी मूल्यों को अपनी तरह से ही आत्मसात किया था। अंग्रेज़ी भाषा पर उन का अधिकार था।
‘मांझी’ को कवि ने स्वयं भी खण्ड काव्य माना है। यह एक छोटा-सा विरह काव्य है। कवि ने अपने काव्य को अपने जीवन की यात्रा के रूप में सम्प्रेषित किया है, यह जीवन का आख़िरी पड़ाव है। वह भौतिक विश्व से परे, ‘उस पार’ जाने की कल्पना करता है, वहाँ उसे सुख मिलने की आशा है। केवल माँझी उस के साथ है, जो उस की नाव को खे रहा है:-
”मांझी! कुछ गाते भी जाओ।रोते हो फिर भी मुस्काकर, धीमे-धीमे स्वर में गाकर,
रह-रह कर मुझको आज, याद दिलाते भी जाओ।“ पृ330
नौका डूबने लगती है। उस पार पहुँचने की निष्फल चेष्टा में डूबता उतरता हुआ वह कहता है:-
”वह किनारा दूर ही है।
हाय मांझी! क्षुद्र मानव तो यहाँ मजबूर ही है।“ पृ. 367.

कवि के हृदय पर यही सब से बड़ा घाव है कि वह अपनी यात्रा में सफल नहीं हो सका:-
”वास्तव में मेरा जीवन भी इस संसार रूपी सागर में एक तिनके की भांति लहरों की इच्छा पर नाच रहा है।“ पृ. 326.

”सांसें लेते हैं, अब भी हम, बातें करते हैं अब भी हम
मरने से पहले आखिर इतने, सब क्यों हाय डरे बैठे हैं।“ पृ. 356.
और अन्त में:-
”कौन पहुंचा है, वहां मुझको प्रमाणों से बताए
आज अपरम्पार सागर, पर निशानों से बताए
हाय मॉंझी! क्षुद्र मानव, तो यहाँ मजबूर ही है।“

सौ गीतों में यह काव्य, बिना पूर्णता लिए अचानक समाप्त हो जाता है। जीवन की, अचानक आखिरी सांस की तरह। ये सात सौ गीत, नवयुवक की चहल क़दमी, उस के यौवन, उस के जीवन संघर्ष तथा ‘हास परिहास’ से गुज़रते हैं, जिस का समापन, जीवन की अन्तिम सान्ध्य वेला के साथ होता है:-
कवि दीपक, कवि ही थे। वे और उन की कविता एक रस हो गए थे। उन्हों ने काव्यानुभूति को जीवन में जिया। समीक्षकों ने, अचानक परिवर्तित काव्य रूपों तथा उन के प्रतिमानों के आधार पर, पूर्व की परम्परा को ही हाशिए से भी निष्कासित-सा कर दिया। सांस्कृतिक काव्य धारा के दो रूप होते हैं, पश्चिमी परिभाषा में संस्कृति बाह्य जीवन की अभिव्यक्तियों को प्रदर्शित करती है। हम वहाँ इस आधार पर समाजशास्त्रीय व्याख्या करते हैं। यह परिभाषा बहुत कुछ ‘सभ्यता’ के साथ मिलती हुई, बुद्धिजन्य ज्ञान के स्वरूपों से मिल जाती है। परन्तु भारतीय परम्परा में संस्क्ृति, अनुभव जन्य ज्ञान पर आधारित होती है। संस्कृति की ज़मीन पर ही धर्म का वृक्ष लगता है। धर्म जो परम्परा में मनुष्यत्वको सौंपता है। प्रायः सम्प्रदाय को धर्म मान कर जो व्याख्या की जाती है, उस से सारा अभिप्राय दूषित हो जाता है।
यहाँ सांस्कृतिक चेतना, समस्त अवधारणाओं से मुक्त होेते हुए अन्तर्मुखी मन की अभिव्यक्ति है। मृत्यु भयभीत नहीं कर रही है, वह भी एक पड़ाव है, भागीरथी में स्नान है, यहाँ ‘मृत्यु गन्ध’ चिकित्सालय से आती हुई दूषित समीर नहीं है, वरन पतझड़ के बाद वसन्तागमन की सूचना है। ‘माँझी’ ही साथ है, वह विवेक है, वह उर्जा है, जो जीवन को आख़िरी साँस तक चला रही है। जीवन के प्रति सकारात्मक सोच तथा उदात्त मानव के चरित्रकंन का यह सारगर्भित प्रयास है।

”बह जाने की आशंका है, लहरों में इत- उत घबराकर
सह जाने की स्पर्धा है, क्या तुममें इनसे टकराकर,
घनघोर गरजते मेघों के, आगे थोडे़ से झुक जाओ“  माँझी, पृ. 347.
कवि दीपक की अपनी काव्य भाषा है, वे सहज प्रवाही भाषा के पक्षधर हैं। संग्रह में चयन की जो कमी रही है, उस ने कृति के सम्यक मूल्यांकन से समीक्षकों को दूर ही रखा है। सुधी समीक्षकों का ध्यान माधव सिंह दीपक की ओर भी जाना अपेक्षित है।


उपन्यास कार मधावसिंह ‘दीपक’ ऐतिहासिक उपन्यास कार थे। झालावाड़ अंचल की गागरेन दुर्ग की घटनाएं ,जौहर एवं   युद्ध ने जहां कथावस्तु का निर्धारण किया हैं वहीं अपने अंचल की भाषा को एक नया विस्तार भी दिया है।‘अचल दास की खींची’ की वचनिका से कथा सूत्र प्रभावित तो है, परन्तु कल्पना के मनोहारी प्रभाव ने इतिहास को सीमित नहीं होने दिया है।

 माधव सिंह दीपक के चार उपन्यास प्रकाशित हुए हैं । ‘ बाोलती लहरें‘, तलवार की छाया, रेत की आग, कर्नाटकी प्रकाशित हुये है ।

‘‘बोलती लहरें,’ गागरौन दुर्ग पर आधारित काल्पनिक कथा है । वर्णनात्मक शिल्प है । जातिगत विद्वेष केा केन्द्र में रखकर इस समस्या के समाधानन ढूंढने का प्रयास है ।

 भाषा सहज व प्रभावी है, परन्तु किस्सागोई की शैली में कथा सामान्य पाठकको आकर्षित करने में सफल है । पात्र अनेक है, प्रमूुख पात्र ‘कमलिनी और ‘ गुलाब सिंह हैं, जिनकी प्रेमकथा को कथाकार ने विकसित  किया है ।

‘ ‘तलवार की छाया ‘, यह राजा राणा जालिम सिंह के जीवन पर आधरित, ऐतिहासिक उपन्यास है । इसमें ‘दीपक जी‘ ने कल्पना प्रसूत कथा के स्थान पर, ऐतिहासिक तथ्यों को कथा में पिरोने का प्रयास किया है। नायक ‘ प्रधान यह उपन्यास अपने वर्णनात्मक शिल्प व सहज प्रभावी भाषा के लिए लोकप्रिय रहा है । ‘ भटवाड़े ‘ के युद्ध से लेकर, पृथक झालावाड़ राज्य की स्थापना, 80 वर्ष तक फैला हुआ ‘ समय ‘ यहां उपस्थित है ।

‘रेत की आग‘,
यह भी ऐतिहासिक उपन्यास कम, तथा कल्पना पर आधारित ऐतिहासिक ‘ रस ‘ का उपन्यास है । यहॉं कथाकार ने जोधपुर और जालौर के इतिहास की घटनाओं को ‘ कथा-रूप ‘ में विकासित करने का प्रयास किया है ।

‘कर्नाटकी‘, उपन्यास भी इसी क्रम में है । यह बूंदी के राजा बुद्ध सिंह के जीवन पर आधारित है । दीपकजी ने कथा का फलक तो विस्तृत लिया है, परन्तु सीमित दायरे में समाप्त करने की विवशता में उपन्यास उतने प्रभावी नहीं रहे ।

जीवन और जगत का स्वाभाविक और मार्मिक चित्रण.... कथाकार अपनी और से ही करने में रहा ... पात्र, ‘चरित्र में नहीं ढल पाए, परिवेश, इतिहास की प्रस्तुति नहीं कर पाया, वहॉं कल्पना पर आधारित कथा,... विकसित की जाती रही । शिल्प की कसावट, सुसंगतता का अभाव इन उपन्यासों की बहुत बड़ी कमी रही है । फिर भी दीपक जी ने इस अंचल में ‘ उपन्यास कला ‘ का ‘विकास ‘ लज्जाराम मेहता के बाद किया, यह उनकी बहुत बड़ी देन है ।

कवि और उपन्यासकर दीपक जी साहित्य के मौन साधक थे। वे साहित्य की गुटबंदी से बहुत दूर थे। स्वतंत्रतापूर्व झालावाड़ साहित्य का तीर्थ था। ब्रज भाषा अकादमी के निर्माण के साथ हमने महाकवि हरनाथ को ही विस्मृत कर दिया है। उनकी काव्य परंपरा में ही श्री दीपक विकसित हुए थे।  महाकवि हरनाथ को भी हम  पूरी तरह भूल चुके हैं।

कुछ दिन पहले मित्र कहीं कह रहे थे , हमारे जाने के बाद हमारे साहित्य को और हमे ंकौन याद रखेगा , इसका उत्तर यही हैं, हम आत्ममुग्ध नहों , परंपरा के दाय को सम्हालते हुए अपनी साहित्यिक यात्रा पर चलते रहें , मार्ग अवरुद्ध न हो बस यही काम करते रहें।