शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

भूले बिसरे चित्र नगेन्द्र कुमार सक्सेना -

भूले बिसरे चित्र
नगेन्द्र कुमार सक्सेना -

1971  में मेरी  पहली आलोचना की पुस्तक ”गत दो दशक के काव्य में राष्ट्रीय चेतना प्रकाशित हुई थी। तब श्री नंदन जी के साथ सक्सेना जी से मिलने गया था। यह आपसे मेरी पहली मुलाकात थ। आप तब महात्मा गांधी हायर सैकंडरी स्कूल रामपुरा में प्रिंसपिल पद पर कार्य कर रहे थे। आपका साहित्य के प्रति प्रेम आपकी बातचीत से लगाा था। बाद में मैं बाहर सेवारत रहा।

 1997 में जब कोटा आया था, तब आपसे दुबारा संबंध नवीनीकृत हुआ। आप सेवानिवृत्ति के बाद सक्रिय रूप से साहित्य में सक्रिय हो चुके थे। आपके  कविता संग्रहों की बाढ़ सी आ गई्र थी।ं आपने बहुत लिखा, शांति भारद्वाज कहा करते थे, आपका गद्य , आपकी कविताओं से बेहतर हैं आप अच्छे वक्ता थे, संगीत में रुचि थी। आपने अपनी पत्नी के सहयोग से संगीत की सेवा  के लिए , एक संस्था  बनाई थी। जिसमे आप संगीतकारों के सम्मान के साथ , साहित्यकारों का सम्मान किया करते थे। आपके घर पर नियमिज काव्य गोष्ठियॉं हुआ करती थीं। आप स्वयं फोन करके , दूरभाष पर निमंत्रित किया करते थे। कोटा जंक्शन पर आपकी साहित्यिक सक्रियता मूल्यवान थी। आपका निवास साहित्य का केन्द्र बन गया था। जीवन के अंतिम समय में आप पुत्र के साथ उदयपुर चले गए थे। वहीं से ही सूचना आपके महाप्रयाण की मिली थी। समय का चक्र बहुत तेजी से चलता है। मुझे याद नहीं , उनके जाने के बाद किसी गोष्ठी में आपको हमने याद भी किया हो। वे बहुत बड़े कवि नहीं थे, निबंध कार नहीं थे। पर सहृदय पाठक थें । निरंतर अपनी उपस्थिति का अहसास हर साहित्यिक कार्यक्रम  में बनाए रखते थे। उनकी साहित्य और संगीत के प्रति  तीव्र अभिरुचि उन्हें ं सांस्कृतिक चेतना के वाहक के रूप में स्मृति में बनाए रखती है।

अनुभूति’, ‘सत्यमेव जयते’, ‘जीने की सरगम’, ‘समय के स्वर’, ‘शब्दसृष्टि’, ‘दशानन’, ‘स्वांतसुखाय’, ‘नीलगगन के तले’, ‘अदर्शन का दर्शन’, ‘अस्तित्व का प्रवाह’, ‘आनंद स्रोत, ‘अंतःस्वर’, ‘नए सूरज की किरण’ तथा ‘अंतर्प्रवाह’ आप के महत्वपूर्ण काव्य संग्रह हैं। आप के अठारह के आस-पास काव्य-ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं।

नगेन्द्र कुमार सक्सेना के 1.राष्ट्रीय एकता के सांस्ड्डतिक सूत्र 1988 ई. 2. लोकमान्य से लोकनायक तक 1994 ई., 3. आदि से अन्त तक 1995 ई., 4. भारतीय सांस्कृतिक चेतना 1999 ई., 5. भारतीय लोकतन्त्र की अर्र्द्ध शताब्दी 2001 ई., 6. सुखी जीवन के सूत्र 2002 ई. 7. जीवन मूल्य 2003 ई., 8. सफल जीवन की पूर्णता ;2003 ई., तथा 9. शाश्वत सत्य 2005 ई.  नौ  आलेख संग्रह प्रकाशित हुए हैं।

नगेन्द्र कुमार सक्सेना की सनातनी धार्मिक दृष्टि है, जो संस्कारित है। वे अपनी विचारधार्मिता को स्पष्टता से लिए हुए हैं, उन के चिन्तन केन्द्र में, परिवार में विकसित होता हुआ व्यक्ति है, जो मनुष्यत्व को पाना चाहता है। एक दृष्टि में उन की आध्यात्मिकता तथा सांस्कृतिक-चेतना सम्पन्न दृष्टि, उन की विचार धारा को जहाँ पल्लवित करती है, वहीं विकसित भी करती है।

‘लोकमान्य से लोकनायक तक’, ग्यारह निबन्धों में, राष्ट्रीय चेतना के उन्नायक राष्ट्र नेताओं का स्मरण है।
‘सुखी जीवन के सूत्र’, ‘सफल जीवन की पूर्णता’, ‘जीवन मूल्य’, ड्डतियों के निबन्धों में नगेन्द्र कुमार सक्सेना की पारिवारिक मूल्यों के विघटन से चितिन्त एक पथिक की वेदना की दस्तावेज़ हैं।
‘शाश्वत सत्य’, बारह निबन्धों का संग्रह है। ये विचारात्मक निबन्ध हैं। ‘ईश्वर की अवधारणा’ तथा ‘आनन्दानुभूति’ एक साधक की यात्रा का साक्षित्व है।  यही नगेन्द्र कुमार सक्सेना की अपनी विशिष्टता है। आपका गद्य लेखन पठनीय है। उसका एक विशिष्ठ पाठक वर्ग  है।

उनका कवि मन छायावादोत्तर काव्य प्रभावों से विकसित हुआ हैं

”छा गयी, काली घटायें
पलक पर पावन बसा है, मौन स्वर निर्घोष करते।

समर्पित किया है, तुम्हें जबसे मैंने
मेरे रात और दिन महकने लगे हैं ।
मन के विपिन में विचरते जो पंछी
मलय गंध पाकर चहकने लगे हैं।“

आप की कविताएँ, समसामयिक परिस्थितियों से आहत एक नागरिक की मनोव्यथा है। आक्रोश उन के कवि-मन को सदा बेचैन करता रहा है। समय के स्वर की यही विवशता है। समसामयिकता का दबाव आप की कविताओं की प्रारम्भिक अन्तर्वस्तु है। ‘दशानन’ भी इसी प्रवृत्ति का ही विकास है। परन्तु कवि मन जहाँ सामान्य नागरिक की भूमिका में समसामयिकता की मातृ-भूमि को अंगीकार करता है, वहीं उन की अन्तर्मुखता उन्हंे रहस्य की ओर ले जाने का प्रयास करती है। यह द्वन्द्व कवि नगेन्द्र की कविताओं का प्रमुख स्थान है। वे बाह्य के दबावों से पीड़ित होते हुए भी अपने ‘स्व’ की सार्वभौमिक रसात्मकता को नहीं छोड़ पाते हैं। उन का मन, अन्तःसलिला में पुनः पुनः लौट कर रसानुभूति की मधुरम फुहारों को, शरद के लौटते हुए मेघों की तरह अनायास बरसा कर चला जाता है। यही कारण है कि ‘जीने की सरगम’ में पुनः वे छयावादोत्तर काव्य सम्वेदना से जुड़ जाते हैं। उन का रहस्य के प्रति सम्मान और उस से प्राप्त अन्तर्मुखता उन की काव्य सम्वेदना को क्रमशः परिमार्जित करती रही है।
समसामयिकता का दबाव जहाँ उन की अभिव्यक्ति को कहीं-कहीं अत्यधिक स्थूल व सपाट बयानी तक पहुँचा देता है, वहीं उन की अन्तर्मुखी अभिव्यक्ति, परिष्कृत काव्य भाषा और अन्तर्मन पर कार्य व्यवहारों का सूक्ष्म चित्रात्मक अप्रन सहज ही सौंप जाती है।
अन्तःप्रवाह में आप ने इसी अन्तर्यात्रा के विभिन्ना अनुभवों को अभिव्यक्ति दी हैः-
”अंतःप्रवाह जो उमड़ता वेगवान गति से साकार
तट के मल विक्षेप आवरण पा जाते शुद्ध संस्कार।’
यहां पर कवि का मन उस अतीद्रिय आलोक में विमुग्ध हो उठता है जब वाणी ‘वैखरी’ से ‘मध्यमा’ को पार करती हुई ‘पश्यन्ति’ के द्वार पर साधक में मन को चुपचाप दस्तक दे जाती है।
‘अब लगता है जीवन सार्थक है,
वे मेरे है और मैं उनका हूँ।
वाणी विचार तनमन में गहराए,
एकाकार हो गए, रस बरसा कर।’
कवि नगेन्द्र ने जीवन के उत्तरार्द्ध में लिखना तथा प्रकाशित कराना प्रारम्भ किया था।  कालान्तर में उन की कृतियाँ काव्य सौन्दर्य से हटती दिखाई पड़ती हैं। कविता उन के लिए एक लयात्मक सम्वाद ही बन कर रह गई थी। दयाकृष्ण विजय के बाद सर्वाधिक काव्य संग्रह आप के ही प्रकाशित हुए हैं।
संख्या की दृष्टि से कवि नगेन्द्र के कविता संग्रह अपने आप में जहाँ अभूतपूर्व हैं, वहीं सहृदय सुधी पाठकों के लिए आदर योग्य हैं। उन्हों ने कविता के प्रति प्रेम, एक शिक्षक की तरह अपने आस-पास, हमेशा काव्य संग्रहों को पाठकों को भेंट में देने में सँजोए रखा। वे एक सुसंस्कृत उदात्त  सहृदय गृहस्थ थे। कविता के लिए उसके आराधक कवि की सम्ृति ही सबसे बड़ी प्रार्थना है।

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

भूले बिसरे चित्र रमेश चन्द गुप्त

भूले बिसरे चित्र

रमेश चन्द गुप्त

मैं जब सेवानिवृत्ति के बाद जब कोटा आया था, तब किसी कवि गोष्ठी में पहलीबार गुप्ताजी से मिलना हुआ था। अत्यधिक विनम्र तथा संवेदनशील कवि थें उन्होंने ही बताया था कि वे सेवानिवृत्ति के बाद ही काव्यजगत में आए थे। उनका कंठ मधुर था। वे तन्मयता से गीत पढ़ते थे। अस्वस्थ रहते थे। हर बार यही कहते थे, ईश्वर की कृपा हुई तो फिर मिलना होगा।
उनकी सरलता और गीतात्मक अभिव्यक्ति का मुझ पर प्रभाव था, जब वे कविता पाठ करते थे, तब मैं उनके शब्दों के साथ उनके भावजगत में खो जाता था। मैं उनके जाने के बाद उनको भूल ही गया था कि कोटा में प्रेस क्लब में जब नंद बाबू को श्रद्धांजलि दी जारही थी , तब इन्द्र बिहारी जी ने अवगत कराया था कि आज जल्दी जाना है, जंक्शन पर गुप्ता जी की पुण्य तिथि मनाई जा रही है, अचानक गुप्ताजी की स्मृतियॉं समीप आगई्रं।
कोटा के साहित्यप्रेमी तो उनसे परिचित थे , पर बाहर भी मित्र उनकी कविताओं से परिचित हो सकें , यही आशा  है। आपके दो काव्य संग्रह प्रकाशित हुए थे। आपके निवास पर अक्सर कवि गोष्ठियॉं होती थीं, जहॉं जंक्शन पर मित्रों से मिलना हो जाता था।
‘गीत जाह्नवी’ (2002 ई.) रमेश चन्द गुप्त की कविताओं का संग्रह है। रमेश चन्द गुप्त सांस्ड्डतिक काव्य धारा के कवि हैं। वे सुमधुर गीतकार हैं, तन्मयता से गीत गाते हैं। उन की भाषा सरल, सहज व प्रभावोत्पादक है। छन्द वैशिष्ट्य उन का अपना है। राग, छन्दों में समादृत हो कर स्वतः विस्तृत होती है। भाषा आम जन की है, पर शब्दार्थ की रमणीयता उन की विशिष्टता है।
यहाँ जन, मनुष्यता  की  पीर  का  वाहक  है। वह  ‘स्वयं’  सेवार्थी  है। यहाँ  करुणा  मात्र  सम्वेदना  की  वाहक नहीं है,  वह  ‘कर्मरत जीवन’  को  समर्पण  के  लिए प्रेरित करती है:-
”चुन सको तो चुनो, बन्धु ऐसी डगर
जो निहारा करे नित्य गन्तव्य को,
जहां कर्म का लक्ष्य निर्मल नहीं
निरर्थक हुआ हाय, जीवन मरण।
अत्यन्त  संक्षिप्तता  में, काव्य भाषा सूत्रात्मक हो जाती है। ‘शब्द’ स्वतः सहज गेयता मंे, अपने लक्ष्य को सम्वेदित करने में समर्थ हैं। पर यह सपाट बयानी नहीं है।
”स्नेह और बन्धुत्व भूमिगत
जीवन के विश्वास खो गए
मर्यादाएं शिष्ट आचरण
अब तो बस इतिहास हो गए।
‘भूमिगत’  शब्द, व्यंजना में, आज की भौतिकवादी सामाजिक संरचना के समस्त विद्रूप को सरलता से पर्त-दर-पर्त खोलता जाता है।
”शोषक औ शोषित का शाश्वत
वैरभाव चलता आया,
नेह नहीं हो सकता भोली
मछली का मछुआरों से।“
वर्ग वैषम्य की आधार शिला और उस के द्वन्द्व को, जहाँ जनवाद प्रतिवाद, प्रतिकार, प्रतिशोध की भाषा सौंपता है, वहाँ रमेश चन्द गुप्त, विवेक की भूमि पर, सामर्थ्य का सदुपयोग कर के, कर्मरत जीवन को वरेण्यता सौंपते हैं। रमेश चन्द गुप्त, ? मैथिली शरण गुप्त की विस्मृत काव्य धारा, शब्दावली व रूप विधान का आभास, याद दिला जाते हैं। जो गेयता के कारण ‘जन काव्य’ बन गई थी।
‘मुट्ठी भर मधुमास (2006 ई.), गीतकार रमेश चन्द गुप्त का दूसरा काव्य संग्रह है।
रमेश चन्द गुप्त, सांस्कृतिक काव्य धारा के कवि हैं। उन के ‘काव्य रूप’ तथा ‘काव्य वस्तु’ अपनी ज़मीन की उपज हैं। वे जहाँ ‘मनोजगत’ में अपने शब्दों का आधार तलाश करते हैं, वही बाह्य जगत की विसंगतियों से आहत हो कर, उस पीड़ा को सार्वकालिक व सार्वभौमिक बनाने का प्रयास भी करते हैं:-
”पन्थ है अवसाद बोझिल
और घायल है चरण।
कामना के कल्प तरु का
पर नहीं बन्ध्याकरण।“
‘कामना का कल्प तरु’, पृ. 37.
यहाँ व्यक्ति-मन की पीर, अचानक जब निर्वसना हो जाती है तब ‘व्यक्ति मन’, ‘समष्टि मन’ में परिवर्तित हो जाता है:-
”सभ्य जगत में मर्यादा का
बजता रहा सदा इकतारा
लोकतंत्र के गलियारों से
पर संयम-संकेत खो गए।“1 ‘बुनते-बुनते’, पृ. 94.
रमेश चन्द गुप्त की ‘काव्य भाषा’ प्रसाद मयी है, इस में लालित्य है। छन्द में एक स्वाभाविक गति है। यहाँ शब्द क्षिप्र गति से प्रवाहित नदी की शान्त लहरों की तरह तट को छूते हैं। सहज स्वभाविकता, तथा मन्थर गति, उन की काव्य रचना की अपनी विशिष्ट पहचान है। अनुकरण तथा अनुकरण से दूर कवि गुप्त की कविता में जहाँ अनुभूतियों का विरल संगुफन है, वहीं अभिव्यक्ति के स्तर पर मधुरतम सूत्रात्मक भाषा की खोज, उन की कविता का अपना सौन्दर्य है।

आज कवि गोश्यिों में कृत्रिम अट्टहास तथा ”अपना पढ़ा और चुपचाप चलते बने“ की परंपरा विकसित होगर्इ्र है, वहॉं  रमेशचंद्र गुपत की स्मृतियॉं एक सुगध मय हवा का स्पर्श करा जाती हेैं ।

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

भूल बिसरे चित्र अरूण सैदवाल


भूल बिसरे चित्र


अरूण सैदवाल 

अरुण सैदवाल झालावाड़ जिले के रहने वाले थे। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की सहयोगी  सेवा डिफेंस एकाउन्ट्स में चयनित होकर देहली चले गए थे। वे अर्थशास्त्र में प्रारम्भिक वर्षों  में प्राध्यापक भी रहे थे। मेरे मित्र प्रीतम चोयल के पुत्र से उनकी बेटी का विवाह हुआ था। उस विवाह में ही उनसे मेरा परिचय पहली बार हुआ था। वे सेवानिवृत्ति के बाद कोटा आगए थे। विकल्प की काव्य गोष्ठियों में उनके कवि रूप से परिचय मिला था। वे उच्च प्रशासनिक सेवा से आए थे , पर वे इसका अहसास किसी को होने नहीं देते थे उन्होंने प्रेमजी प्रेम की राजस्थानी कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया था। बच्चों के लिए एक विज्ञान कथा भी लिखी थी , जो चिल्डरन बुक हाउस से प्रकाशित हुई्र थी। वे जीवन के अतिम दिनो में हाड़ौती शब्द कोश पर कार्य कर रहे थे। उनका प्रोजेक्ट मैसूर की किसी संस्था से स्वीकृत हुआ था। उन्होंने कोटा में एक कार्यशाला भी आयोजित की थी। विकल्प संस्था की ओर से प्रकाशित अभिव्यक्ति के अंक में हितेष व्यास ने उन पर आलेख लिखा था।


अरूण सैदवाल के अविकल्प (1979) तथा करवट लेता समय (2003) प्रकाशित हुए हैं। उनकी कविताओं की एक काव्य पुस्तिका भी विकल्प ने प्रकाशित की थी। जिसका संपादन अंबिका दत्त ने किया था।
 

सैदवाल, की कविता, महानगर में अपनी पहचान तलाशते उस नागरिक की व्यथा-कथा है जो संपूर्ण जिम्मेदारियों के वहन करने के बावजूद पाता है कि वह अपनी अस्मिता को, खोता जा रहा है,... झील में डूबते हुए... उस व्यक्ति की छटपटाहट जो हर तिनके को सहारा पाकर, तट पर आना चाहता हैं... शायद थोड़ा सुकून वह पा जाए,... मार्मिक मनः स्थितियां तथा पारदर्शी भाषा, ... हर पल तेजी से कैनवास पर बिखरते रंगों से संगफझन की चाहत में उपजते दृश्य बिम्ब, उनकी कविता की अपनी विशेषताएं है-

‘‘ अब मैं चुपचाप उनकी
साजिशों में शामिल होने लग गया हंू।
दोस्त ठीक ही कहते हैं
अब मेरे पेट की चर्बी 
और चेहरे की चमक बढ़ने लगी है...
‘काम का आदमी’ पृ.11

झटका या हलाल
दोनों में से किसी एक मौत को
चुनने की
मुझे पूरी आजादी है
यह विकल्प भी है
मेरे ऊपर की गई
कितनी बड़ी मेहरबानी है
(विकल्प)

डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने ‘करवट लेता समय’ के पुरोवाक में उनकी काव्य प्रक्रिया पर जो टिप्पणियां दी है, वह विवेचनीय है- ‘वे साधारण-सी स्थितियांे को अपने अनुभव-संसार का हिस्सा बनाते हैं और फिर उसे एक सार्वजनिक से अनुभव में डाल देते हैं। ‘स्व’ से ‘एकदम’ पर की दुनिया की प्रतीती शब्दों के स्तर पर नहीं हो सकती।... परन्तु ‘सैदवाल’ एक सहज सृजन कर्मी की तरह उसका सजग और संयत इस्तेमाल करते हैं।

डॉ. कलानाथ शास्त्री ने, कृति की समीक्षा में (मधुमती जून 2004) कहा है कि -“संकलन, करवट लेता समय’- जिस एक शब्द से भी परिभाषित किया जा सकता है, वह शब्द है, ‘वैविध्यमय’। इसमें कथ्य और शिल्प की विविधता तो है ही भाषा वैविध्यमयी है... साधारण सी साधरण स्थिति भी कवि की व्यंजना का स्पर्श पाकर, जिस दृश्य बिम्ब को सघनता में अभिव्यंजित कर देती है,... वह भाषा गत योजना कवि की अपनी है ।”

“देखिएगा
कुछ बरसों बाद
पहले आएगी खबर,
बाद में होगी घटना
वह दिन दूर नहीं
जब इंटरनेट पर देख लूंगा
मैं अपनी मृत्यु का समाचार
और अगले दिन पाएंगे
लोग मुझे मुरदा।” (समाचार-पृ. 70

तमिल के उपन्यासकार मुरुगन ने यही तो किया हें इंटरनेट पर लिखा है, उपन्यासकार मुरुगन नहीं रहे , शिक्षक मुरुगन जीवित है। साहित्यकार की इसी व्यथा को सैदवाल ने अपने शब्द दिए थे।

...वह साधारण सी स्थित का चयन करता है... वह उसकी अनुभति का स्पर्श पाकर,... एक वृहद आयाम को सौंप जाती है... काव्य भाषा में यह सांकेतिकता.. संक्षिप्तता तथा तरलता यहां दृष्टव्य है-
‘मेरे पास है सिर्फ़
एक आवाज
हो सकता है
तुम्हारे काम आए।

सैदवाल कविता प्रेमी थे। अंग्रेजी , हिन्दी , हाड़ौती पर उनका अधिकार था। पता नहीं क्यों हम अपने सीमित दायरे से बाहर नहीं झांक पाते। वे केन्द्रिय प्रशासनिक सेवा से वर्षों बाहर सेवारत रहकर अपने घर आए थे,  वे अपने आपको कविता को समर्पित करने के बाद भी मित्रों से दूर ही समझते रहे। प्रेमजी प्रेम की हाड़ौती  कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद उनका अंचल के प्रति प्रेम था। पता नहीं क्यों , हम जो अभी- अभी हमारे बीच से उठकर गया है, इतनी जल्दी उसे भूल जाते है।

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

मन वृन्दावन

         मन वृन्दावन

माँ, नदी थी, तट था और था मैं,  दिख रहा था दूर से
डूबता सूरज, पृथ्वी का मिलन आकाश से
तुमने कहा था कुछ नहीं
बस उठी थी वह भुजा हाथ में जिसके था खड़ग
और पांव के नीचे दबा था वह असुर,
सिंह वाहिनी....उस सिंह से भयभीत ‘‘मैं’’ था सोचता,
क्या असुर वध के लिए था जरूरी सिंह का होना....?

रूप तेरा, लपलपाती जीभ,हाथ में खप्पर,
रक्त में स्नान कर आ गई हो...

उस क्षितिज के पार, तट कालिंदी किनारे
दौड़ती रंभाती फिर रहीं गायें
हाथ में बंशी लिए वह ‘‘कान्ह’’
माँ,... ढूंढ़ता तुझको,
जो सहारे कदंब के नीचे थी खड़ी
आरक्त पद नख से धरती को टिकाए...वह गोपिका,

रोम रोम स्पंदित तन-मन ,गूंज रहा था नाद
कुंकुमी आकाश, मांग मानो भर गई हो,
या उड़ चला आकाश, होलिका दहन की आग,
उस शीतल आग में, वस्त्र मानों जल गए हों,

क्या रहा था शेष, जब कषायों से सजी यह देह
हो चुकी निःशेष, रंगों से नहायी
थी सखी ललिता, कर रही थी नृत्य चिन्मय,
शब्द... खो गए आधार, अर्थ...बस बेबस
वाक्, पार अपरा के, परा की कोख में हो मौन।

मात्र सौरभ, जल उठा उपवन
आम्र मंजरियों के अचानक जागने से या खिल उठी चंपा या मालती
कुछ ना असंभव उस छोर पर
गंध ने दे दिया सब कुछ

वाक् ने चुपचाप लिया और पी लियावह रस,
दृष्टि का जो भेद था, रंग का रूप का कुल गोत्र का जाति का
नहीं था शेष।

सखी ललिता थी वहां, और नहीं था कुछ
हवा चुप थी, जो साथ था ,वह मौन था,
और था वहां वह कुछ जो था अरूप....।

उतरा शीश से ले साथ अलकनंदा, भगीरथ चाह को
हिमालय रौंदती वह बह चली, अपनी डगर पर
कुछ मांगती ,कुछ छोड़ती शिव धाम को, स्पर्शित-
जगत की कामना और थी वह चाह ,पार जाने की जगत से,
था वहां पर जगत अपनी सार्थकता ले,
वहाँ उतरी ,वह वेग, मानो सब बह गया हो।

त्रिनेत्र था, वह जो जगा, पर शांत था
नहीं था ‘‘पर’’ वहाँ ,वहां मात्र वह था,
मात्र वह ,जो वह एक था,

माँ...  सचमुच तुम वहां थीं, तुम वहाँ थीं
मुझमें समायी, दूर मुझसे
बात करती और हँसती ,पास रहती दूर जाती,
मैं जो चला था वह नहीं था, वह कुछ और था।

और दिखा था दृश्य वह माँ नहाती तुम
और सागर की उफनती उद्दाम लहरें
वक्ष को छू रही थीं, स्तंभित दिशाऐं
उठती थीं भुजाऐं इस ओर से उस ओर तक
था दिखा वह पथ ,जहाँ से सृष्टि जगती और सोती
माँ, सिर्फ तुम वहां थीं,

तुमने दिखाया वह, आना और जाना
सखी ललिता का
आकाश से उतरी गई, आकाश में ,आकाश...
उसके सिवा था कुछ नहीं ,जो बचा आकाश
जो रहा आकाश,  आकाश में आकाश था
आकाश से आकाश था, आकाश में था,  मैं,  जो पात्र था
सखी ललिता भी, जो हँस रही थी, दोष था मेरा
मेरे वसन का, मेरे गात का, कल्मष उसी को दे दिया था
वह नहायी और सजकर उस गात से, जो कि मेरा था,

और दिखा वह धाम
जब शब्द वीणा से हुआ गंुजार भ्रमर नाल पर
बैठे थे पितामह और देखा वे तुम्हें करते नमन थे, तुम उन्हें,
यह दृश्य मैं भूला नहीं था,
हाँ, ‘‘अहम्’’ ही था कमलदल
जहां पितामह रच रहे संकल्प थे
ब्रह्म नाभि से उपजा वह ‘‘अहम्’’
ले प्राण का आधार, ब्रह्माण्ड को पुलकित किए
था दे रहा था गान, मधुर गुंजार, अनहद नाद,
जो निरंतर हो रही निस्सृत चिन्मयी वाद्य से
 जो निरंतर है, जो गति है,

चाक ब्रह्मा का निरंतर घूमता
उससे ही उपजा यह जगत, उसी में लीन होती
घूमना था चाक को, गति ही तो ब्रह्मा है, गति ही प्राण है,
जो खिल रहा था बीज, दो कोंपल लिए
मन, प्राण का, यह योग ही तो है जगत का बीज,
और थीं माँ तुम, लिए गर्भ में उस बीज को
मुझको, मेरे इस गात को
सृष्टि में निरंतर भटकती इस देह को...

कहा था, यही उसने ,
जो हिमालय की कृपा को, साथ ले सती, या उमा को
कर रहा था वास, बाघम्बर लपेटे, हाथ में डमरू
अपार्थिव नृत्य था वह जब हुआ था,
कांपती धरती पर वह चुप
अधरों पर समेटे ‘‘हास’’ धरती का
लिए कंठ में विष धरती का
वह कुछ कह गया था-
पार मेेरे ही जाना है तुझे
है वहीं पर धाम माँ का,
जो खड़ी है सामने तेरे , दूर नदी तट पर
दिखाती है जगत को, जगत के पार को
फिर जगत जिसका हुआ है जन्म, होना लीन,
उसकी भी नियति यह , वहाँ पर बस ‘‘चिदाकाश’’ है
वही पथ है ,जो महेश्वर धाम है।
जा... सब भूल जा
दुःख और सुख के बीच का यह रास्ता
हाँ, यह पीना है गरल तुझको ,रहना चुप नहीं
पूरा आनन्दित  ,तभी तू जा सकेगा
इस घाट से उस घाट तक।

वहां पर है रखा वह पात्र, जिसका मुख ढका
स्वर्ण से, ले उठा
दो पग, पर ध्यान रख
हिरण्यमय यह पात्र
जिसके लिए जानकर भी ‘‘राम’’
चल पड़े थे ले धनुष स्वर्ण मृग संधान करने,
जानती सीता, सब कुछ
कर गयीं वे पार, रेखा खींचकर जो गए लक्ष्मण
तभी तो ‘‘अहम्’’ का स्तूप, रावण छल गया।

स्वर्ण का यह पात्र, छलता ही रहा है
तथागत को भी मिला था, इसका आमंत्रण,
पर चले थे, वे यह सोचकर
वैभव राजसी दे न पाएगा, कभी संतोष,
छल या छलना इस जगत की, भरमा रही सबको सदा से
तभी तो महावीर ने जाना,
दे निर्मम यातना इस देह को,
पा सकें वह, जो कि उनका है
जो वे स्वयं है, मुक्ति का यह पर्व
मुक्ति उससेे भरमाया जिसनै जीवन को
कषाय का यह वलय,
‘‘अध्यवसाय’’ को घेरे में लिए ,संवर साधना से
कट सकेगा, सार पाया, श्रमण ने वेराग्य में...

यह जो वेला है, यह विद्या और अविद्या की संधि रेखा है
मधु यामिनी, मधु कलष लो खुल गया है
मधु वह जो सार है इस जगत का,
क्या जगत यह व्यर्थ है, निःस्सार है,
 माँ, बैठी, शेष शैया पर प्रभु पद दबाती, जो लक्ष्मी रूपा है,
क्या असंगत, मात्र कल्पना की चित्रशाला है?

हाँ, माँ, लक्ष्मी रूपा खो गए नारद जिसके मोह में
मांग बैठे, हरिरूप स्वयं ‘‘हरि’’ से,
और फिर जब वरमाला प्रभु को
कर समर्पित लक्ष्मी रूपा हँस पड़ी,
तो हो कुपित ,प्रभु से ले शाप ,स्वर्ण के इस पात्र से मोहित
पद रत छोड़, विभ्रम का ले दुपट्टा
तमस की गहरी अमावस रात में गए खो...यही तो सार है।

इस धरा का, यह धरा जो है वृन्दावन
सजी, सी चिन्मय, दिव्याकाश में
जहां नहीं है गंध ,न है रूप , न है शब्द ,न है कामना
वहीं पर है चिन्मय कालिंदी
जहाँ है गोपियाँ, सखी ललिता भी,
वैणु है रखी श्यामल देह के रक्ताभ अधरों पर ,
पीताम्बर पट,
दे सहारा बाँह का श्री राधा को, चिन्मयी माँ प्रृ्रकृति को
हो रहा नित्य नर्तन चिर स्पंदन मात्र गति है, मात्र गति,
अहर्निश रास, अधर कोमल, सिहरता गात
स्पंदन ही सजगता और बेसुध तन, लौटता लहरों से आता पवन
तट के सहारे छोड़ता हाँ, हाँ यही तो था...वहाँ...
भागवत का गीत प्रेमिल,
‘‘चैतन्य’’ का वह चिन्मय नृत्य
घुंघरू बांधकर नाची वह श्यामल रंग में,
तोड़कर वह पात्र का ढक्कन जो रखा था, स्वर्ण के घट पर
सिंहासन की परिधि को लांघकर,
‘‘रैदास’’ भक्ता वह,
कह रही थी भाषा उस ‘‘दरद’’ की...

सूर की गोपी अजानी
बरसते थे नेत्र जिसके देखकर काली घटाऐं
श्यामल रंग को,
‘‘कबीरा’’ का वह बेसुध मन
जो खुमारी में रहा था डूबता, जागता
सजगता में ‘‘परा’’ को बेखरी पर बांधता हँसता, हँसता...
अपनी फकीरी में रहा खुद को लगाता।

हाँ, वह गोरख, जो चला था योग की धूनी लगाए
कह गया था, साथ उसके वह रहेगा, जो जगा है
जो जगा है, सदा निशदिन, वही रहता, साथ उसके
जो सदा ही जगा रहता।

यह घड़ी भी माँ तुम्हारे, सहज स्नेहिल स्पर्श की
कि मैं जगा था, देखता
तुमको, नदी को, तट को और सबको
माँ, सब छूटता, यह गात, यह जात, यह देह का आधार
वह जो बीज था, अब खुल गया था
उठ रहा था ज्वार , कभी बाहर का आमंत्रण
कभी भीतर की अकुलाहट
माँ, यह सब दिखाया , उस स्पर्श ने
जो रह रह कर उठा था, जब जगा था।

माँ, पहली बार धरती पर माँ की कोख में,
वह पुलक, वह सिहरता गात, जब स्पर्श पाया देह ने
तब हुआ स्पंदित, यह तन यह मन, वही सिहरन,
जो उठी थी नाभि से, हो गई थी व्याप्त नस नस में
हां, माँ वही, वही तो था
वही, लौट आया शिशु मेरा जो खो गया था।

जगत की,  इस ज्ञान की, इस सूचना की ,इस शास्त्र की
प्रचारित कर्दमी जड़ बेला में,
जहां प्रस्तर खंड पूजित, शब्द अर्चित, चिन्मय अपमानित,
स्वर्ण घट की प्रतीक्षा में खड़े सब
इस देह में यंत्र मानव से,
शास्त्र को चादर सा लपेटे, बैखरी धुन पर नचते
नट विद्याा ही सीखे, दे रहे जग को प्रलोभन
जगत की मिथ्यात्व की घोषणा का पाठ दोहराते,
स्वयं भीतर जग की दासता में लिप्त, स्वर्ण घट की कामना में हो रहे बूढ़े
बूढ़े ही थे जन्मे,
इस चिन्मयी वृन्दावनी रस भूमि पर
जिनका शैशव जन्म से ही खो गया था,

हाँ जगा माँ वह, गोरख ने कहा था
आधी रात में है एक बालक बोलता,
माँ, वह बालक
वह जगा था, खोकर सब कुछ
कुल, जाति, धारण जो किया था मात्र बालक
वह बटुक भैरव, माँ वह मेरा, काल भैरव
जो ममेतर था रहा कल तलक था, वह  भी विदा अब ले  गया,...

कह रहा था वह पखेरू, बैठा वृक्ष पर, फल कुतरता
और था जो देखता था, वह अचानक ही बचा था
चखते चखते पंख उसके जो जले थे,
वह अचानक कह गया था
वह चखना भूलकर के अब, बस देखता है
देखता है जो वही तो है बटुक, बटुक भैरव
वह मिला था, और थी ललिता
जो सदा से साथ थी
उतरी आकाश में, आकाश में ही मिली थी देह में,
देख ले-
वृन्दावनी चिन्मयी धरा पर, ले हाथ में वंशी,
न ले, चाह तेरी, बांध ले घुंघरू
जगत यह पाप है अब नहीं, लीला भूमि है यह कान्ह की
जो बटुक है, वही तो मुक्त है
स्वर्ण तट की प्रतीक्षा है नहीं अब
सर्प और स्वर्ण का नहीं है भेद
यह बटुक हंसता, हंसाता
अभी तो जन्मा यही है
हाँ, माँ, मैं खड़ा था, नदी तट पर साथ तेरे,

बटुक ही तो सार है, सार्थकता यात्रा की, जो हुयी है ज्ञात
ऋषियों से, मुनियों और गुरुओं से,
पर ही न जाने क्यों, हम बटुक को छोड़कर
वृद्ध को ही साथ रखते हैं सदा।

हां, तभी तो भूमि वृन्दावन जहाँ भक्ति, नवयौवना के पुत्र
थककर क्लांत थे जो गिरे
और नारद विस्मय का छोड़ पीताम्बर, गए थे पूछने,
प्रश्न पितामह से- ‘क्या ‘भागवत’’ का बीज ही हैे यह,
या कथा श्री राम की
जहां मिलना मारूति का श्रीराम से
पाना खोई सीता, शांति श्रीराम की
विवेक का जागरण ही अंतिम गीत है।

प्राप्त होता, जो मिला इस जीव को जग में
उसी धारणा से, जो स्वधर्म है
सामर्थ्य का सुदपयोग ही तो धर्म है
जो खोलता है द्वार ,लेकर साथ विवेकी मन
उस धाम का चिर चिन्मय लीला भूमि का।

तब चिदाकाश में ,उड़ता वह पखेरू
जो चख रहा था, पंखों को जलाकर
पाकर अपनापन कि वह अब देखता है,
उड़ चला है ,चिदाकाश में
उसके पंख उजले, शुभ्र, ज्योतित
विवेक और वैराग्य के, जो छूटता था, और था जिसे जाना
वह अब जा चुका है, था जिसे आना
वह अब आ चुका है।

जो शिशु जन्मा, वह कान्ह हो यीशु, वह भी बटुक था
उसका ही आना, आगमन का गीत है
जो जगा है, वह बटुक है
जो बटुक है, वह जगा है।

है नहीं यहा पर धूल, पारस और अमृत की
नहीं है स्वर्ग का सुख
नहीं है भय की चादर ,
नहीं घृणा की बहती नदी है
हिमालय से निकली भगीरथी का जन्म है यह, जो मिली है
‘‘शिव’’ की जटा पर आज आकर, चंद्रमा है खिला
कंठ में लपेटे, सर्प विषधर
बाघम्बर लपेटे शांत है वह, वह ‘‘शिवम्’’ है,
कल्याण की इच्छा संजोए
नाद डमरू में भाषा छन्द लेकर,
नृत्य की भंगिमा हो, या ज्ञान वेदों का,
आगम, निगम की संधि रेखा,, तंत्र की आधार भूमि
चिर कैलाश की चिर भाव भूमि, यहीं तो है।

यहीं पर जन्मे हैं, ‘‘गणेश’’
जो स्वयं पशु का शीष रखकर, बुद्धि का आगार हैं,े
 वे दे रहे आधार सबको,
नाभि अपनी करते उजागर, मोदक भोग लेते
क्या नहीं असहज रूप उनका।

हां, शीश ही तो सार दुख का है
हो गया निरंतर विकास इसका,
हृदय तक अब चेतना का द्वार कुंठित
जा नहीं सकती, वह यह दासत्व खोकर
जो कि पाया ,सभ्यता के विस्तार से उसने यहां पर
शक्ति मन की हो या प्राण की, दोनों एक हैं
वास उसका नाभि,, आना है यहां
जो कि अब हो गयी है कैद घर मस्तिष्क में
जहां से जाता पथ जगत की लालसा का।

कह गया था वह- लोभ मत कर
संपत्ति यह किसी की है नहीं
त्याग से ही भोग का पथ है
और वास ईशा का जगत में
है, जगत से वह परे भी है।

लोभ का यह पथ, कषायों का बना है सिलसिला
तथागत की, विषभरी तृष्णा की नीली धार है यह
छोड़ जिसको वे गये, पा गए महावीर पथ वैराग्य को ले साथ....।

यह उपजती शीश पर, जितने केश हों उतनी ही तृष्णा जान
करते लुंचन केश का, और वे ‘‘मुंडक’’ के अनुयायी
‘‘अग्नि’’ को जगाते शीश पर, केश अर्पित कर
भगवा पहन, जग में चल पड़े।

कहते गणपति, पशुता तुम्हारी शीश पर बसती
भले ही तुम मनुज हो,, मनुज का वास तो नीचे हृदय में है
कंठ, जहां शिव ने, गरल को है रखा
इसी द्वार के नीचे रहती तितिक्षा है,
वहाँ खुला आकाश है, भाषा बैखरी से मध्यमा,
मध्यमा से होकर पश्चंती... ढूंढ़ती है पथ,  परा में डूबना
जहां जगता ‘‘सोम’’, वही मधुमय सोम,
मन और प्राण का आधार बनता,‘‘अन्न’’ से उपजा
खोता आपको, दे मन-प्राण को आधार।

यह वह भूमि है, जो बनी वृन्दावन
जहाँ तमस के पार कालिंदी, जहाँ है खड़े श्री कान्ह
ले माधुर्य, जो बस प्रेम है
जिसको पाकर कह उठा था ‘‘जायसी’’
इसके सिवा यह देह सचमुच व्यर्थ है।

यही है वह धाम ,जहाँ है देश हंसों का
जो उड़ते हैं चिदाकाश में, यही है सार्थकता
मानव देह की, होना बस मनुज
कर दूर सारे आवरण, जो ढंके हैं
चेतना को लिए इस स्वर्ण घट पर
हाँ, उठा ढक्कन, अब होगी...अब यहीं पर
चेतन निस्सृत सजग, वह नाम उसका दे सको तो दे ही देना
नाम ही तो है मनुज की आकांक्षाओं का द्वार
इसके सिवा वह जा नहीं सकता
कभी निज के पार।

अर्हत भूमि का आस्वाद है यह, उतरना छिलके कांदे के
जो मिला है, अंत में वह क्या...
क्या अस्तित्व है सहज, भाषा होती मूर्त जहां हो व्यक्त करना,
संज्ञा और विशेषण पर,
पर जहां मात्र लहरें हों और लहरों से परे जो गर्भ है
जहाँ नहीं है कुछ, जो हो सके रूपायित कहीं पर
वहाँ तो बस दिगम्बर है।

खोज उसकी क्यों करो, संधान संज्ञा का
पर वह है, वहाँ तो मात्र वंशी नाद है,
जो गति है जन्म देती...और रखती और कर देती विदा
यह क्यों? है नहीं माया
यह लीला भूमि है कान्ह की जो है योग निन्द्रा में
महासागर नीली लहरों बीच ,शैया शेष नाग
 हाँ, है वहां पर माँ,
लीला सहचरी, निरंतर जागृत चिन्मय,
उसका लास्य ही तो है सौंदर्य इस धरा पर।

उसकी ही हँसी, जो है मुदित नीले आकाश में
यह जल, थल, अग्नि, पावक सब वही हैं
है, वही जो मात्र गति है और था मैं, मैं मनुज, बटुक भैरव
था छूटता था ज्ञान प्रौढ़ पन की जो सूचना थी, जग गया था वह शिशु
या जागरण का गीत, था उस पार,
घाटी पर दिख रहा  था, जगत, ‘‘जोगी महल’’ सा, जहां है मात्र खंडहर
अतीत के जड़ संवाहक भविष्योन्मुखी डूबते मस्तूल के वे खंड,
जहां  असुरक्षित है मनुज है
जो मात्र पशु है,
और उसका होना पशु सनातन कर्म है ,जो पशु है वही होगा
यहां पशु आहार, यही अभ्यारण्य है।


वह शिशु बटुक भैरव,  यहीं था जन्मा ,गणपति, सानिध्य ही
जागरण की ,नव मनुज की
नव सूर्य के आगमन की सूचना थी।


पौ फटी थी, बरसते बादलों के बीच उस कालिमा में
हल्की सी झांकती, खिले गुलाब सी वह लालिमा थी
 आगत का संदेश...था उसमें,
जो जगा है, आज, थिर हो नहीं सकता
छाया तेरी कालिमा से है बनी,
संग तेरे ही चली है, जन्म से ही ,साथ तेरे वह रहेगी
होना तुझको है सहज, सजगता ही सार जीवन है।

हां, नदी तट पर लिखा था...यह
सुवासित कमल दल बीज,
मेरे और तेरे बीच , बहता प्राण था
छन्द गायत्री, वह सविता, माँ, ले ‘‘सोम’’ का आधार
मन और प्राण होकर एक  मुझमें लीन, मुझसे मुझको छीन
नव शिशु का हुआ था जन्म,
प्रणव सहचर, नहीं था शून्य, नहीं था दैन्य
तट कालिंदी वृन्दावन रज,
खड़ा था ‘‘वह’’ बटुक, बना वंशी ,सखी ललिता साथ
कहाँ थी वह, कहाँ था वह
दोनों एक,  क्षण वह एक
कल की  रंभाती गाय, धेनु भी अब चुप
कदंब की महकती थी  गंध।

माँ, तेरे कान्ह के अधरों पर, रखी वंशी
प्रणव सहचर, मधुरिमा में रहा था जग
अरूणाई ही अरूणाई
दिशाऐं थी दिगम्बर सी
कहतीं रूप ही तेरा, तुझी को कर अलग, रहता अलग,
यही छाया है, जो तमस है.....तू नहीं  है वह।





















शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

हमारे पुरोधा साहित्य के अनाम साधक बृजेश चंचल

हमारे पुरोधा
साहित्य के अनाम साधक बृजेश चंचल


तब मैं  अजमेर में पढ रहा था, कोटा का कवि सम्मेलन सुनने आया था पैंसठ की लड़ाई हो चुकी थी। कोटा के कवि सम्मेलन  की पूरे देश में धूम थी । यहॉं हमने बच्चन जी को सुना, नीरज जी को सुना, कैफी आजमी को सुना ही नहीं , उनका सानिध्य भी पाया था। इस अंचल के प्रसिद्ध कवि रघुराज सिंह हाड़ा को पहली बार वहीं सुना था, शायद ”कैसूला का फूल“ उनकी कविता थी। पर महत्वपूर्ण पहचान जिस कवि की मिली थी, वे बृजेश चंचल थे, वे भूख से व्याकुल बच्चे की करुण दशा की मार्मिक वेदना को शब्दायित कर रहे थे। मैंने देखा था, मैं ही नहीं सैंकड़ों लोगो की ऑंखें तरल थी। करुण रस के , वीर रस के बृजेश चंचल अद्भुद कवि थे।
वे आज कहॉं हैं, संभवतः परिवार जन को भी पता नहीं।
”लापता हुआ वह चेहरा“ हमारी क्षरित संवेदना का वे मूक गवाह बनकर रह गए। उनके भाई  प्रेमचंद कुलीन भी कहानी कार रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व उनके परिवार के एक सदस्य आकाशवाणी  मे मिले थे, उनके बारे मैं जानने का प्रयास किया था। पर उनके अज्ञातवास पर जाने के बाद से उनके बारे में कोई सूचना उनके पास नहीं थी।
मुझे याद है,  उन दिनो जब किसी पत्रिका में किसी रचना का प्रकाशन साहित्यकार के लिए महतवपूणर््ा घटना बन जाती थी, बृजेश चंचल की रचनाएॅं हर छोटी बड़ी पत्रिका में निरंतर प्रकाशित हो रहीं । वे मंच के उन दिनो सर्वाधिक लोकप्रिय कवि भी थे। एक बार मासिक पत्रिका कादंबिनी ने उनका गीत मुखपृष्ठ पर प्रकाशित किया था। तब इस नगर में उसकी बहुत चर्चा हुई थी।
दुर्भाग्य है, उनका कोई संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ। तब इस नगर में भी प्रांत की साहित्यिक गुटबंदी ने पॉंव पसारने शुरु कर दिए थे।
वे अपने समकालीन कवियों से बहुत आगे थे, पर उनकी प्रतिभा और जीवन की समस्याएॅं उन के लिए बोझा ही बन गईं।  कविता के साथ जुड़ा हुआ उनका  मन जहॉं उदात्त हो जाता था, वहॉं उनके परिवार , नौकरी बात उन्हें अचानक अप्रिय लग जाती थी।
हमारी आज भी यही आदत है हम कविताऔर कवि का मूल्यांकन भी , सोच- समझकर बाजार को देखते हुए करते हैं।
उनकी एक कविता मेरे पास है, जो संभवतः आपातकाल के आसपास लिखी गई थी।  उसके कुछ अंश मैं आपके साथ साझा करना चाहॅंगा
”स्वर्गीय शारदा पुत्रों की
जब कलमें कुर्क कराओगे।
कुछ तो बोलो,निज काल पात्र
किस अंधे से लिखवाओगे।

खुशहाली एक खिलोने सी
हर रोज तोड़ती मॅंहगाई।
मैना ने पूछा तोते से,
यह कैसी आजादी आई?

कॉंटे तो सब आजाद हुए,
फूलों पर अब तक पहरे हैं।
कुछ कहने वाले गॅूंगे हैं ,
कुछ सुनने वाले बहरे हैं।

अब पूछ रहा है लाल किला,
झंडा फहराने वालों से-
क्ब तक मेरे माथे ऊपर
ये रीते कलश चढा़ओगे?

हर बार लोरियॉं देने से
यह देश नहंी सोजाता है।
अब तो बतलाओ सही-सही
कब नए सवेरे लाओगे?

आदरणीय मित्रो, हम बृजेश चंचल की शोकसभा भी नहीं कर पाए क्या पता वे जीवित हों?  वे कहॉं हैं, न वे किसी दुर्घटना के शिकार हुए , न उनके सन्यासी होने की सूचना है। संभवतः गत पच्चीस वर्ष से वह कवि का चेहरा हमारे बीच से गुम हो गया है। इसीलिए हम उन्हें भूल गए। उनका व्यक्तित्व साक्षी है, अधिक उर्जा का वेग पात्र को तोड़ देता हे।  क्या कारण रहा ,क्या उनका शरीर दुर्बल था, जो उनकी प्रतिभा को सभॉंल नहीं पाया ,या हमारा दुराग्रह रहा जहॉ हम आज भी प्रतिभा को अवमूल्यित कर , अपात्र के महिमा मंडन में अपनी गुटीय प्रतिबद्धता को लगा देते हैं। हमने उनकी प्रतिभा को आदर नहीं दिया।
मित्रो उन्होंने बहुत अच्छा लिखा था, क्या पता आपके साथ सुरक्षित किसी पत्रिका मैं हो, भारतेन्दु समिति के संग्रहालय में हो सकता है, उनके परिवार जन ने कुछ सुरक्षित रख रखा हो, वह बाहर आए, संग्रह प्रकाशन हो, उनकी स्मृति में हमारा यही सहयोग होगा।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

अनाम साहित्य सेवक दुर्गाशंकर त्रिवेदी

हमारे पुरोधा

अनाम साहित्य सेवक दुर्गाशंकर त्रिवेदी

आदाणीय मित्रो, , संभवतः हम सब इस अनाम साहित्य सेवक को लगभग भूल ही गए हैं। भवानीमंडी में जन्मे , त्रिवेदी जी कोटा के सोशलिस्ट समाचार कार्यालय के प्रभारी थे। सन् सत्तर के दशक में उनका कार्यालय साहित्यकारों का एक विशेष आकर्षण का केन्द्र था।  वे उस समय भारत की हर छोटी बड़ी पत्रिका में निरंतर छपते रहते थे। देश की हर पत्रिका का अंक आप उनके यहॉं प्राप्त कर सकते थे। वे स्वयं सहर्ष अन्य को पत्रिका  का पता बताते थे, छपने के लिए प्रोत्साहन देते थे। उस जमाने में कोटा में दस के आसपास साप्ताहिक और पाक्षिक पत्र निकलते थे। विशेषांकों का अपना महत्व था।आज तो देश के बड़े पत्र भी वैसे अंक नहीं निकाल सकते हैं। आज प्रांत के दोनो बड़े पत्र इंटरनेट से उतारी गई सूचनाओं के संग्रह मात्र रह गए हैं।
त्रिवेदी जी कोटा से अस्सी के आसपास जयपुर में राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट को देख रहे थे। वहॉं से वे  बाद में जयपुर के पास किसी गॉंव में निजि आवास बनाकर लेखन कार्य में संलग्न थे।
त्रिवेदीजी साहित्य के मौन साधक थे। उन्होंने बहुत लिखा , लेखन ही उनकी आजीविका का साधन रहा। अत्यंत विपन्नता में भी उनका व्यक्तित्व अपराजेय रहा। वे निरन्तर हर छोटे लेखक की मदद में रहे।
सन 1967 मे कोटा आया था। तब  कहानीकार नफीस अहमद से मेरा परिचय था, वही मुझे त्रिवेदी जी से मिलवाने लेगया था। बृजेश चंचल, शचीन्द्र उपाध्याय, प्रेम जी प्रेम, रामकुमार, उस दौर के अनेक साहित्यकार उस समय शाम के समय प्रेस में मिल जाते थे, त्रिवेदी जी सबको चाय और कचौड़ी खिलाया करते थे। पैसे की बात करते ही तुरंत कहते आज मनीआर्डर आया है, आप तो खाओ।
समय के साथ सब बदल जाता है, आज साहित्यकारों की विवशता यही है, बाजारवाद में साहित्य और साहित्यकार अपने ही घर- परिवार में अवमूल्यित हो गया है। अपने साहित्य के इतिहास के ग्रंथों की तैयारी के समय जब साहित्य की सामग्री का संग्रह कर रहा था, तब यही वाक्य प्रायः सुनने में आया, ”उनें साहित्य से हमें क्या मिला? कोई दुकान ही खोल देते तो परिवार कहॉं से कहॉं होता? साहित्यकार की  रचनाएॅं उसके सामने उसके जीवनकाल में ही उपेक्षित हो जाती हैं।
शायद गलती हमारी ही है। हम बहुत अधिक आत्ममुग्ध हो गए हैं। राजनेताओं की तरह हमारा व्यक्त्वि हो गया है। त्रिवेदी जी ने बहुत लिखा, वे अपने आलेखों का विशेषकर संस्मरणों का संग्रह निकालना चाह रहे थे। पर वह रह गया। उसका प्रकाशन किया जाना उचित है।
समाचार पत्र में एक छोटी सी खबर थी, जयपुर के समीप रेल की पटरीपार करते हुए , एक वृद्ध की मौत होगई, वह साहित्यकार दुर्गाशंकर त्रिवेदी थे। धक्का सा लगा,उनके पुत्र बालमुकुंद का फोन भी मेरे पास नहीं था, कुछ वर्षों से संबंध टूट गया था। पहले उसका भी कोटा में प्रेस था, वह बंद होगया था। परंपरा के हिसाब से वह भी उनसे दूर हो गया था।

न तो कोटा में कोई शोकसभा हुई , न मधुमती में कोई सूचना आई, किसी ने चर्चा भी नहीं की, कि कहीं ऐसा व्यक्तित्व भी हमारे बीच में था।  जिस व्यक्ति ने पूरा जीवन साहित्य सेवा में निकाल दिया, सबकी मदद भी करता रहा, उसकी याद मैं आप के साथ बॉंट रहा हूॅं। मेरी दृष्टि में साहित्यकारों की स्मृतियॉं ही हमारी पूॅंजी है, जो आगे का रास्ता हमें दिखाती हैं।

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

हमारे पुरोधा मास्साब मदन लाल पँवार


  हमारे पुरोधा मास्साब  मदन लाल पँवार

तब मैं भाटापाड़ा कोटा  के प्राईमरी स्कूल में भरती हुआ था। मेरी बड़ी बहिन जो मुझे घर में पढ़ाती थीं, पहली बार शाला में लेगईं थीं। तीसरी कक्षा में मास्साब मदनलाल जी ने अंत्याक्षरी प्रतियोगिता आयोजित की थी। मेरी बहिन को कविताओं का बहुत शौक था , सुभद्राकुमारी चौहान की कविताएॅं उन्हें कंठस्थ थीं। मुझे भी तब राधेश्याम रामायण की चौपाइयॉं याद करवाई गईं थीं। उस प्रतियोगिता में मास्साब ने मेरा भ्ी चयन किया था। तब और आज के स्कूलों में बहुत बदलाव आगया है। आज बहुत कुछ उपलब्ध है, पर जो चाहिए था वह खोगया है। मास्साब ने हमारी तैयारी करवाई थी। हर छंद ”थ“ वर्ण पर समाप्त हो सिखाया गया था। तब की  वे पुरानी कविताएॅं वार्धक्य की इस सीमारेखा पर आज भी याद आती हैं,  पर स्वयं की रचित कविताएॅं, याद ही नहीं रहतीं।

मास्सब हमको पाटनपोल के किसी स्कूल में लेगए थे। तब पैदल ही जाना होता था। वहॉं हमारा स्कूल प्रथम आया था। पॉंचवीं के बाद मैं अलवर चला गया था। अपने बड़े भाई त्रिभुवननाथ जी के पास ही बादमें अध्ययन किया। आज  स्मृतियों सारे शिक्षक चले गए पर मास्साब आज भी याद आते हैं। शायद साहित्य के प्रति अनुराग मैंने वहीं पाया हो। वे शाला में हर शनिवार को साहित्यिक कार्यक्रम रखाकरते थे। महपुरुषों की जयन्ती मनाते थे।

बाद में जब कोटा लौटा , यहॉं से हिन्दी मैं एम.ए भी किया पर मास्साब याद नहीं आए। शायद तब मैं झालावाड़ में पद स्थापित था तब मंडाना के आसपास के किसी सरकारी कर्मचारी ने बताया था कि मदनलाल जी पंवार मंडाना के पास किसी खेत पर रहते हैं। काफी अवसाद में है। कभी- कभी कोटा जाते हैं, पर उनकी पहचान खो गई है। नशे में रहते हैं। मैं उन्हें खोजता हुआ गया, बातें की स्कूल की याद दिलाई वे पहचान गए। कवि पंवार वापिस लौट आए। उन्होंने कविताएॅं सुनाई , अपनी किताब दी। वे सन 1947 से पहले से लिख रहे थे। कोटा के सम्मानित कवि थे।
 परन्तु अचानक राजनीतिक पंडितों  के साहित्य में सक्रिय होने से तब से सही साहित्य कर्मियों की उपेक्षा प्रारम्भ होने लग गई थी।  मुझे बाद में कुछ मित्रों ने बताया था कि वे नशे में गोष्ठियों में आ जाते थे, उन्हे बाहर निकालना पड़ता था।
कहीं पढ़ा था, प्रतिभा का जब समाज सम्मान नहीं करता है, तब निराशा और अवसाद ही साहित्यकार के मित्र बन जाते है। दूसरे की हत्या से अधिक घृणित दूसरे के आत्मसम्मान को कुचलदेना अधिक दुखद है। न जाने क्यों सृजनशील व्यक्त्वि ही अधिक तकलीफ पाते हैं। उनके साहित्य के संबंध में मैंने कहीं नही पढ़ा, वे कब दुनिया से चले गए ,मुझे भी नहीं पता ,पर इतना मुझे याद है,सन 45 से पचपन के बीच वे कोटा के प्रसिद्ध रचनाकार रहे। आपकी कृति ”क्रांति किरण “ मेरे पास है। उनकी अन्य कोई कृति प्रकाशित हुई हो, यह सूचना मेरे पास नहीं है।
कवि मदन लाल पँवार की कृति ‘क्रान्ति किरण’ सन् 1953 ई. में प्रकाशित हुई थी। कृति में स्पष्टतः दो विभाजन हैं। स्वतन्त्रता से पूर्व तथा उस के पश्चात।
‘क्रान्ति’ की भूमिका में शम्भू दयाल जी सक्सेना ने लिखा है कि वे अपने समय के लोकप्रिय कवि हैं। । कवि पँवार की कविता में तत्कालीन सामाजिक दुर्दशा तथा पराधीनता से उत्पन्न ग्लानि बीज बन कर, अभिव्यक्ति पाना चाहती है। उस काल के कवियों के सामने परिवेशगत सच्चाई, स्पष्ट थी। छायावादी कवियों की तरह पलायन और कला के प्रति रुझान यहाँ परिलक्षित नहीं रहा है।

”आज बन्धन मुक्त माता हो,
 यही अभिलाषा मेरी
आज अपने ही करांे से
लूँ मिटा अस्तित्व अपना
शीश के बदलेे कहीं यदि
पा सकूँ मैं स्वत्व अपना

एक क्या शत जन्म ले कर
शीश हँस-हँस कर चढ़ाऊंॅं
निज करांे से चण्डिका का
रिक्त खप्पर भर बढ़ाऊॅं।“41
भावोद्रेेक कवि की पूँजी है। शब्द चयन तथा गति, सौन्दर्य प्रभावी है।
”हे, उड़ते विहग ज़रा उन से
कह देना, दूर विषाद हुआ
माता के बन्धन टूट गए
भारत फिर से आज़ाद हुआ।“

कवि सन् 1947 ई. की पन्द्रह अगस्त का स्वागत करते हुए गीत गा रहा है, वह उन नाम-अनाम शहीदों की स्मृति में, उन तक स्वतन्त्रता का सन्देश पहुँचा रहा है।
‘शिक्षक’, ‘युवक’, ‘किसान’ एवं ‘नरेश’ इस संग्रह की अन्य कविताऐं हैं। इस अ´चल की हिन्दी कविता को कवि पँवार का योगदान रहा है। आप की काव्य-भाषा सहज, प्रभावी है। आप ने अपनी कविताओं में परिवेशगत सच्चाईयों को यथारूप अभिव्यक्ति देने से बचते हुए, भावनाओं का अतिक्रमण करते हुए, नैतिक आग्रह को जन सामान्य के लिए सहज गम्य बनाने का प्रयास किया था। इस रूप में वे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण हैं।
कुछ मित्रों के पास और जानकारी होगी, बॉंटें , यह एक यज्ञ है, जहॉं हम हमारी उस पीढ़ी के प्रति जो साहित्य सृजन में लगी रही, पर अब वे विस्मृति के अंधकार में खोगई हैं, उस परंपरा से नई पीढ़ी को परिचित कराएॅं,।